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मराठा रैली: जाट, पटेल, गूजरों की अगली कड़ी है मराठा आरक्षण की अंगड़ाई

अश्विन अघोर | Updated on: 27 September 2016, 4:27 IST
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र के सभी जिलों में निकाली गई रैलियों में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं. इनकी मांग हैं कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े मराठों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण मिले, अनुसूचित जाति अधिनियम में संशोधन हो, उत्पीड़न संबंधी कानून को रद्द किया जाए.
  • इनका आरोप हैं कि दलित उत्पीड़न कानून का सबसे ज्यादा गलत इस्तेमाल मराठा लोगों के खिलाफ होता है. इन्होंने मांग की है कि कोपर्डी बलात्कार और हत्याकांड के आरोपियों को फांसी की सजा दी जाए जिसमें पीड़ित मराठा और आरोपी दलित समुदाय के थे.

महाराष्ट्र के सभी जिलों में निकाली गई रैलियों में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं. इनकी मांग हैं कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े मराठों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण मिले, अनुसूचित जाति अधिनियम में संशोधन हो, उत्पीड़न संबंधी कानून को रद्द किया जाए.

इनका आरोप हैं कि दलित उत्पीड़न कानून का सबसे ज्यादा गलत इस्तेमाल मराठा लोगों के खिलाफ होता है. इन्होंने मांग की है कि कोपर्डी बलात्कार और हत्याकांड के आरोपियों को फांसी की सजा दी जाए जिसमें पीड़ित मराठा और आरोपी दलित समुदाय के थे.

लाखों लोगों ने अनुशासित ढंग से राज्य के विभिन्न शहरों में रैली निकाली है. यह रैली देर शाम तक चलती रही. मूक रैली में भाग वाले लोगों के एक प्रतिनिधिमंडल ने शहर के सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी से मिलकर अपना ज्ञापन सौंपा है. रैलियों में भाग लेने वाले आयोजक यही करते हैं. यह पूरी राज्य सरकार को अपनी मांगों से अवगत कराने का माध्यम है. न तो ब्यूरोक्रेट और न ही मुख्यमंत्री इन मांगों को पूरी करने की दिशा में कुछ कर सकते हैं.

सरकार केवल इतना कर सकती है कि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (उत्पीड़न कानून) में संशोधन की जन भावनाओं से केंद्र सरकार को अवगत कराने के लिए पत्र लिखे. पूरे राज्य में रैलियां निकाली जा रही हैं और लोग ज्ञापन सौंप रहे हैं, रैलियों के आगे चलकर निष्फल होने की भी बात भी कही जा रही है. न तो महाराष्ट्र के राजनीतिक नेता और न ही रैलियों के आयोजक इसके पहलू पर विचार कर रहे हैं. यदि वे जनता को अपना संदेश को देने में असफल रहते हैं तो यह मुद्दा भविष्य में उनके लिए ही उल्टा पड़ सकता है.

औरंगाबाद में हुई थी पहली रैली

औरंगाबाद में इस तरह की पहली रैली हुई थी. इसमें भाग लेने वाले कोर ग्रुप के सदस्य और औरंगाबाद के ही निवासी मान सिंह पवार कहते हैं कि हमारा उद्देश्य सरकार पर दबाव बनाना है ताकि वह हमारी मांगों को पूरी करे. यदि रैलियों से कुछ हासिल नहीं होता है तो हमने अभी तक अगली कार्रवाई की कोई रूपरेखा नहीं तय की है. कुछ भी हो सकता है.

महाराष्ट्र के नेताओं के घरों के सामने रैलियां निकाली जा सकती हैं. अधिकांश राजनेता मराठा समुदाय के हैं. यदि हम उनके घरों के सामने रैलियां निकालेंगे तो उन पर दबाव पड़ेगा. यदि वे हमारी मांगों को पूरा नहीं करेंगे तो हम उन पर इस्तीफा देने का दबाव बनाएंगे. उन्होंने कहा कि भाजपा के केन्द्र और राज्य में सत्ता में आने के बाद से मांगों को पूरी कराने की प्रक्रिया तेज और आसान हुई है. वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक गणेश तोरस्कर का मानना है कि इन रैलियों का कोई भविष्य नहीं है. ये रैलियां अलग तरीके की हैं और विभिन्न मुद्दों के परिणामस्वरूप इस रूप में तब्दील हो गई हैं. इन रैलियों को सहज उत्पन्न रैलियां कहा जा सकता है. इससे कोई उद्देश्य हासिल होने वाला नहीं है. आयोजकों को आन्दोलन के भविष्य के बारे में विचार करना चाहिए.

तोरस्कर का यह भी मानना है कि यह जो अशांति उत्पन्न हुई है, वह धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशीलता के नाम पर मराठा समुदाय को दबाने के परिणामस्वरूप है. वह कहते हैं कि राजनीतिक नेता इस राज्य को महात्मा फुले, डॉ अम्बेडकर का राज्य बताते हैं लेकिन जब से पहली रैली, जो औरंगाबाद में निकली, तब से लेकर अभी तक किसी ने इन लोगों को याद नहीं किया.

यह इस बात का संकेत हैं कि मराठों ने सफलतापूर्वक यह संकेत दे दिया है कि वे तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के कटु आलोचक हैं. तोरस्कर कहते हैं कि कोपर्डी गैंगरेप और हत्या मामले से महाराष्ट्र में अशांति है. महाराष्ट्र में इस तरह की यह पहली घटना है कि मराठा समुदाय की एक लड़की के साथ दलितों ने दुष्कर्म किया. इससे महाराष्ट्र के गर्व को चोट पहुंची है, उसमें उबाल आ गया है.

हमदर्द अभी तक चुप

मराठों में इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई जिसके चलते रैलियों में हुजूम उमड़ पड़ा. वह कहते हैं कि मेरे हिसाब से तो इस तरह की रैलियों का कोई भविष्य नहीं है. वे मनचाहा बदलाव नहीं ला सकेंगे. तोरस्कर कहते हैं कि विडम्बना तो यह है कि मराठा नेता जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के सबसे बड़े हमदर्द बनते हैं, उनमें से किसी ने भी मराठा समुदाय की भावनाओं पर कुछ नहीं बोला है.

वह कहते हैं कि सबसे बड़े मराठा नेता शरद पवार ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखने में एक मिनट भी खर्च करना ठीक नहीं समझा कि फुले, शाहू, अम्बेडकर की विरासत वाले राज्य में कुछ लोग लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं. जबकि एनसीपी के विधायक जितेन्द्र ने इस रैली में शिरकत की है. महाराष्ट्र में जब से रैलियां शुरू हुईं, तब से किसी ने कुछ भी बयान जारी नहीं किया है.

तोरस्कर कहते हैं कि ऐसा इसलिए है कि मराठा समुदाय को उसकी विरासत से उपेक्षित समझा गया है और वे फुले, शाहू, अम्बेडकर के दर्शन से सहमत नहीं है. औरंगाबाद में हुई पहली रैली में भाग लेने वाले प्रमुख कार्यकर्ता किशोर शिटोले कहते हैं कि राजनीतिक नेताओं ने इस मुद्दे को गलत तरीके से हैंडल किया. पिछली सरकार ने मराठा समुदाय के लिए 16 फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी लेकिन उसे अमली जामा नहीं पहनाया गया.

वह कहते हैं कि इसका एकमात्र समाधान यही है कि मराठों को आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में शामिल कर लिया जाए. यदि एक बार यह हो जाता है तो हम आरक्षण के पात्र हो जाएंगे.

First published: 27 September 2016, 4:27 IST
 
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