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माया से विमुख हुए मौर्या: साइकिल सवारी की अटकलें तेज

गोविंद पंत राजू | Updated on: 23 June 2016, 9:11 IST

समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एकाएक हलचल मचा दी है. अमर सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे पुराने खिलाड़ियों की पार्टी में वापसी के बाद बंदूकों के खिलाड़ी बाहुबली मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय हो गया. यह तपिश अभी ठण्डी भी नहीं हुई थी कि बीएसपी के बड़े नेता और उत्तर प्रदेश में नेता विपक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य के बीएसपी छोड़ने के एलान ने राजनीतिक तापमान और चढ़ा दिया है.

माना जा रहा है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के दिल बदल को समाजवादी पार्टी का संरक्षण प्राप्त है और वे जल्द ही सपा का हिस्सा बन सकते हैं. ऊपर लगी तस्वीर काफी कुछ बयान करती है. यह तस्वीर स्वामी प्रसाद मौर्य की उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस की है जिसमें उन्होंने बसपा छोड़ने का ऐलान किया. जाहिर है शिवपाल यादव और आजम खान की उस मौके पर मौजूदगी के अपने निहित संदेश हैं.  

इस घटनाक्रम की टाइमिंग को समाजवादी पार्टी की मुख्तार अंसारी प्रकरण में हुई किरकिरी के प्रबंधन से भी जोड़ कर देखा जा रहा है.

बहरहाल मौर्य का दिल बदल ठीक वैसे ही हुआ जैसे अब तक बसपा छोड़ने वाले हर बड़े नेता का होता है. उन्होंने भी मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाया और यह भी कहा कि मायावती दौलत की बेटी हैं. उन्होंने कहा कि मैंने कई बार मायावती को समझाने की कोशिश की मगर मायावती दलितों के सपनों को पलीता लगा रही हैं.

जैसा हर पार्टी नेता के पार्टी छोड़ने के बाद होता आया है, मौर्य के दिल बदल के बाद मायावती ने जवाबी घोषणा की कि, ‘अच्छा ही हुआ वे चले गए, अन्यथा पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा देती.’ मायावती ने कहा कि बसपा की सरकार नहीं बनने के बावजूद उन्हें नेता प्रतिपक्ष जैसा ओहदा दिया गया. उन्होंने बताया कि मौर्य अपने बेटे-बेटी के लिए फिर से टिकट की मांग कर रहे थे. नही दिया गया तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी. मैंने उनसे कह दिया था कि यहां परिवारवाद नहीं चलेगा अगर वो सपा में जाते हैं तो वही उनके लिए सबसे सही जगह है. वहीं परिवारवाद चल सकता है.

मौर्य सदन में एक विधायक के रूप में, मंत्री के रूप में या नेता विपक्ष के रूप में अपनी बुलन्द आवाज के लिए पहचाने जाते थे

माया के पलटवार में इस बार नई बात यह रही कि उन्होने यह स्वीकार किया कि उनके पिता ने उनका नाम मायावती रखा था और उन्हें माया की कोई कमी नहीं है.

स्वामी प्रसाद मौर्य अक्टूबर 1996 में बसपा से जुड़े थे. मार्च 1997 तक वे प्रदेश की मायावती सरकार में मंत्री रहे. मई 2002 से अगस्त 2003 तक वे फिर मंत्री रहे. सितम्बर 2001 से अक्टूबर 2001 तक वे विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे और फिर अगस्त 2003 से सितम्बर 2003 तक भी वे इसी पद पर रहे. मार्च 2012 से वे फिर इसी पद पर थे.

मायावती को बड़ा झटका, स्वामी प्रसाद मौर्य का बसपा से इस्तीफा

वे पहली बार अक्टूबर 1996 में पडरौना से विधायक बने और अब तक 4 बार विधायक रह चुके हैं. जनता दल और लोकदल से राजनीति की शुरुआत करने वाले मौर्य सदन में एक विधायक के रूप में, मंत्री के रूप में या नेता विपक्ष के रूप में अपनी बुलन्द आवाज के लिए पहचाने जाते थे लेकिन मायावती की बसपा में उनकी भी बोलती बन्द ही रही.

हाल के कुछ वर्ष उनकी राजनीति के पराभव के वर्ष रहे. विधानसभा चुनावों में उनके बेटे-बेटी को पराजय मिली और लोकसभा चुनावों में उनकी बेटी संघमित्रा भी पराजित हुई. मायावती ने उन्हें पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से भी हटा दिया था और चर्चा यह भी है कि उन्हें पार्टी इस बार पडरौना से नहीं ऊंचाहार या मध्य उत्तर प्रदेश की किसी सीट से चुनाव लड़वाना चाहती थी.

उन्होंने मायावती को मनाने के प्रयास भी किए. लेकिन मायावती पसीजी नहीं तो फिर उन्होंने वही पुराना राग अपना कर पार्टी की छोड़ दी कि मायावती दौलत की बेटी हैं और बसपा में टिकट बेचे जाते हैं. हालांकि इस बात की चर्चा है कि मौर्य को आगामी अखिलेश यादव मंत्रिमण्डल विस्तार में जगह मिल सकती है, लेकिन इसमें अनेक शंकाएं हैं. मौर्य अभी बसपा के विधायक हैं. 

पार्टी छोड़ने की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद अगर समाजवादी पार्टी उन्हे मंत्री बनाती है तो सवाल उनकी विधानसभा सदस्यता को लेकर उठेगा. विधायक न रहने के बावजूद अगर उन्हें मंत्री बनाया जाता है तो यह समाजवादी सरकार की किरकिरी की एक और वजह बनेगी. वैसे ही मुख्तार प्रकरण ने समाजवादी पार्टी के लिए काफी असमंजस पैदा कर दिया है.

कौमी एकता दल के सपा में विलय के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी का दोमुहां रूख साफ दिख रहा है

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मुख्तार के मामले से जिस तरह खुद को अलग करते दिख रहे हैं, उसके चलते भी मौर्य की राह आसान नहीं दिखती. वैसे मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के सपा में विलय के मुद्दे पर समाजवादी पार्टी का दोमुहां रूख साफ दिख रहा है. एक ओर राज्य सरकार ने उनकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें आगरा जेल से लखनऊ बुलवा लिया है. 

वहीं, दूसरी ओर मुख्तार की सपा से ताजा दोस्ती के सूत्रधार बने बलराम यादव को अखिलेश ने विलय की घोषणा के कुछ ही समय बाद मंत्रिमण्डल से बर्खास्त करके ऐसा दिखाने की कोशिश की है कि दागियों के राजनीति में प्रवेश के मामले में वे अब भी 2012 के डीपी यादव प्रकरण की तरह ही सख्त हैं.

हालांकि चर्चा इस बात की भी है कि बलराम यादव के पुत्र संग्राम यादव को मंत्रिमण्डल विस्तार के दिन शपथ लेने का मौका दिया जा सकता है और यह पहले से ही तय था. यह भी हो सकता है कि अगले एक दो दिन में मुख्तार प्रकरण में समाजवादी पार्टी की ओर से कुछ नाटकीय फैसला हो जाए. 

समाजवादी पार्टी में जिस तरह से बैठकों का दौर चल रहा है, उसे देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि समाजवादी पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों में अपनी वापसी के लिए किसी भी हद तक जोड़-तोड़ कर सकती है.

First published: 23 June 2016, 9:11 IST
 
गोविंद पंत राजू @catchhindi

वरिष्ठ पत्रकार

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