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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पंजाब यूनिवर्सिटी में जवाहर लाल नेहरू चेयर के प्रमुख

राजीव खन्ना | Updated on: 26 September 2016, 3:12 IST
QUICK PILL
  • पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना 1882 में लाहौर, पाकिस्तान में हुई थी और 1956 में उसे चंडीगढ़ में स्थानांतरित किया गया. विभाजन के बाद, कुछ समय के लिए उसके ऑफिस का काम सलोन, हिमाचल प्रदेश से किया गया. यह देश का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है.
  • यहां के पुराने विद्यार्थियों में नोबल पुरस्कार प्राप्त हरगोबिंद खुराना, पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री आई.के.गुजराल और डॉ. मनमोहन सिंह, अंतरिक्षयात्री कल्पना चावला, वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, उद्योगपति सुनील भारती मित्तल और प्रमुख इतिहासकार रोमिला थापर जैसी हस्तियां शामिल हैं. 
  • अब इसी विश्वविद्यालय में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू चेयर के प्रमुख होंगे

पचास के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू)में पढ़ाई की थी और बाद में पढ़ाया भी. अब वे फिर विश्वविद्यालय में छात्रों के साथ अपने अनुभव साझा करने को तैयार हैं. इंतजार है तो केवल उस तारीख का, जिस दिन यह प्रख्यात अर्थशास्त्री जवाहर लाल नेहरू चेयर के प्रमुख होंगेे.

डॉ. सिंह ने अप्रैल में जवाहर लाल नेहरू चेयर का प्रमुख बनने का प्रस्ताव स्वीकार किया था. साथ ही उन्होंने संसदीय पैनल से यह जानना चाहा कि क्या यह जिम्मेदारी लेने से वे लाभ का पद अधिनियम के हिसाब से राज्य सभा के सांसद के अयोग्य हो जाएंगे? रिपोर्ट है कि पैनल ने उन्हें हरी झंडी दिखा दी थी. विडम्बना यह है कि उसी विश्वविद्यालय में उनके नाम से चेयर है, जिसके लिए एक अन्य ख्यातनाम अर्थशास्त्री डॉ. योगिन्दर के. अलघ नामित हो चुके हैं.

विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्री विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. उपिनंदर शॉने ने कहा, 'वे हमें कब ज्वॉइन कर रहे हैं, इसके बारे में ऑफिस को अब भी निश्चित करना है.' 

पढ़े और पढ़ाए भी

डॉ. सिंह यहां के पुराने विद्यार्थी ही नहीं हैं, पढ़ा भी चुके हैं. पीयू के वरिष्ठ शिक्षक चाहते हैं कि उनका विद्यार्थियों के साथ जल्द से जल्द इंटरेक्शन हो और वे उन्हें अपने कॅरियर और जिंदगी में बड़ी भूमिकाएं लेने को प्रेरित करें.

डॉ. सिंह के साथ, प्रो, अलघ और पद्य भूषण इला भट्ट ने भी क्रमश: डॉ. मनमोहन सिंह चेयर और महात्मा गांधी चेयर का प्रमुख बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. डॉ. चेयर की व्यस्तता और स्वास्थ्य को देखते हुए विभागाध्यक्ष ने उन्हें लेक्चर्स के लिए वीडियोकांफ्रैंसिंग का विकल्प भी ऑफर किया था. 

पीयू और डॉ. सिंह की ट्राइस्ट

80 साल के डॉ. सिंह ने अर्थशास्त्री में बीए और एमए की डिगी 1952 और 1954 में पीयू से बहुत ही अच्छे नंबरों से ली. हमेशा फर्स्ट आते थे. बाद में उन्होंने अर्थशास्त्र विभाग में पढ़ाया और विश्वविद्यालय के पत्राचार विभाग के अध्यक्ष भी रहे. अब पचास साल बाद सिंह पीयू लौट रहे हैं. एमए की डिग्री के बाद डॉ. सिंह कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय पढऩे चले गए थे.

पीयू का संक्षिप्त इतिहास

पंजाब विश्वविद्यालय की स्थापना 1882 में लाहौर, पाकिस्तान में हुई थी और 1956 में उसे चंडीगढ़ में स्थानांतरित किया गया. विभाजन के बाद, कुछ समय के लिए उसके ऑफिस का काम सलोन, हिमाचल प्रदेश से किया गया. यह देश का सबसे पुराना विश्वविद्यालय है और शीर्ष अकादमिक संस्थाओं में है.

यहां के पुराने विद्यार्थियों में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े बड़े नाम हैं, जैसे नोबल पुरस्कार प्राप्त हरगोबिंद खुराना, पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, पूर्व प्रधानमंत्री आई.के.गुजराल और डॉ. मनमोहन सिंह, अंतरिक्षयात्री कल्पना चावला, वर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, उद्योगपति सुनील भारती मित्तल, प्रमुख इतिहासकार रोमिला थापर, पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हूडा आदि.

नियमित नौकरी नहीं

प्रख्यात गणितज्ञ और विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर प्रो. राम प्रकाश बंबाह ने कैच को बताया, विश्वविद्यालय की चेयर का प्रमुख बनने के लिए उम्र या विषय की कोई सीमा नहीं है. ये चेयर रोजमर्रा की पढ़ाई के लिए नहीं हैं, बल्कि उन विशिष्ट लोगों के लिए हैं, जो अपनी सुविधा से विद्यार्थियों के साथ बातचीत करें और प्रेरित करें. बंबाह ने आगे कहा, चेयर का प्रमुख बनना कोई नियमित नौकरी नहीं है. जो विशिष्ट लोग इनके प्रमुख हैं, उन्हें केवल आने-जाने का किराया और अन्य साधारण भत्ते दिए जाते हैं. 

उन्होंने कहा कि चेयर के प्रमुख बहुत कम समय के लिए विश्वविद्यालय आते हैं. प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. अजित सिंह, जो डॉ. मनमोहन सिंह चेयर के प्रमुख रहे, तीन मौकों पर चार से पांच हफ्ते के लिए आए. प्रसिद्ध लेखक डॉ. मुल्क राज आनंद, जो रवींद्रनाथ टैगोर चेयर के प्रमुख हुआ करते थे, विश्वविद्यालय को पर्याप्त समय देने वाले कम लोगों में से थे. उन्होंने लगभग तीन साल का समय दिया. 

उन्हें उम्मीद है कि डॉ. सिंह विश्वविद्यालय को अपना पर्याप्त समय देंगे, जहां उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई है. प्रो. बंबाह, जो अब 90 के हैं, डॉ. सिंह से जुड़ी उनके पास काफी दिलचस्प यादें हैं, जो उनके जूनियर थे. 

'एक समय था जब विश्वविद्यालय के कैंपस में मुश्किल से 40 फैकल्टी मेंबर रहते थे और सब एक दूसरे को जानते थे. हमने डॉ. सिंह की शादी सेलिब्रेट की थी और बाद में कैंपस में उनकी पहली लोहिड़ी भी. हमें याद है, हम उनके घर के बाहर चौहारे पर धुरी (कालीन) पर बैठे थे और साथ में स्नैक्स का आनंद भी लिया था.' 

हालांकि विश्वविद्यालय में जो भी चेयर के प्रमुख हैं, वे सभी विशेष शख्सियत के हैं, पर डॉ. सिंह कुछ ज्यादा ही खास हैं. 'आखिर वे इसके पुराने विद्यार्थी और पुराने शिक्षक हैं. हमें उन पर बड़ा गर्व है और उन्हें विद्यार्थियों के साथ बातचीत और प्रेरित करते देखने का इंतजार है.' प्रो. बंबाह ने कहा.

डॉ. शॉने ने यह भी कहा, 'इन प्रख्यात लोगों से संस्था की गरिमा बढ़ती है. उन्हें निश्चित संख्या में लेक्चर्स आदि देने जैसी बात नहीं है.'

कैंपस के लोग डॉ. सिंह के आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जिन्होंने भारत में अर्थशास्त्री के नव-उदारीकरण का युग का सूत्रपात किया था और जिनका सिद्धांत मनमोहनोमिक्स के रूप में सब जगह जाना जाता है.  

First published: 26 September 2016, 3:12 IST
 
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