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माओवादियों का सामूहिक समर्पण या पुलिस का धोखा

राजकुमार सोनी | Updated on: 10 April 2016, 22:58 IST
QUICK PILL
  • बीते तीन-चार महीनों के दौरान छत्तीसगढ़ में माओवादी आत्मसमर्पण की बाढ़ आ गई है. दिलचस्प बात यह है कि इस दौरान सुरक्षाबलों पर माओवादी हमलों में फिर भी कोई कमी नहीं आई है.
  • इस स्थिति ने पुलिस के आत्मसमर्पण के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. शनिवार को हुए 122 माओवादियों के समर्पण ने भी इस सवालों को पुख्ता किया है.

जिस तरह से सामूहिक विवाह या यज्ञ होता है, छत्तीसगढ़ के बस्तर में माओवादियों के आत्मसमर्पण को लेकर कुछ ऐसा ही आयोजन चल रहा है. हर दूसरे-तीसरे दिन यह खबर आ जाती है कि माओवादियों ने थोक के भाव में फलां जगह समर्पण किया है, अब नक्सली अब समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर कल्लूरी साहब (आईजी पुलिस, बस्तर रेंज) जिंदाबाद के नारे लगाने लगे हैं.

बीते चार माह में बस्तर के अलग-अलग इलाकों से चार सौ से ज्यादा माओवादी और उनके समर्थक समर्पण के सामूहिक आयोजन का हिस्सा बन चुके हैं. बीते शनिवार को भी एक ऐसा ही वृहद आयोजन हुआ. इस बार 122 पुरूष और महिला माओवादी और उनके समर्थकों ने बस्तर के सुकमा जिले के दोरनापाल इलाके में आत्मसमर्पण किया.

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इस बार भी परम्परागत ढंग से पुलिस ने दावा किया कि माओवादी छतीसगढ़ सरकार की पुर्नवास नीति से प्रभावित थे और माओत्से तुंग की खोखली विचारधारा, भेदभाव, अत्याचार, हिंसा से आजिज आ चुके थे. पर इस समर्पण के साथ ही कई सवाल भी उठ खड़े हुए हैं.

देशी बंदूक के साथ समर्पण

जब दोरनापाल में समर्पण का कार्यक्रम चल रहा था तब स्थानीय मीडिया को यह लग रहा था कि माओवादियों से कम से कम एसएलआर, राइफल या एके-47 जैसे हथियार बरामद होंगे. ऐसा कुछ नहीं हुआ. 122 नक्सलियों से मात्र तीन बंदूकें जब्त की गई. ये तीनों बंदूकें भी देशी हैं.

दो माओवादी रमेश महादेव एवं दिरदो रामा के बारे में पुलिस ने बताया कि उन्होंने भरमार (देशी) बंदूक के साथ समर्पण किया है. माओवादियों के ताबड़तोड़ समर्पण को पुलिस की साजिश करार देने वाले पीयूसीएल के प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह कहते हैं, 'आजकल भरमार बंदूक का इस्तेमाल चिड़ियों को मारने के लिए भी नहीं किया जाता हैं. माओवादियों के पास तो रॉकेट लॉन्चर और अत्याधुनिक हथियार तक देखे गए हैं. यहां आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों से पुलिस को हमेशा भरमार बंदूक ही मिलती है.'

जाहिर है पुलिस की कहानी पर भरोसा करना मुशकिल है. पुलिस की आत्मसमर्पण की कहानी पर भरोसा करना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि जब कभी पुलिस और माओवादियों के बीच मुठभेड होती है तब हमेशा यह सुनने को मिलता है कि कई राउंड की फायरिंग के बाद माओवादी अंधेरे का लाभ उठाकर जंगल में भाग निकले और जाते-जाते घायल या मृत सिपाहियों के हथियार भी लूट ले गए.

बीते चार माह में बस्तर के इलाके में चार सौ से ज्यादा माओवादी और उनके समर्थक समर्पण के आयोजन का हिस्सा बन चुके हैं

ऐसे में यह सवाल लाजिमी हो जाता है कि जब अत्याधुनिक हथियार रखने वाले माओवादियों को पुलिस गिरफ्तार करती है या उनका आत्मसमर्पण करवाती है तब उनसे उनके हथियार आदि बरामद क्यों नहीं होते.

आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी का कहना है कि बस्तर में नक्सली समर्पण के नाम पर भारी फर्जीवाड़ा चल रहा है. सोरी के मुताबिक यदि सरकार पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम गठित कर उन्हें पर्याप्त सुरक्षा देते हुए 122 लोगों के समर्पण के सच को जानने की कोशिश करे तो माओवादी उन्मूलन के नाम पर बस्तर में जो गोरखधंधा चल रहा है उसकी सच्चाई सामने आ जाएगी.

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल भी समर्पण को लेकर सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, 'जिस ताबड़तोड़ ढंग से बस्तर में माओवादियों का समर्पण हो रहा है उसके बाद तो वहां हिंसक घटनाएं बंद हो जानी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. पिछले तीन महीनों के दौरान माओवादियों ने पुलिस और सुरक्षाबलों के कई जवानों को मौत के घाट उतार दिया है.'

पुलिस के रिकार्ड में आंध्र और तेलगांना के कई ऐसे माओवादी शामिल है जिन पर लाख रुपए से ज्यादा का ईनाम है

दूसरी तरफ मुखबिरी के आरोप में दो दर्जन से ज्यादा ग्रामीणों को भी माओवादियों ने अपना निशाना बनाया हैं. और तो और माओवादियों ने प्रदेश के वनमंत्री महेश गागड़ा के एक करीबी पर भी फायरिंग की है. ये घटनाएं बताती हैं कि माओवादियों का वर्चस्व बरकरार है.

न्यायिक सेवा में रहे एक पूर्व अधिकारी नाम न उजागर करने की शर्त पर बताते हैं कि पुलिस गांव-गांव से लोगों को पकड़कर थाने में लाती है और फिर उन्हें कई दिनों तक डराने-धमकाने के बाद समर्पण के नाटक के लिए बाध्य करती है. बस्तर के जिस किसी भी थाने में ग्रामीणों का हुजूम देखिए तो समझ जाइए कि दो-चार दिनों में कथित नक्सली समर्पण होने वाला है.

10 माओवादी लखटकिया ईनामी

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पुलिस के रिकार्ड में आंध्र और तेलगांना के कई ऐसे माओवादी शामिल है जिन पर लाख रुपए से ज्यादा का ईनाम है. हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में पुलिस विभाग की ओर से दी गई जानकारी में बताया गया है कि सुकमा के जगरगुडा इलाके में सक्रिय विनोद उर्फ हेमला उर्फ सपो हुंगा उर्फ बंगालू पिता अमला सपा पर 25 लाख का ईनाम है.

इसी प्रकार दूसरा बड़ा ईनामी माओवादी सुरेन्दर उर्फ माड़वी सोमा भी सुकमा जिले के किस्टारम एरिया को देखता है और उस पर 10 लाख का ईनाम घोषित है. फिलहाल ये माओवादी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़े हैं. शनिवार को जिन माओवादियों ने समर्पण किया उनमें से दस ऐसे हैं जिन पर एक-एक लाख का ईनाम बताया गया है जबकि छह माओवादी वांछित थे जबकि तीन माओवादियों पर कुल नौ हजार रुपए का ईनाम था.

पुलिस पीछे नहीं हटेगी

इधर बस्तर रेंज के आईजी शिवराम कल्लूरी ने दावा किया है कि चाहे कुछ भी हो जाए माओवाद के उन्मूलन तक उनकी पुलिस फोर्स अपने पांव पीछे नहीं खींचेगी. उन्होंने कहा, 'माओवादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर तरीकों से पुलिस और सुरक्षाबलों का मनोबल तोड़ने में लगे हैं. लेकिन वे कामयाब नहीं हो पाएंगे.'

सुकमा के कलक्टर नीरज बंसोड़ का कहना है कि जिन माओवादियों ने पहले आत्मसमर्पण किया था उन्हें स्थानीय इमली की फैक्ट्री में रोजगार दिया गया था. आगे भी जो माओवादी समर्पण करेंगे उन्हें सरकार की पुनर्वास नीति का लाभ दिया जाएगा.

First published: 10 April 2016, 22:58 IST
 
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