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जानिए पत्रकारों के पीछे पड़ी मेनका गांधी ने खुद कैसी पत्रकारिता की थी

निखिल कुमार वर्मा | Updated on: 13 April 2016, 9:29 IST

केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स इंडिया के दो पत्रकारों आदित्य कालरा और एंड्रयू मैकेस्किल की पीआइबी मान्यता रद्द करवाने की मांग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से की थी.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार 19 अक्टूबर, 2015 को रॉयटर्स इंडिया ने एक खबर छापी थी जिसमें मेनका गांधी के हवाले से मोदी सरकार की आलोचना की गई थी. ये रहा उस स्टोरी का लिंक.

'India’s budget cuts hurt fight against malnutrition: Maneka Gandhi'

उपरोक्त खबर में मेनका के हवाले से कहा गया था कि उनके मंत्रालय का बजट करीब 50 फीसदी घटाकर 1.6 अरब डॉलर कर दिया गया है. इसकी वजह से कुपोषण के खिलाफ उनकी लड़ाई प्रभावित होगी, क्‍योंकि बजट में दिया गया पैसा 27 लाख स्‍वास्‍थ्‍य कर्मचारियों को जनवरी महीने की तक तनख्‍वाह देने में ही खर्च हो जाएगा.

खबर छपने के तुरंत बाद मेनका के मंत्रालय ने रॉयटर्स की रिपोर्ट को शरारतपूर्ण बताते हुए स्पष्टीकरण जारी किया था. अगले दिन यानि 20 अक्टूबर को रॉयटर्स ने मंत्रालय का खंडन छापते हुए कहा कि संस्थान अपनी खबर की सत्यता पर कायम हैं.

पाठक जान लें कि मेनका गांधी खुद पूर्व में पत्रकार भी रह चुकी हैं और उन्हें महज 20 साल की उम्र में 'सूर्या' मैगजीन का एडिटर होने का सौभाग्य प्राप्त है.

20 अक्टूबर, 2015 को मेनका गांधी के निजी सचिव मनोज के अरोड़ा ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव सुनील अरोड़ा को एक चिट्ठी लिखी. इसमें कहा गया, 'मुझे आपसे कालरा और मैकस्किल की पीआइबी (प्रेस इन्‍फोरमेशन ब्‍यूरो) मान्‍यता रद्द करने का आग्रह करने के लिए निर्देश दिया गया है.'

हालांकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यह कहते हुए मेनका की मांग को खारिज कर दिया कि उसके पास इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है. पीआईबी ने मेनका गांधी के मंत्रालय को सुझाव दिया कि वह इस मामले को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के समक्ष उठाएं.

पत्रकारों पर सरकारी डंडा चलाने की इच्छा रखने वाली मेनका गांधी का अपना पत्रकारिता का इतिहास ज्यादा उज्ज्वल नहीं है. मेनका गांधी की पत्रिका सूर्या मैगजीन ने अपने समय में जिस तरह की पत्रकारिता की उसे पत्रकारिता के दामन पर काला धब्बा कहा जा सकता है.

1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी चुनाव हार चुकी थीं. केंद्र में जनता पार्टी के नेतृत्व में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ था. मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री थे और बाबू जगजीवन राम रक्षामंत्री.
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सूर्या मैगजीन में छपी फोटो

अगस्त, 1978 में मेनका गांधी के संपादन में छपने वाली सूर्या मैगजीन में बाबू जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम का कथित 'सैक्स स्कैंडल' छापा गया. मैगजीन के दो पन्नों में सुरेश राम और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा सुमन चौधरी (काल्पनिक नाम) के अंतरंग पलों को बिना सेंसर किये हुए छापा गया था. खास बात यह है कि सुरेश राम अपने पिता की तरह राजनीति में नहीं थे.

राजनीति और पत्रकारिता के इतिहास में ऐसे कम ही मौके आए होंगे जब निहित स्वार्थों के कारण विरोधियों की छवि खराब करने के लिए उसके निजी जीवन और अंतरंग पलों को सार्वजनिक कर दिया गया. 

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सूर्या मैगजीन में छपी फोटो

जिस आधार पर आज मेनका गांधी रॉयटर्स के पत्रकारों की मान्यता रद्द करवाना चाहती हैं उस आधार पर किसी जमाने में मेनका की सूर्या मैगजीन को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए था. 

इस खबर का नकारात्मक असर बाबू जगजीनवन राम के राजनीतिक जीवन पर पड़ा. आज इस तरह की पत्रकारिता को अपराध की श्रेणी में रखा जाता है और छापने वाले की जगह जेल में हो सकती है. उस समय जिस व्यक्ति ने यह स्टिंग किया वे आज एक नेता और राज्यसभा सदस्य हैं. बाद में उन्होंने कहा था कि यह साफ-साफ एक अपराध है. यह खबर सिर्फ तत्कालीन रक्षामंत्री और उस समय देश से सबसे बड़े दलित नेता जगजीवन राम को बदनाम करने की साजिश थी.

रॉयटर्स की रिपोर्ट से मेनका गाांधी असहमत हो सकतीं हैं, लेकिन मेनका गांधी ने जो आज से 38 साल पहले जो किया था वह अपराध की श्रेणी में रखा में जा सकता है. मेनका गांधी को और ज्यादा लोकतांत्रिक और उदारमना होने की जरूरत है.

पत्रकारिता में जब किसी भी व्यक्ति या संस्थान को खबर से आपत्ति होती है तो वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) का दरवाजा खटखटाता है या कोर्ट की शरण में जा सकता है.

उन्होंने पीसीआई और कोर्ट में अपनी बात रखने की जगह सीधे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के जरिए फरमान जारी कर दिया. एक तरह से उन्होंने सरकारी डंडा फटकारने की कोशिश पत्रकारों के साथ की.

First published: 13 April 2016, 9:29 IST
 
निखिल कुमार वर्मा @nikhilbhusan

निखिल बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले हैं. राजनीति और खेल पत्रकारिता की गहरी समझ रखते हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में ग्रेजुएट और आईआईएमसी दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा हैं. हिंदी पट्टी के जनआंदोलनों से भी जुड़े रहे हैं. मनमौजी और घुमक्कड़ स्वभाव के निखिल बेहतरीन खाना बनाने के भी शौकीन हैं.

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