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मुंबई की दहलीज़ पर मराठा क्रांति रैली, राजनीतिक दलों की नींद उड़ी

अश्विन अघोर | Updated on: 24 September 2016, 7:25 IST
QUICK PILL
  • एक नाबालिग किशोरी के साथ गैंगरेप और हत्या के विरोध में महाराष्ट्र में शुरू हुई मौन रैलियां मुंबई की दहलीज तक पहुंच गई हैं.  
  • इस गैंगरेप और हत्याकांड के दोषियों को फांसी की सज़ा के अलावा मराठा समुदाय को अन्य पिछड़े वर्ग में शामिल किए जाने की मांग उठ रही है. 
  • शांतिपूर्वक चल रही इस रैली को समुदाय के लाखों लोगों का समर्थन है जबकि सभी राजनीतिक दलों के प्रवेश की मनाही है.

16 जुलाई को अहमदनगर जिले के कोपरड़ी गांव में एक नाबालिग किशोरी के साथ हुए गैंगरेप और हत्या के विरोध में मराठा समुदाय सड़कों पर है. इनकी मांग है कि दोषियों को मृत्यु दंड, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 में संशोधन, और आरक्षण के लिए अन्य पिछड़े वर्ग में मराठा समुदाय को शामिल किया जाए.

मौन रैलियां मराठा क्रांति मोर्चा के बैनर तले 9 अगस्त को ओरंगाबाद में शुरू हुई थीं और जल्द पूरे राज्य में फैल गईं. रैलियों में लाखों लोग शामिल हैं, जो पूरी तौर पर गैरराजनीतिक हैं. रैली के आयोजकों ने राजनीतिक नेताओं को दूर रखा है. यहां तक कि मराठा नेताओं को भी रैलियों का राजनीतिक लाभ उठाने की अनुमति नहीं है. हालांकि उन्हें रैली में हिस्सा लेने की इजाजत है.

नवी मुंबई में तीन लाख मराठा जुटे

राज्य के सभी मुख्य शहरों में लाखों लोगों को शामिल करने के बाद, मराठा क्रांति मोर्चा ने बुधवार, 21 सितंबर को नवी मुंबई में विरोध रैली रखी. नवी मुंबई और रायगढ़ जिले से लगभग तीन लाख मराठा समुदाय के सदस्यों ने रैली में हिस्सा लिया. रैली नवी मुंबई में खारघर से शुरू हुई और कोंकण जिले के संभागीय आयुक्त के कार्यालय के पास बेलापुर पहुंची. रैली का प्रतिनिधिमंडल संभागीय आयुक्त से मिला और उन्हें अपनी मांगों का ज्ञापन-पत्र दिया. अब तक विभिन्न शहरों में आयोजित रैलियों में राज्य के विभिन्न हिस्सों से छह मिलियन लोग हिस्सा ले चुके हैं।

मौन मांगें

महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की मुख्य मांग यह है कि उन्हें अन्य पिछड़े वर्गों में शामिल किया जाए और समुदाय के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिया जाए. दूसरी मांग है, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 में संशोधन, यह दावा करते हुए कि इस अधिनियम का राज्य में मराठा समुदाय के खिलाफ मोटे तौर पर गलत इस्तेमाल किया गया है.

और तीसरी मांग कोपरड़ी सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषियों को मृत्यु दंड. पीडि़ता मराठा समुदाय की थीं, जबकि संदिग्ध दलित समुदाय से.

कोई राजनीति नहीं, प्लीज!

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में मराठा और दलितों के बीच हमेशा संघर्ष रहा है. राज्य में निकाली जा रही मौन रैलियों से सभी राजनीतिक पार्टियों की रातों की नींद उड़ गई है. चूंकि लोग राजनेताओं को इस मामले में दखल नहीं देने दे रहे हैं, उनके पास रैलियों में ऐसे ही हिस्सा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. अधिकांश रैलियों का नेतृत्व समुदाय की 5-6 लड़कियां आयोजकों के मार्गदर्शन में कर रही हैं. राजनीतिक पार्टियां और नेता परेशान हैं क्योंकि राज्य में मतदाताओं का मुख्य खंड, जो 32 फीसदी हैं, दलित समुदाय से ज्यादा है, जो निर्वाचन क्षेत्र का महज 11 फीसदी हैं.   

विरोध की मूल वजह यह है कि राजनेता उनकी लंबे समय से चल रही आरक्षण की मांग को पूरा नहीं कर रहे हैं. रैली में हिस्सा ले रहे नवी मुंबई के नामदेव पाटिल कहते हैं, 'ये नेता अपने राजनीतिक इजाफे के लिए समुदाय का इस्तेमाल करते हैं. हम काफी समय से समुदाय के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं और राजनेता, खासकर मराठा समुदाय के, मांग पूरी करने का बराबर आश्वासन दे रहे हैं. पर कुछ नहीं हुआ. राजनेताओं ने समुदाय का फायदा उठाया और हमें भगवान भरोसे छोड़ दिया. 

अहिंसक रैलियां

जिस तरह से रैलियां पूरे राज्य में शांतिपूर्ण रहीं, नवी मुंबई में भी शांति से निकाली गईं. औरंगाबाद के मानसिंह पवार, जिन्होंने अपने जैसी सोच वाले दोस्तों के साथ आंदोलन की शुरुआत की थी, कहते हैं, 'हम हमारी लंबे समय से अटकी हुई मांगों को पूरा करवाना चाहते हैं. जो भी सरकारें आईं, वे सभी हमारी मांगों को पूरा करने में विफल रहीं. ये रैलियां एक तरह से मराठा समुदाय की नाराजगी व्यक्त करने का तरीका हैं. हम अपना दुख बताना चाहते हैं. हमारा लक्ष्य समुदाय के लिए आरक्षण और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम,1989 में संशोधन करवाना है.'

रैलियों पर राजनीति और राज्य के राजनीतिक गलियारे में चल रहा एक दूसरे पर आरोप जड़ने के खेल के संदर्भ में पवार ने कहा, 'हम किसी के विरोध में नहीं हैं, न तो हाल की सरकार के और ना ही पूर्व की सरकारों के. उसी तरह से हमारा किसी समुदाय से वैर नहीं है, चाहे वह दलित हों या ब्राह्मण. रैलियों का मुख्य लक्ष्य हमारी ताकत दिखाना है. मराठा राजनेताओं सहित किसी को भी इन रैलियों को राजनीतिक रंग नहीं देना चाहिए.'

हमारा किसी समुदाय से वैर नहीं है, चाहे वह दलित हों या ब्राह्मण. रैलियों का मुख्य लक्ष्य हमारी ताकत दिखाना है.

राजनीतिक विश्लेषक और मुंबई कांग्रेस के पूर्व महासचिव अजित सावंत कहते हैं, 'उस आत्मसम्मान का क्या होता है, जब मराठा के साहूकार मराठा किसानों को कर्ज माफी नहीं देते हैं. जब चीनी की मिलों के मराठा निदेशक मराठा गन्ना उगाने वालों को सही दाम नहीं देते हैं. मराठा ब्रोकर और व्यापारी एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी पर मराठा किसानों को धोखा देते हैं. स्थापित मराठा राजवंशों के खिलाफ अशांति तो होनी ही है, जो इन मुद्दों पर मौन बने हुए हैं. इस प्रश्न के मूल में जाना जरूरी है कि दलितों के खिलाफ आक्रोश कौन भड़का रहा है और उसके पीछे उनकी मंशा क्या है. उन राजवंशों के खिलाफ विद्रोह होना चाहिए, जिन्होंने काबिल मराठा युवाओं को राजनीतिक रूप से आगे नहीं बढऩे दिया. ये कड़े सवाल स्थापित नेताओं से पूछे जाने चाहिए.'

हम राजनीति नहीं चाहते...पर...

भले ही वे इन रैलियों को राजनीति से बचाने की कितनी ही कोशिश करें, जो होना था, वह तो होकर रहा. सभी पार्टियों के मराठा नेताओं ने इन अहिंसक रैलियों पर राजनीति शुरू कर दी है. पिछले हफ्ते दूरदर्शन पर अपने एक साक्षात्कार में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस के यह दावा करने के बाद कि रैलियां सरकार के खिलाफ नहीं हैं और वे कुछ नेताओं द्वारा प्रसारित की गई थीं, नेशनल कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार ने यह दावा करते हुए इसके प्रतिकार में कहा कि रैलियां बेशक सरकार के खिलाफ हैं क्योंकि वह मराठा आरक्षण को लागू करने में विफल रही हैं.  

भाजपा प्रवक्ता माधव भंडारी पूछते हैं, 'मराठा आरक्षण का मामला काफी समय से लंबित है. पूर्व सरकार ने वोट कमाने की मंशा से आरक्षण दिया. पर वह न्यायसंगत नहीं होने से बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया क्योंकि राज्य में कुल आरक्षण 70 फीसदी से ज्यादा हो गया था. यदि पवार मराठा समुदाय के इतने ही हितैषी हैं, तो उन्होंने पंद्रह सालों में यह काम क्यों नहीं किया, जब उनकी पार्टी राज्य और केंद्र में सत्ता में थी.' 

भंडारी महसूस करते हैं कि राज्य सरकार के सहकारी क्षेत्र में सुधार लाने के निर्णय ने शरद पवार को जड़ से हिला दिया है. भंडारी ने कहा, 'सत्ता से बाहर फेंके जाने के बाद नेशनल कांग्रेस पार्टी महज एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी और सहकारी क्षेत्र तक सीमित है. पवार ने पूरे राज्य में सहकारी क्षेत्र और एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी पर कब्जा कर रखा है. अब सुधार के साथ इन दो क्षेत्रों पर से भी उनकी पकड़ ढीली पडऩी शुरू हो चुकी है. इससे अशांति बढ़ेगी.' 

मराठा आंदोलन की वजह केवल कृषि संकट को लेकर वृहद स्तर पर बढ़ता असंतोष है.

इस आंदोलन को कम आंकने वाले नेशनल पार्टी के प्रवक्ता नवाब मलिक महसूस करते हैं कि राज्य में मराठा आंदोलन की वजह केवल कृषि संकट को लेकर वृहद स्तर पर बढ़ता असंतोष है. उन्होंने अपनी बात को दुहराया कि रैलियां सरकार के विरोध में निकाली गई थीं.

मलिक ने कहा, 'हमने आरक्षण पर निर्णय आश्वासन के मुताबिक लिया. अब वर्तमान सरकार को इसे लागू करना है. देशभर में इस अशांति की मुख्य वजह कृषि संकट है. इस सरकार में किसान ही सबसे ज्यादा दुखी हैं. हम आरक्षण, कर्जा माफी, सही दाम और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम,1989 में संशोधन के पक्ष में हैं. भाजपा इस मुद्दे को मोड़ रही है. लोग सरकार से अपना बकाया मांगें मांग रहे हैं और यह सरकार अपना वादा तोड़ रही है. 

First published: 24 September 2016, 7:25 IST
 
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