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जहां पहले मारे गए 76 जवान फिर वहीं 25 शहीद

राजकुमार सोनी | Updated on: 25 April 2017, 9:24 IST

बस्तर के धुर माओवाद प्रभावित सुकमा की धरती एक बार फिर लाल हो गई है. इस इलाके के चिंतागुफा थाना क्षेत्र के बुरकापाल में सोमवार को दोपहर 12 बजकर 40 मिनट पर माओवादियों ने सड़क निर्माण में सुरक्षा दे रहे सीआरपीएफ की टुकड़ी पर हमला कर २६ जवानों को मौत के घाट उतार दिया जबकि 6 जवान बुरी तरह घायल हो गए.

घटना के बाद कंपनी कमांडर और 6 जवानों के लापता होने की भी खबर है, लेकिन सीआरपीएफ के प्रवक्ता प्रशांत कुमार का कहना है कि फिलहाल उनकी बटालियन का कोई कमांडर या जवान गायब नहीं है. माओवादियों के इस हमले के बाद एक बार फिर खुफिया तंत्र की विफलता के साथ यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि आखिरकार बस्तर के पूर्व आईजी एसआरपी कल्लूरी ने माओवादियों के खात्मे के लिए कथिततौर पर समर्पित माओवादियों की जो फौज तैयार की थी उसकी भूमिका कैसी थी?


गौरतलब है कि पूर्व आईजी ने माओवादियों से लोहा लेने के लिए समर्पित माओवादियों को पुलिस में भर्ती कर दिया था. ये माओवादी बनाम पुलिस सर्चिंग के लिए जाने वाले सीआरपीएफ या सुरक्षाबलों के जवानों को मार्ग दिखाने का काम करते थे. माओवादी अभियान के विशेष पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी ने पूरे घटनाक्रम के सभी पहलुओं के जांच की बात कहीं है.

फिलहाल जहां घटना घटी है वह लंबे समय से माओवादियों का गढ़ माना जाता है. यह इलाका इतना ज्यादा दुर्गम है कि यहां कैंपों में तैनात जवानों को राशन पहुंचाने के लिए भी हेलिकाफ्टर का उपयोग किया जाता है. डीआईजी सुंदरराज ने बताया कि सुबह सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन की सी और डी कंपनी के 50-50 जवानों की दो टुकड़ियां बुरकापाल कैंप से चिंतागुफा की ओर निकलीं थीं. जवान मुकरम इलाके से महज 2 किलोमीटर आगे बढ़े होंगे तभी एबुंश लगाकर बैठे हुए माओवादियों ने आईडी से विस्फोट किया और फिर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी. इससे जवानों को संभलने का ही मौका नहीं मिला. पहले से घात लगाकर बैठे हुए माओवादियों चुन-चुन कर जवानों को निशाना बनाया.

गौरतलब है कि मुकरम वही इलाका है, जहां अप्रैल 2010 में माओवादियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया था. इसी इलाके के इंजरम और भेज्जी के कोत्ताचेरु के बीच 11 मार्च को 2017 को भी सीआरपीएफ की बटालियन पर हमला किया गया था जिसमें 12 जवान शहीद हो गए थे. माओवादी इस हमले में 1 यूबीजीएल सहित कई हथियार लूट ले गए थे.

 

पहले से नजर थी माओवादियों की


दोरनापाल-जगरगुंडा मार्ग पूरी तरह जर्जर हो चुका है. माओवादियों ने अपने गढ़ को कायम रखने के लिए इस मार्ग की पुल-पुलियों को ध्वस्त कर रखा है. माओवादियों की यह नीति रही है कि अगर सड़के खराब रहेंगी तो फिर उसमें बूटों की धमक सुनाई नहीं देगी. फिलहाल माओवादियों के इस गढ़ के बुरकापाल, चिंतागुफा और चिंतलनार में सीआरपीएफ के कैंप हैं जिनकी निगरानी में सड़कों का निर्माण हो रहा है.

सीआरपीएफ के जवान हर रोज की तरह सोमवार को भी गश्त पर निकले थे. माओवादी पिछले कई दिनों से उन पर नजर रखे हुए थे. जैसे ही जवान कैंप से निकले इस बात की भनक माओवादियों को लग गई और फिर जवानों को चारों तरफ से घेरकर उनपर हमला बोल दिया.


खबर है कि जब सीआरपीएफ के जवान सड़क पर चल रहे थे, तो उनके साथ कुछ ग्रामीण भी चल रहे थे, जो घटना से थोड़ी देर पहले आगे निकल गए. ग्रामीणों के निकलने के बाद ही जवानों पर हमला हुआ. माना जा रहा है, ग्रामीण जवानों की टोह लेने के लिए उनके साथ थे. एंबुश पाइंट से ग्रामीणों के निकलने के बाद ही माओवादियों ने ब्लास्ट कर फायरिंग शुरू कर दी.

इस हमले में माओवादियों ने आधुनिक हथियार यूबीजीएल (अंडर बैरल ग्रेनेड लांचर) से हाई एक्सप्लोसिव बम भी दागे. इसके अलावा एके 47, इंसास और २ इंच मोर्टार का भी इस्तेमाल किया. हमले में करीब 50 माओवादी शामिल थे, जिनमें काफी संख्या में महिलाएं भी थी.

माओवादियों की स्टेट मिलिट्री कमीशन ने इस हमले का खाका तैयार किया था, जिसे नंबर-1 बटालियन के कमांडर हिड़मा की अगुवाई में अंजाम दिया गया. दुर्दांत माओवादी और जगरगुंडा एरिया कमेटी का सेक्रेटरी पापाराव भी इस हमले में शामिल था. हमले के तौर-तरीकों से जान पड़ता है कि हमला सुनियोजित था और बाकायदा इसकी रिहर्सल की गई थी.

First published: 25 April 2017, 9:24 IST
 
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