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'स्मृति के पास कोई तर्क नहीं था, वो हिस्टीरिया और तमाशा था'

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 February 2016, 20:38 IST
QUICK PILL

जेएनयू विवाद, संसद के बज़ट सत्र में स्मृति ईरानी के भाषण, कांग्रेस के कमजोर बचाव इत्यादि पर कैच ने बात की पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेसी नेता मनीष तिवारी से. बातचीत के प्रमुख अंश.

क्या आपको लगता है कि राहुल गांधी संसद में अपनी बात कहने का मौका चूक गए? उन्होंने पहले कहा था कि हो सकता है उन्हें संसद में बोलने न दिया जाए और जब उनके बोलने की बारी आयी तो उन्होंने रणनीति बदल दी


बज़ट सत्र काफी लंबा है. जेएनयू और हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे कई मुद्दे समान अहमियत रखते हैं. वो मुनासिब वक्त पर बहस में हस्तक्षेप करेंगे और अपनी बात रखेंगे. ज्योतिरादित्य सिंधिया अच्छे वक्ता हैं. हैदराबाद और जेएनयू में जाकर राहुल गांधी अपना पक्ष पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं. वो पीड़ितों और शोषितों के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं और देश में वैचारिक असहमति का स्थान बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

लेकिन राहुल ने ऐसा कोई कड़ा बयान नहीं दिया. मल्लिकार्जुन खड़गे भी बैकफुट पर नजर आए. सदन में कांग्रेस के प्रदर्शन से ऐसा लगा कि उनके पास कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है.


कांग्रेस की रणनीति पूरी तरह स्पष्ट है. जिस वीडियो के सहारे ये पूरा मुद्दा उछाला गया अब उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं. जो लोग इनके सहारे लुगदी राष्ट्रवाद का हौवा खड़ा करना चाहते हैं वो अपने मकसद में कामयाब नहीं होंगे.

अगर आप इसका इस्तेमाल लोगों और संस्थाओं को निशाना बनाने के लिए करेंगे और उसके लिए कंडोम, बीयर बॉटल और हड्डियां गिनने के स्तर तक जाएंगे तो आपकी नीयत समझने में लोगों को देर नहीं लगेगी.

पिछले कुछ समय में हुई तमाम घटनाओं में एक पैटर्न दिखता है. चाहे वो सेंसर बोर्ड हो, एफटीआईआई पुणे हो, हैदराबाद विश्वविद्यालय या जेएनयू का मामला हो, ये लोग भारत की मूल संस्कृति को बदलना चाहते हैं. वो इसीलिए उच्च शिक्षा के संस्थानों को बरबाद कर रहे हैं. हम अपनी पूरी ताकत से इसका विरोध करेंगे.

राजद्रोह पर कांग्रेस का क्या विचार हैं?


कांग्रेस की स्थिति बहुत साफ है. आपत्तिजनक भाषण और राजद्रोह में अंतर है. इस मामले पर कानूनी राय बहुत साफ है. जिस भाषण से हिंसा हो वो राजद्रोह है. अगर आप बारूद के ढेर में आग लगाते हैं तो ये हिंसा है. लेकिन भाषण से हिंसा नहीं हो रही है और बोले गए शब्दों और उसके बाद हुई हिंसा में कोई सीधा संबंध नहीं है तो ये राजद्रोह नहीं है.

ऐसे में क्या इन छात्रों पर राजद्रोह का मामला बनता है?


बिल्कुल नहीं! उनकी तो गिरफ्तारी ही गलत है. अभी तक ये प्रमाणित नहीं हो सका है कि वीडियो असली है या जाली. और वो वीडियो किसने लिया? क्या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने?

अगर ऐसा है तो विश्वविद्यालय की राजनीति में रुचि रखने वाली पार्टी ने ये वीडियो जारी किया, और किसी ने इसकी सत्यता नहीं जांची. बगैर जांचे न्यूज चैनलों ने उसे चला दिया. फिर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की. अब तक ये नहीं पता चला है कि वीडियो असली था या नहीं. कानून का इससे बड़ा मजाक नहीं हो सकता?

लेकिन उन्होंने कार्यक्रम तो आयोजित किया था?


कार्यक्रम इसलिए आयोजित हुआ क्योंकि कुछ लोग अफजल गुरु को लेकर अलहदा विचार रखते हैं जिनसे मैं सहमत नहीं भी हो सकता हूं. उस कार्यक्रम में जो हुआ उसको लेकर अलग अलग बयान आएं हैं. आप उनपर कार्यक्रम करने के लिए मुकदमा नहीं कर सकते.

आपत्तिजनक भाषण और राजद्रोह में अंतर है. इस मामले पर कानूनी राय बहुत साफ है. जिस भाषण से हिंसा हो वो राजद्रोह है

उनपर आरोप है कि उन्होंने राजद्रोह वाले नारे लगाए. जबकि कुछ लोगों का कहना है कि ऐसे नारे नहीं लगे. कहा जा रहा है कि वीडियो कहीं और का है और ऑडियो कहीं और का, दोनों को मिलाकर एक वीडियो तैयार किया गया. तथ्यों की पुख्ता जांच किए बगैर लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. अगर कल को ये साबित हो जाए कि वीडियो जाली था तो क्या सरकार इन छात्रों के जेल में बिताए समय की भरपायी करेगी?
 

बुधवार को जब स्मृति ईरानी ने लोक सभा में अपना भाषण दिया तो लोगों को ऐसा लगा कि कांग्रेस के पास उनका ठोस जवाब नहीं है


देखिए, उन्होंने जो कहा उसमें तर्क नहीं था, वो बस हिस्टीरिया और नाटक था. क्लासिक 'सास भी कभी बहू थी' टाइप नाटक. उसमें कोई ठोस बात नहीं थी.

दुर्भाग्य की बात है कि मीडिया का एक तबका जुमलेबाजी और ठोस बयान में अंतर नहीं कर पा रहा है. इससे ये भी पता चलता है कि मीडिया के एक तबके में कितनी गिरावट आ चुकी है.

First published: 26 February 2016, 20:38 IST
 
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