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दलितों के आंदोलन से खुल रही मोदी के गुजरात माॅडल की पोल

राजीव खन्ना | Updated on: 10 August 2016, 7:39 IST

अहमदाबाद से गिर सोमनाथ के बीच गुजरात में चल रहा दलित अस्मिता आंदोलन राज्य के सामाजिक राजनीतिक इतिहास में एक बड़ा बदलाव बनने जा रहा है. इस एक घटनाक्रम ने पूरे हिन्दूवादी धड़े की जड़ें हिला कर रख दी है. क्योंकि प्रदर्शनकारी दलितों ने धमकी दी है कि वे आरएसएस और उसकी सहयोगी पार्टियों, खास तौर पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर किए गए गुजरात विकास माॅडल के पाखंड की पोल खोल कर रख देंगे.

करीब एक माह पूर्व गुजरात के उना तालुका में स्थित मोटा समाधालिया गांव की घटना के बाद दलित युवाओं में उपजे आक्रोश के चलते राज्य भर में फैले आंदोलन ने जुलूस का रूप ले लिया, जिसने गुजरात की हिन्दूवादी प्रयोगशाला में भूचाल ला दिया है. गांव में कुछ गौ रक्षकों ने मृत गाय की चमड़ी उतार रहे दलितों को सरेआम डंडों से पीटा था और उनकी परेड कराई थी.

दलित प्रदर्शनकारी अहमदाबाद, बोटड, अमरेली और गिर सोमनाथ जिलों के गांव-गांव जाकर घटना के विरोध में आवाज उठा रहे हैं और उन्हें इस मामले में दलितों का ही नही, मुसलमानों का भी भारी सहयोग मिल रहा है, जिसने हिन्दू संगठनों की चिंता बढ़ा दी है.

इस जुलूस के साथ दो दिन चले एक पत्रकार ने बताया प्रदर्शनकारियों को जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है. हर कुछ कदम की दूरी पर लोग उनके स्वागत में फूल, मालाएं आदि लेकर खड़े हैं. हर कोई अपनी क्षमता अनुसार जो कुछ कर सकता है, वह इन आंदोलनकारियों को उपलब्ध करवा रहा है, भले ही यह बिस्किट या कोई स्नैक्स के पैकेट हो या पीने के पानी के पैकेट.

लोगों का उत्साह देखने लायक है. नारों के माध्यम से बहुत से मुद्दे उठाए जा रहे हैं. दलित आंदोलनकारियों को हर जगह और कार्यकर्ता मिलते जा रहे हैं, जिससे उनकी ताकत बढ़ती नजर आ रही है.

आंदोलनकारी जुलूस के दौरान कुछ इस प्रकार के नारे लगा रहे हैं- ‘जय भीम’, ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’, ‘मनुवाद से आजादी, जातिवाद से आजादी’, 'गायनी पूंछ नूं छोडि दो’, ‘हमको हमारी जमीन दो’, 'जातिवाद तोड़ो, समाज जोड़ो’ और ‘दलित मुस्लिम, भाई-भाई’.

गौरतलब है कि जुलूस में बड़ी संख्या में महिलाए भी बढ़-चढ़ कर शामिल हो रही हैं. जहां दलित पुरुष हिंसा के सीधे शिकार हैं, वहीं महिलाओं का दर्द इससे कहीं अधिक है. पत्रकार ने बताया कि महिलाएं खुलकर आंदोलन में शामिल हो रही हैं और जहां कहीं भी जुलूस रुक रहा है वहां गांव वालों के साथ चर्चा में वे भी अपनी बात प्रमुखता से रख रही हैं.

मैला न उठाने की शपथ

आंदोलन की अगुवाई तीस साल के आस पास की उम्र के युवा नेता जिग्नेष मेवानी कर रहे हैं. अपने कुछ सहयोगियों और समर्थकों के साथ मेवानी पिछले कुछ सालों से दलितों के लिए आवाज उठा रहे हैं. गांव-गांव जा कर ये आंदोलनकारी दलितों को शपथ दिलवा रहे हैं कि अब से न तो वे मरा हुआ जानवर उठाएंगे और न ही साफ सफाई का काम करेंगे. साथ ही इस बात की भी मांग उठाई जा रही है कि दलितों को उनकी जमीन का हक मिले, जिसका वादा तो कई बार किया गया लेकिन कभी दी नहीं गई.

आंदोलनकारी दलित बहुल गांवों में जाने की बजाय उन गांवों को चुन रहे हैं, जहां या तो दलित बड़े पैमाने पर अत्याचार के शिकार हुए हैं या उन गांवों में जहां दलितों ने अपने लिए आवाज उठाई है. एक पर्यवेक्षक ने कैच को ऐसे ही एक गांव धंदुका के पास बसे लोलिया के बारे में बताया. जहां दलितों ने पिछले 15 साल से मृत जानवरों को उठाने का काम छोड़ दिया है.

अहमदाबाद के मानव विकास और अनुसंधान केंद्र के कार्यकारी निदेशक प्रसाद चाको ने बताया, 'इस दलित आंदोलन के बहुत से पहलू ऐसे हैं जो कि प्रदेश के मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक हालात को देखते हुए अनअपेक्षित हैं. पहली बार ऐसा हुआ कि दलित अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ इस कदर उठ खड़े हुए हों. अब तक होता यह आया था कि उनके विरोध का स्वर दबा दिया जाता था.'

पहली बार ऐसा हुआ है कि दलित अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ इस कदर उठ खड़े हुए हों

उनके विरोध का स्वरूप अब तक अत्याचारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अनुरोध के तौर पर होता था या फिर न्याय के लिए उठाए गए कदम के तौर पर. इस बार यह काफी हद तक एक सूत्र में पिरोए हुए आंदोलन के रूप में है, जिसकी कोई योजना नहीं बनी, मात्र त्वरित प्रतिक्रिया ने एक आंदोलन का रूप ले लिया है. दलित हमेशा ही बर्दाश्त करते आए थे, और कभी उन्हें समझ ही नहीं आया कि क्या करें लेकिन इस बार उन्होंने अपना रास्ता खुद चुना है.

चाको ने कैच न्यूज को बताया, ‘ऐसा पहली बार हुआ है जब दलितों ने गाय-बैल के शवों को छूने से इनकार कर दिया, भले ही इनके ढेर लग जाएं. पूर्व में एक बार ऐसा हुआ है जब सफाईकर्मियों ने पशुओं का शव उठाने से इनकार कर दिया था लेकिन यह केवल कुछ दिन तक चला ट्रेड यूनियन का आंदोलन था, कोई सामाजिक आंदोलन नहीं था.’

एक और बात जो इस आंदोलन में दिखाई दे रही है वह यह कि दलितों की सारी जातियां, उपजातियां एकजुट हो गई हैं, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया. वंकर, वाल्मिकी, देवी पूजक आदि पहली बार इस स्तर पर एक साथ आ खड़े हुए हैं.

चाको कहते हैं कि संघ परिवार के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि गुजरात का तथाकथित विकास माॅडल चरमराता हुआ दिखाई दे रहा है. उन्होंने साफ कहा, 'कार्यकर्ताओं ने सदा ही इसका विरोध करते हुए कहा था कि सामाजिक संकेत हमेशा निचले स्तर से आते हैं. इसी प्रकार इसी तर्ज पर देश भर में चल रही तानाशाही राजनीति पर भी अब सवाल उठ रहे हैं. अब हर कोई देख सकता है कि वास्तव में गुजरात माॅडल क्या है?'

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक संजय भावे कहते हैं, ‘यह आंदोलन अनपेक्षित है. इससे पहले दलितों के किसी आंदोलन को सोशल मीडिया पर इतना समर्थन नहीं मिला.’ पहली बार ही ऐसा हुआ है कि उन वाल्मिकी महिलाओं की चर्चा हो रही है, जो समाज में सर्वाधिक शोषित हैं.

उन्होंने कहा इस आंदोलन की खास बात यह रही कि स्थानीय स्तर पर घटा अत्याचार का मामला वाल्मीकी महिलाओं के अधिकार और उनकी स्थिति में सुधार जैसे मुद्दों पर राज्यव्यापी आंदोलन में बदल गया.

संघ परिवार के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि गुजरात का तथाकथित विकास माॅडल चरमराता हुआ दिखाई दे रहा है

भावे कहते हैं गुजरात, खास तौर पर सौराष्ट्र में दलितों की हालत सर्वहारा वर्ग जैसी है, वहां दलित महिलाओं का घरों से बाहर निकल कर इन आंदोलनकारियों का स्वागत करना और नारे लगाना एक बड़े बदलाव का सूचक है.

प्रख्यात समाजविज्ञानी गौरांग जानी के मुताबिक यह आंदोलन व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही स्तर पर सिविल सोसायटी के लिए अच्छा अवसर है.

उन्होंने कहा, 'एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इस आंदोलन में राजनेता शामिल नहीं हैं. आंदोलन की अगुवाई करने वाले लोग राजनेता न हो कर दलित युवा हैं. न तो इस आंदोलन के लिए कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई, न ही कोई संवाददाता सम्मेलन बुलाया गया. पिछले बीस सालों में पहली बार ऐसा हुआ है कि लोग खुद अपने अधिकारों की आवाज उठाने निकले हैं.'

गुजरात के सामाजिक राजनीतिक घटनाक्रम पर पैनी नजर रखने वाले अहमदाबाद के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा दूसरी बार ऐसा हुआ है जब गुजरात का समाज गांधी के दर्शन से इतर कुछ करता दिखाई दे रहा है. इससे पहले 2002 में जब गुजरात में मुस्लिम विरोधी हिंसा के खिलाफ विरोध के स्वर उठे थे तो लोगों को यह कहते सुना गया था कि चलो इसी बहाने गुजराती गांधीजी के अहिंसावादी सिद्धान्त की छाया से बाहर तो निकले.

इस बार दलितों ने समस्या से निपटने के लिए, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए गांधीवादी रास्ता छोड़ कर आंदोलन का रास्ता अपनाया. पहली बार लोगों को फिर से एकजुट होते देखा गया और दलित सरेआम यह धमकी दे रहे हैं कि वे हालिया सभी गड़बड़ियों का पर्दाफाश करके रहेंगे.

अगर दलितों के साथ मुस्लिमों के आने की बात की जाए तो हिन्दू सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि कभी ऐसा हो जाएगा क्योंकि 2002 के गुजरात दंगों में मुसलमानों पर आक्रमण के लिए दलितों को ही भड़काया गया था.

इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हालात बेहद बदल चुके हैं. इस आंदोलन में दीपक परमार नाम का वह व्यक्ति भी शामिल है, जो 2002 की हिंसा में एक सुरक्षा कर्मी की गोली का शिकार हो गया था. उसके घाव अब भी भरे नहीं हैं. उसके खिलाफ भी एक मामला दर्ज है. 2002 में उसने मुस्लिमों को हिंसा का शिकार बनाया था. उसने गोधरा कांड पेन पार्लर के नाम से एक दुकान खोली थी, जिसे स्थानीय निकाय ने अतिक्रमण के आरोप में ध्वस्त कर दिया था. आज यह व्यक्ति भी दलित आंदोलन का हिस्सा है, जहां दलित-मुस्लिम एकता के नारे लगाए जा रहे है.

एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस पर मजाकिया लहजे में कहा, ‘शायद गुजरात के मुसलमानों को समझ आ चुका है कि संघ परिवार के शासन में वे गुजरात में महादलित है.'

First published: 10 August 2016, 7:39 IST
 
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