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इंफाल मुठभेड़: हीरोजीत सिंह के बयान से उभरे पूर्वोत्तर के पुराने जख्म

सुहास मुंशी | Updated on: 28 January 2016, 22:59 IST

मणिपुर के 22 वर्षीय पूर्व विद्रोही चोंगखाम संजीत 23 जुलाई 2009 को कथित मुठभेड़ में मारे गए थे. ये घटना इंफाल के भरे बाजार में हुई थी. चश्मदीदों के अनुसार संजीत उस दिन अपने अंकल के लिए दवा खरीदने आए थे. मणिपुर पुलिस कमाण्डो ने उन्हें घेर लिया. वो लोग उन्हें एक दुकान में ले गए. उसके बाद उस दुकान से उनकी लाश बाहर आई.

कई स्थानीय लोगों के अनुसार पुलिस ने संजीत की हत्या की थी. मीडिया में घटना की तस्वीरें छपीं. मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई. सीबीआई ने अपने आरोपपत्र में मणिपुर पुलिस के नौ जवानों को अभियुक्त बनाया. निलंबित हेड कॉन्स्टेबल हीरोजीत सिंह  उनमें से एक हैं. हीरोजीत ने ही संजीत को दवा की दुकान के अंदर ले जाकर गोली मारी थी.

25 जनवरी को जब हीरोजीत सिंह ने ये उद्घाटन किया तब बहुत से लोग इसपर हैरान नहीं हुए. लेकिन शायद पहली बार हुआ है कि पूर्वोत्तर भारत के किसी पुलिसवाले ने ये स्वीकार किया है कि उसने कानून का उल्लंघन करते हुए किसी की हत्या की थी. पूर्वोत्तर में आर्म्ड फोर्सेज (स्पेशल पावर) एक्ट 1958 (एएफएसपीए) के तहत विशेष अधिकार प्राप्त थे. इस कानून का लंबे समय से विरोध होता रहा है.

हीरोजीत सिंह ने मीडिया को बताया कि उन्होंने जब चोंगखाम संजीत को गोली मारी तो वो निहत्थे थे

हीरोजीत ने मीडिया से कहा कि उन्होंने जब चोंगखाम संजीत को गोली मारी तो वो निहत्थे थे. उन्होंने ये भी कहा कि उनके तत्कालीन एएसपी डॉक्टर ए झालाजीत ने उन्हें संजीत को गोली मारने का आदेश दिया था. हालांकि झालाजीत ने इससे इनकार किया. झालाजीत घटना के समय पश्चिम इंफाल के एएसपी थे. वो अब ज़िले के एसपी हैं.

मणिपुर स्थित मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लॉयतोन्गबाम कहते हैं, "ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल ये है कि संजीत को किसके आदेश पर मारा गया. हीरोजीत ने इस सवाल का जवाब दिया है. उन्होंने कहा कि उनकी संजीत से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. उन्हें उनके ऊपर के अधिकारियों ने आदेश दिया था."

बबलू लॉयतोन्गबाम ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से इस मामले की जांच के लिए पत्र लिखा है.

बुधवार को मीडिया को दिए साक्षात्कार में हीरोजीत ने घटना के बारे में विस्तार से बताया है. हीरोजीत के अनुसार उनके साथियों बहस हो रही थी. हीरोजीत ने संजीत से बात करने की कोशिश की लेकिन उनके बॉस वहां पहुंच गए और उन्होंने संजीत को मारने का आदेश दे दिया.

हीरोजीत ने अपने साक्षात्कार में बताया, "मैं हैरान रह गया था. मैंने उनसे कहा कि मुठभेड़ के लिए ये जगह सही नहीं है. उन्होंने कहा कि तुम बस कर दो. मैंने उनसे फिर कहा कि यहां काफी भीड़ है और कई मीडियावाले भी हैं. तब उन्होंने कहा कि मीडिया के बारे में चिंता मत करो, मैं उन्हें यहां से हटा दूंगा."

उन्होंने बताया कि उसके बाद वो संजीत को एक दवा की दुकान के अंदर लेकर गए और उसे छह-सात गोलियां मार दीं. इससे उसकी घटनास्थल पर ही मौत हो गयी.

जिस अखबार से हीरोजीत ने बात की उसने दावा किया है कि हीरोजीत ने ऐसी 133 हत्याएं करने की बात कही है

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े मणिपुर में हुई ऐसी सात कथित मुठभेड़ों की जांच के लिए बनाए गए आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं. हेगड़े बताते हैं कि सभी मामले में आधिकारिक बयान इन मामलों से जुड़े याचिकाकर्ताओं के बयानों से पूरी तरह ही अलग होते थे.

हेगड़े ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि पुलिस जिन्हें मुठभेड़ बता रही थी वो कानून का उल्लंघन करके की गई हत्याएं थीं.

हेगड़े कहते हैं कि पूरे मामले को भारी मात्रा में सुरक्षा बल तैनात करके दबाया जाता है. हेगड़े ने कैच को बताया, "हमने सात ऐसे मामलों की जांच की जिनमें सेना या पुलिस ने मुठभेड़ का दावा किया था. इन मामलों में मारे गए लोगों को उठा कर मार दिया गया था. हमने पाया कि सातों मामलों में मारे गए लोगों के पास से एक ही पिस्टल की बरामदगी दिखायी गई थी."

उन्होंने कहा, "आम नागरिकों के खिलाफ सुरक्षा बलों के प्रयोग का यही नतीजा होता है. इन बलों को केवल लोगों को मारना आता है. उन्हें लंबे समय तक कानून-व्यवस्ता संभालने की जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती."

हेगड़े कहते हैं कि उन्हें संजीत के मामले की ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन इतने लंबे समय बाद पुलिसवाले का बयान सामने आना संदेह पैदा करता है. वो कहते हैं, "हो सकता है कि ये कोई निजी दुश्मनी का मामला हो यो कोई और वजह हो. उसके वरिष्ठ अधिकारियों से पूछताछ के बाद ही सच सामने आएगा."

हीरोजीत के बयान के बाद एएफएसपीए को लेकर भी फिर से सवाल खड़े होने लगे हैं. हेगड़े पैनल ने इस कानून को इन राज्यों से हटाने की अनुशंसा की थी.

हीरोजीत सिंह ने कहा है कि संजीत को गोली मारने का आदेश उनके वरिष्ठ अधिकारी ने दिया था

एएफएसपीए के तहत केवल सेना को विशेष अधिकार मिलते हैं, पुलिस को नहीं. हीरोजीत मणिपुर पुलिस के जवान थे. स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ता लंबे समय से ये आरोप लगाते रहे हैं कि इस कानून का पूर्वोत्तर में काफी दुरुपयोग होता है.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के नार्थईस्ट सेंटर के निदेशक प्रोफेसर संजय हजारिका कहते हैं, "संजीत को 2009 में मारा गया था. इसके पांच साल पहले सुरक्षा बलों ने मनोरमा का बलात्कार और हत्या की थी. दोनों मामलों को मीडिया में काफी जगह मिली. ये घटनाएं इंफाल घाटी में हुई जहां एएफएसपीए लागू नहीं हैं."

हजारिका कहते हैं, "ये कानून इतना खतरनाक है कि पूरे राज्य में बेरोकटोक इसका दुरुपयोग किया जाता है."

हीरोजीत के बयान के बाद क्या एएफएसपीए और फर्जी मुठभेड़ों के खिलाफ आवाज उठाने वालों का समर्थन बढ़ेगा? इसपर हजारिका कहते  हैं, "ये स्थिति तब तक नहीं बदलेगी जब तक सरकार को ये अहसास न हो जाए कि पूर्वोत्तर में हिंसा और पीड़ा खत्म करने के लिए एएफएसपीए को हटाना जरूरी है."

हीरोजीत के बयान के बाद इस मामले समेत ऐसे दूसरे मामलों की जांच की मांग उठेगी. इसका असर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे फर्जी मुठभेड़ों की सुनवाइयों पर भी पड़ सकता है.

First published: 28 January 2016, 22:59 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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