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मुस्लिम-दलित एका का फार्मूला तलाश रही मायावती

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी अगले वर्ष के विधानसभा चुनाव में किसी एक दल की स्पष्ट बढ़त बनती नहीं दिख रही है लेकिन जिन राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव करो या मरो का है उनमें मूल रूप से राज्य की दो ऐसी पार्टियां हैं जिनका राष्ट्रीय अस्तित्व इसी सूबे की वजह से कायम है. ये हैं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी. समाजवादी पार्टी फिलहाल सूबे में सत्ता संभाले हुए है और बसपा विपक्ष का चेहरा है.

लेकिन विपक्ष में बैठी मायावती की पार्टी का प्रदर्शन पिछले कुछ वर्षो में लगातार गिरा है और इसलिए पार्टी के लिए यह चुनाव वर्चस्व का प्रश्न बन गया है. मायावती की राजनीति इस चुनाव पर टिकी है. वो 2012 में राज्य की सत्ता से बाहर हुईं. बाकी राज्यों में भी स्थिति कमज़ोर होती गई है. 2014 के आम चुनावों में पार्टी सूबे की 80 सीटों में से एक पर भी जीत नहीं दर्ज कर पाई. अब अगर 2017 का चुनाव भी पार्टी के हाथ से जाता है तो बसपा के लिए अपने पैर जमाए रख पाना मुश्किल हो जाएगा.

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पार्टी की सुप्रीमो मायावती को इसका अंदाज़ा भी है. वो तैयारी में लगी हुई हैं. पार्टी एक-एक सीट पर काम कर रही है और प्रत्याशियों के नाम तय किए जा रहे हैं. मायावती की पार्टी को उम्मीद है कि वो आगामी चुनाव में फिर से सूबे की सत्ता पर अपना झंडा फहरा सकेगी.

मायावती अपने पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ रही हैं. वो मुख्यधारा के मीडिया से दूर हैं और अबतक मंचों से भी.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी लगभग एक साल बाकी है लेकिन राजनीति के इस अश्वमेध में घोड़े पहले ही छोड़े जा चुके हैं. पार्टियों के प्रचार का खाका तैयार है. कोशिशें भी शुरू हो गई हैं. चुनावी रणनीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है. अपने अपने प्रत्याशियों को पहचानने का काम शुरू हो चुका है. इन सब कामों में बसपा सबसे आगे है.

पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने बताया, “हम अधिकतर सीटों पर प्रत्याशी तय कर चुके हैं. पार्टी के नेता एक एक सीट पर जाकर स्थितियों का जायज़ा ले रहे हैं. लोगों में असंतोष है और उसे हम पहचानने में कामयाब हैं”. पार्टी के ही एक अन्य नेता मुनकाद अली बताते हैं, “लगभग 100 प्रत्याशी मुस्लिम बिरादरी से होंगे. हम सभी जातियों को प्रतिनिधित्व दे रहे हैं. बसपा सर्वसमाज को ध्यान में रखकर सोचती है”.

दलित मुस्लिम समीकरण

ऐसा नाहक नहीं है कि पार्टी की नज़र मुस्लिम मतदाताओं पर खास तौर पर है. बसपा वोटों के जिस गणित पर आस लगाए है वो मुस्लिम-दलित के एकसाथ आने पर आधारित है. पार्टी का आकलन है कि मुसलमान मतदाता का मुलायम सिंह यादव से मोहभंग हुआ है. “बसपा की सरकार में एक भी दंगा नहीं हुआ. मायावती जी के मुख्यमंत्री रहते हुए दलित भी सुरक्षित थे और अल्पसंख्यक भी. मुलायम सिंह यादव की पार्टी की सत्ता ने दोनों को छला है. इस बार मुस्लिम मतदाता बहुजन समाज पार्टी का साथ देगा”, बसपा नेता मुनकाद अली ने बताया.

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पिछले दिनों बसपा की रैली में लखनऊ से लोगों को संबोधित करते हुए मायावती ने पार्टी के जिन नेताओं को सबसे प्रमुखता दी वे नसीमुद्दीन सिद्दीकी और सतीश चंद्र मिश्र हैं. दलितों की नेता ने मुस्लिम और ब्राह्मणों पर अपना दांव लगाया है. उन्हें इनके साथ की उम्मीद है. और इसीलिए मायावती कांग्रेस के साथ गठबंधन जैसे किसी भी खतरे से खेले बिना पूरे सूबे में अकेले दम पर लड़ने को तैयार है.

बसपा का मानना है कि मुजफ्फरनगर के दंगों से लेकर दादरी में गोमांस के कथित मामले तक मुसलमानों के बीच राज्य और केंद्र सरकारों के प्रति ज़बरदस्त रोष है. मुसलमानों में एक बड़ी तादाद यह मानती है कि सपा सरकार मुजफ्फरनगर दंगों में उन्हें बचा पाने में असमर्थ रही. साथ ही दादरी की घटना को लेकर भी लोगों में गुस्सा है. केंद्र की भाजपानीत सरकार को सूबे में पैर पसारने से रोकने के लिए मुसलमान वोटर एकतरफा वोट कर सकता है और इसबार उनकी पहली पसंद बसपा हो सकती है.

बसपा वोटों के जिस गणित पर आस लगाए है वो मुस्लिम-दलित के एकसाथ आने पर आधारित है

पर क्या यह वस्तुतः सही होने जा रहा है. जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महमूद मदनी ने कैच को बताया, “यह सही है कि मुस्लिम वोटरों के बीच बसपा को लेकर रुझान है. उन्हें इसबार मुसलमानों का वोट मिल सकता है”. दलितों के मुद्दों पर काम कर रहे अशोक भारती भी इससे सहमत हैं. वो बताते हैं कि मुसलमान और दलितों का दर्द साझा है और इसलिए उनका साथ आना स्वाभाविक है. लेकिन अभी चुनाव में काफी अरसा बाकी है और इसलिए यह समीकरण कितना सफल है, इसका सही अंदाज़ा अभी से नहीं लगाया जा सकता.

पार्टी का मानना है कि रोहित वेमुला से लेकर सूबे में दलितों के उत्पीड़न के मामले इन दोनों वोटबैंकों को साथ लाते हैं. सूबे में 18.5 प्रतिशत मुसलमान हैं और 20 प्रतिशत दलित. दोनों में भाजपा और सपा के प्रति निराशा और रोष है. ऐसे में लोग बसपा की ओर देखेंगे. बसपा इस गणित में बाकी जातियों को भी संभलकर शामिल कर रही है और सीटों पर जातिगत संख्या से लेकर प्रभाव तक के आधार पर टिकटों का निर्धारण कर रही है.

चुनौतियां

लेकिन समाजवादी पार्टी इस तर्क से सहमत नहीं है. पार्टी का मानना है कि भाजपा के साथ पहले गठबंधन कर चुकी मायावती पर मुसलमान भरोसा नहीं करेगा और सपा ने उनके हित में इतने काम किए हैं, इसलिए मुसलमानों के मोहभंग की बातें निराधार हैं.

दूसरी ओर भाजपा को भी मायावती के इस समीकरण की भनक है. इसलिए अगले कुछ दिनों में भाजपा ऐसे एजेंडों पर काम करती दिख सकती है जो इस समीकरण को तोड़ने पर आधारित होगा. इस दिशा में भाजपा और संघ का निशाना अलीगढ़ विश्वविद्यालय बन सकता है. भर्ती में आरक्षण के सवाल पर पिछड़ों के साथ अन्याय की बात सामने रखकर मुसलमानों और पिछड़ों, दलितों को बांटने का काम किया जा सकता है.

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संघ काफी सक्रियता से दलितों के बीच काम कर रहा है और उन्हें दलित के साथ साथ हिंदू अस्मिता और राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाई जा रही है. इस तरह मायावती जिस समीकरण को अपना आधार बनाकर उसमें पंडितों के समर्थन की आस लगाए हैं, वो भाजपा के सीधे निशाने पर है. भाजपा को दलित वोटों के टूटने की उम्मीद है और सपा को मुस्लिम वोटों के उनके साथ बने रहने की उम्मीद. दोनों के पास इसके वैध कारण भी हैं. और इसलिए मायावती सीधे गणित के आधार पर भले ही आगे दिखें, ज़मीन पर इतनी भी आगे नहीं जाती दिख रहीं.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बताया कि भाजपा का मुकाबला उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी से है. उन्होंने बसपा को सीधी लड़ाई में होने से नकारा. यह भाजपा की रणनीति भी है और तैयारी भी. बसपा को नकारना उसके सूबे में सबसे मज़बूत विकल्प बनने की स्थिति को नकारना है और ऐसा किए बिना मायावती को रोका नहीं जा सकता. मायावती की ताकत यही है कि भाजपा विरोधी मतदाता के लिए वो अभी सबसे मज़बूत विकल्प के तौर पर देखी जा रही हैं लेकिन यह दावेदारी जितनी नकारी जाएगी, मायावती को उतना ही नुकसान होगा.

मायावती अपने पारंपरिक तरीके से आगे बढ़ रही हैं. वो मुख्यधारा के मीडिया से दूर हैं और अबतक मंचों से भी. पार्टी के नेता काफी सक्रियता से सूबे के एक एक चप्पे में पहुंच रहे हैं लेकिन लोग मायावती को खोज रहे हैं, उन्हें सुनना चाह रहे हैं और वो अबतक कमरे के अंदर से बाहर की लड़ाई लड़ रही हैं. मायावती शायद किसी जल्दबाज़ी से बचना चाहती हैं और बाकी दलों के राजनीतिक पैतरों का इंतज़ार कर रही हैं.

लेकिन मायावती की अनुपस्थिति उनके विकल्प बनकर उभरने में सबसे बड़ी बाधा भी है. नायक का सामने होना ज़रूरी है. मुसलमानों को विश्वास दिलाया और बाकी जातियों को अपने से जोड़ना, इसके लिए उनका आक्रामक और सुलभ होना ज़रूरी है. मायावती अपने दलित-मुस्लिम समीकरण पर अबतक काफी सफल हैं लेकिन चुनाव अभी दूर है और इस समीकरण की ज़मीन को बचाने के लिए उनका अब मैदान में उतरना बहुत ज़रूरी है.

First published: 31 May 2016, 7:29 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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