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मराठा क्रांति मोर्चा की मौन रैली, आग ठंडी पड़ती जा रही है?

अश्विन अघोर | Updated on: 27 September 2016, 17:21 IST
QUICK PILL
  • मराठा समुदाय की तरफ़ से राज्य भर में निकाली जा रही रैलियां अब ठंडी पड़ती जा रही हैं. 
  • ताज़ा हालात ने इस आंदोलन के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है. 

महाराष्ट्र में मराठा समुदाय का राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र पर सदियों से नियंत्रण रहा है. शूरवीर माने जाने वाले मराठा समुदाय लगभग सभी राजनीतिक और सामाजिक मामलों में निर्णायक की भूमिका निभाता रहा है. इस समुदाय का राजनीति के साथ ही राज्य के कृषि और को-आपरेटिव क्षेत्र में भी नियंत्रण रहा है.

महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद से ही, कुछ सालों को छोड़ दिया जाए, तो मराठाओं का ही विधान सभा पर वर्चस्व रहा है और शासन सत्ता भी इन्हीं के हाथ में रही है. राज्य के लगभग सभी मुख्यमंत्री मराठा समुदाय के ही रहे हैं. अभी तक मराठाओं की ही राज्य के सभी क्षेत्रों में सत्ता रही है. लेकिन पिछले कुछ महीनों से ये लोग सड़कों पर उतर आए हैं. सवाल है कि कैसे! 

अब मांगों को लेकर मराठा समुदाय की ओर से राज्य भर में रैलियां निकाली जा रही हैं. महाराष्ट्र की सभी तरह की राजनीतिक और कानूनी गतिविधियां ठप हो गई हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह भी पता नहीं है कि भविष्य में आन्दोलन को कौन चलाएगा. राज्य के लगभग सभी जिलों में निकाली गई रैलियों में लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं. इनकी मांगें हैं कि आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े मराठाओं को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण मिले, अनुसूचित जाति अधिनियम में संशोधन हो, एट्रोसिटी कानून को रद्द किया जाए, (इनका आरोप हैं कि एट्रोसिटी कानून का सबसे ज्यादा गलत इस्तेमाल मराठा लोगों के खिलाफ होता है), कोपर्डी बलात्कार और हत्याकांड के आरोपियों को फांसी की सजा दी जाए (कोपर्डी रेप कांड की पीड़ित मराठा थी जबकि अत्याचार करने वाले दलित) आदि आदि. यहां यह ज्यादा रुचिकर यह है कि अनु. जाति, अनु. जन जाति (एट्रोसिटी कानून) में संशोधन का अधिकार राज्य सरकार को है ही नहीं, जबकि आरक्षण का मामला कोर्ट में लम्बित है. मुख्य मंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने दिलासा दिया है कि सरकार अपनी तरफ से हस सम्भव कोशिश करेगी कि कोपर्डी बलात्कार और हत्या के आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले.

मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र से बाहर

लाखों लोगों ने अनुशासित ढंग से शहरों में रैल निकाली है. यह रैली शाम तक चलती रही. मूक रैली में भाग वाले लोगों में से बनाए गए एक प्रतिनिधिमंडल

ने शहर के सबसे वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट से मिलकर अपना ज्ञापन सौंपा है. रैलियों में भाग लेने वाले आयोजक यही करते हैं. यह पूरी राज्य सरकार को अपनी मांगों से अवगत कराने का माध्यम है. न तो ब्यूरोक्रेट और न ही मुख्य मंत्री इन मांगों को पूरी करने की दिशा में कुछ कर सकते हैं. सरकार केवल इतना कर सकती है कि वह अनु. जाति, अनु. जन जाति (एट्रोसिटी कानून) में संशोधन की जन भावनाओं की मंशा से अवगत कराते हुए केन्द्र सरकार को पत्र लिखे. पूरे राज्य में रैलियां निकाली जा रही हैं और लोग ज्ञापन सौंप रहे हैं, रैलियों के आगे चलकर निष्फल होने की भी बात भी कही जा रही है. न तो महाराष्ट्र के राजनीतिक नेता और न ही रैलियों के आयोजक इसके पहलू पर विचार किए हुए लगते हैं. यदि वे अपने संदेश को देने में असफल रहते हैं तो यह मुद्दा भविष्य में उनके लिए ही उल्टा पड़ सकता है.

औरंगाबाद में इस तरह की पहली रैली हुई थी. इसमें भाग लेने वाले कोर ग्रुप के सदस्य और औरंगाबाद के ही निवासी मान ङ्क्षसह पवार कहते हैं कि हमारा

उद्देश्य सरकार पर दबाव बनाना है कि वह हमारी मांगों को पूरी करे. यदि रैलियों से कुछ हासिल नहीं होता है तो फिर भी हमने अभी तक अगली कार्रवाई

की कोई रूपरेखा नहीं तय की है. कुछ भी हो सकता है. महाराष्ट्र के नेताओं के घरों के सामने रैलियां निकाली जा सकती हैं. अधिकांश राजनेता मराठा समुदाय के हैं. यदि हम उनके घरों के सामने रैलियां निकालेंगे तो उन पर दबाव पड़ेगा. यदि वे हमारी मांगों को पूरा नहीं करेंगे तो हम उन पर इस्तीफा देने का दबाव बनाएंगे. उन्होंने कहा कि भाजपा के केन्द्र और राज्य में सत्ता में आने के बाद से मांगों को पूरी कराने की प्रक्रिया तेज और आसान हुई है.

अशांति की वजह कोपर्डी गैंगरेप और हत्या

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक गणेश तोरेस्कर का मानना है कि इन रैलियों का कोई भविष्य नहीं है. ये रैलियां अलग तरीके की हैं और विभिन्न

मुद्दों को एकसाथ परिणाम के रूप में तब्दील कर रही हैं. इन रैलियों को सहज उत्पन्न रैलियां कहा जा सकता है. इससे कोई उद्देश्य हासिल होने वाला

नहीं है. आयोजकों को आन्दोलन के भविष्य के बारे में विचार करना चाहिए. तोरेस्कर का यह भी मानना है कि यह जो अशांति उत्पन्न हुई है, वह धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशीलता के नाम पर मराठा समुदाय को दबाने के परिणाम के रूप में है. वह कहते हैं कि राजनीतिक नेता इस राज्य को महात्मा फुले, डॉ. अम्बेडकर का राज्य बताते हैं लेकिन जब से पहली रैली, जो औरंगाबाद में निकली, तब से लेकर अभी तक किसी ने इन लोगों को याद नहीं किया. यह इस बात का संकेत हैं कि मराठाओं ने सफलतापूर्वक यह संकेत दे दिया है कि वे तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के कटु आलोचक हैं. तोरेस्कर कहते हैं कि कोपर्डी गैंगरेप और हत्या मामले से महाराष्ट्र में अशांति है.

फुले शाहू, अम्बेडकर के दर्शन से सहमत नहीं

महाराष्ट्र में इस तरह की यह पहली घटना है कि मराठा समुदाय की एक लड़की के साथ दलितों ने दुष्कर्म किया. इससे महाराष्ट्र के गर्व में सबसे बड़ा उबाल आ गया है. मराठाओं में इसकी जबर्दस्त प्रतिक्रिया हुई जिसके चलते रैलियों में हुजूम उमड़ पड़ा. वह कहते हैं कि मेरे हिसाब से तो इस तरह की रैलियों का कोई भविष्य नहीं है. वे मनचाहा बदलाव नहीं ला सकेंगे. तोरेस्कर कहते हैं कि विडम्बना तो यह है कि मराठा नेता जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के जो सबसे बड़े हमदर्द बनते हैं, उनमें से किसी ने भी मराठा समुदाय की भावनाओं पर कुछ नहीं बोला है. वह कहते हैं कि सबसे बड़े मराठा नेता शरद पवार ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखने में एक मिनट भी खर्च करना ठीक नहीं समझा कि फुले शाहू, अम्बेडकर  की विरासत वाले राज्य में कुछ लोग लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं. जबकि एनसीपी के विधायक जितेन्द्र ने इस रैली में शिरकत की है. महाराष्ट्र में जब से रैलियां शुरू हुईं, तब से किसी ने कुछ भी बयान जारी नहीं किया है. तोरेस्कर कहते हैं कि ऐसा इसलिए है कि मराठा समुदाय को उसकी विरासत से उपेक्षित समझा गया है और वे फुले शाहू, अम्बेडकर के दर्शन से सहमत नहीं है.

औरंगाबाद में हुई पहली रैली में भाग लेने वाले प्रमुख कार्यकर्ता किशोर शिटोले कहते हैं कि राजनीतिक नेताओं ने इस मुद्दे को गलत तरीके से हैंडिल कर दिया. पिछली सरकार ने मराठा समुदाय के लिए 16 फीसदी आरक्षण की घोषणा की थी लेकिन उसे अमली जामा नहीं पहनाया गया. वह कहते हैं कि इसका एकमात्र समाधान यही है कि मराठाओं को आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में शामिल कर लिया जाए. यदि एक बार यह हो जाता है तो हम आरक्षण लेने के पात्र हो जाएंगे.

First published: 27 September 2016, 17:21 IST
 
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