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मथुरा हिंसा: सियासत को समझना होगा कि सत्ता टकसाल नहीं है

गोविंद चतुर्वेदी | Updated on: 6 June 2016, 13:48 IST
( कैच न्यूज)

मथुरा की घटना दिल को झंकझोरने वाली है. आखिर कहां पहुंच गए हैं हम? और यह भी पता नही कि आगे कहां पहुंचेंगे? कहां जाकर रुकेंगे यह भी पता नहीं है कि, रुकेंगे भी यहां नहीं? कहीं ऐसा न हो कि चलते ही जाएं, चलते ही जाएं! और तब पता चले कि, जब हम आत्मघाती राह पर इतना आगे जा पहुंचे कि तब वापस लौटना भी मरने के समान हो जाए. क्या इस घटना पर आज जो हो रहा है वह इस आशंका का जीता-जागता सबूत नहीं है.

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शरम आती है, 27 इन्सानों के बेमौत मारे जाने पर नेताओं की बेशर्मी देख कर. सपा हो या बसपा अथवा भाजपा या कांग्रेस सब राजनीति खेल रहे हैं. निश्चित रुप से मरने वालों में, पुलिस के दो अफसर तो इस देश के कानून और संविधान की रक्षा करते हुए शहीद हुए लेकिन शेष 22 की मौत भी कोई जश्न का मौका नहीं है!

आखिर वे भी भारत के ही नागरिक थे. चीन या पाकिस्तान से घुसपैठ करके भारत नहीं आ रहे थे. गलत रास्ते पर थे लेकिन उन्हें सही रास्ते पर लाने का जिम्मा भी हमारा ही था.

मथुरा की घटना के लिए जिम्मेदार कौन

चाहे कोई अब उत्तर प्रदेश के ताकतवर मंत्री को उनके पीछे बताए लेकिन अन्य दलों ने क्या किया? मथुरा सांसद हेमा मालिनी न क्या किया? उनका भी तो कुछ जिम्मा बनता था? तब सवाल उठना लाजिमी है कि मथुरा की घटना के लिए कौन जिम्मेदार है और क्या ऐसी घटनाओं को देश में रोका जा सकता है?

यह किसी से छिपा नहीं है कि, सरकारी जमीनों पर कब्जे की कहानी अकेले मथुरा की नहीं है. घर-घर की कहानी की तरह , देश के हर राज्य और हर शहर बल्कि अब तो गांव-गांव में सरकारी जमीनों पर ऐसे कब्जे हो रहे हैं. सब जानते हैं दिल्ली में कहां है, मुंबई में कहां है, जयपुर में कहां हैं और भोपाल में कहां हैं?

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ऐसे हर स्थान पर एक नहीं दर्जनों रामवृक्ष बैठे हैं. कहीं किसी जाति का बनकर तो कहीं किसी धर्म का बन कर. उन्हें शरण देने वाले भी हर गांव, शहर और राज्य में मौजूद हैं. कही मंत्री के रुप में, कहीं मुख्यमंत्री के रुप में, कहीं सांसद के रुप में तो कहीं विधायक के रुप में.

इनसे आगे भी जरुरत पड़े तो ऐसे समाज कंटकों को शरण देने के लिए शहर और गांवो की पंचायतों के अध्यक्ष और सदस्य भी मौजूद हैं. तब कैसे होगा सुधार? क्या मथुरा, हर शहर और गांव में दोहराया जाएगा या फिर हर जगह अदालतों को ही बीच में आना पड़ेगा? क्या देश के हर गांव-कस्बे, शहर और राज्य में शासन- प्रशासन नाम की चिड़िया यू हीं हाथ पर हाथ रखे बैठी रहेगी?

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रामवृक्ष जैसे अतिक्रमी समाज कंटको पर एक्शन लेने के पहले अपने राजनितिक आकाओं का निगाहें करम मांगती रहेगी! कब तक, आखिर कब तक चलेगा, यह सूरते हाल? इससे पहले कि, घर-घर में बैठा नौजवान बाहर सड़क पर आए और ऐसे लोगों से सीधे दो-दो हाथ करे, सराकर और प्रशासन को जाग जाना चाहिए.

ऐसा न हो कि कहीं देर हो जाए और वह भी इतनी कि, फिर बात बन ही न पाए. सारा भरोसा ही टूट जाए. सरकार से भी और प्रशासन से भी. पुलिस से भी और जिन्हें हम अपना कहते हैं, अपने ही जनप्रतिनिधियों पर से भी.

First published: 6 June 2016, 13:48 IST
 
गोविंद चतुर्वेदी @catchhindi

लेखक राजस्थान पत्रिका के डिप्टी एडिटर हैं.

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