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अंबेडकर की विरासत पर बीजेपी-मायावती में घमासान

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • दलितों को लुभाने के लिए भाजपा खुद को अंबेडकर समर्थक साबित करने में जुटी हुई है. मायावती इसे किसी भी कीमत पर रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं.
  • मायावती कहती हैं कि हिंदू राष्ट्र अंबेडकर की मूल अवधारणा के खिलाफ है. भाजपा केवल प्रचार पाने के लिए अंबेडकर को अपना बताने में जुटी है.

30 नवंबर को मायावती ने संसद में डॉ. भीमराव अंबेडकर के नए दावेदारों पर निशाना साधते हुए 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में बसपा की रणनीति जाहिर कर दी.

संसद में भाजपा नेताओं के बढ़-चढ़ कर अंबेडकर और उनके विचारों का असली अनुयायी होने का दावा किए जाने के बाद मायावती जैसे अपने तेवर में आ गई. उन्होंने भाजपा सरकार की नीतियों को संवैधानिक मूल्यों और अंबेडकर के विचारों के खिलाफ बताया. वह यहीं नहीं रुकी. आपातकाल को लेकर मायावती ने कांग्रेस पर भी हमला किया.

हालांकि पूरी बहस के दौरान भाजपा प्रमुख रूप से उनके निशाने पर रही.  बीजेपी को अवसरवादी बताते हुए उन्होंने कहा कि देश की आजादी की लड़ाई में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की कोई भूमिका नहीं थी. मायावती ने कहा कि बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति पूरी तरह से संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ थी.

मायावती ने भाजपा सरकार की नीतियों को संवैधानिक मूल्यों और अंबेडकर के विचारों के खिलाफ बताया

बीजेपी और कांग्रेस पर हमलावर होने के साथ ही उन्होंने खुद को अंबेडकर की राजनीति का असली वारिस बताया. मायावती ने कहा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने अंबेडकर को धोखा दिया और संविधान को खोखला करने में उनकी बराबर की भूमिका रही. उन्होंने कहा कि केंद्र की मौजूदा सरकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने में विफल रही है. 

अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने कहा कि वह बोलने और लिखने की आजादी का गला घोंट रही है. इस दौरान उन्होंने दादरी में भीड़ की तरफ से की गई हत्या और लेखकों एवं कलाकारों के डरे होने का जिक्र किया.  

अंबेडकर की राजनीति का खुद को असली वारिस होने का दावा करने के साथ मायावती ने भाजपा और कांग्रेस पर हमला बोला

दलितों के मसले पर भाजपा और कांग्रेस को बराबरी का जिम्मेदार ठहराते हुए मायावती ने कहा कि केंद्र में चाहे जिसकी सरकार रही हो, आजादी के 68 सालों के बाद भी हमेशा दलितों के अधिकारों और समाज के हाशिए पर पड़े लोगों को कम करके आंका गया. 

भाजपा पर निशाना साधते हुए उन्होंने हरियाणा की दोनों घटनाओं (दो दलित बच्चों की हत्या और भाजपा के मंत्री के दलित महिला पुलिस अधिकारी को शर्मिंदा किए जाने का मामला) का भी जिक्र किया. मायावती ने योग्य समुदायों को आरक्षण से दूर रखने के लिए मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया. 

उन्होंने कहा, 'निजी क्षेत्रों में आरक्षण के मुद्दे का समाधान किए बिना इस सरकार ने सभी बड़े ठेकों और अपने मंत्रियों के कामों को निजी क्षेत्र को सौंप दिया है. यह आरक्षण के अवसरों में कटौती किए जाने की चाल है.'

आरक्षण के बयान को लेकर उन्होंने मोहन भागवत को भी नहीं बख्शा. मायावती ने भागवत को चेताते हुए कहा, 'मैं उन्हें चुनौती दे रही हूं कि अगर उन्होंने दोबारा ऐसी कोशिश की तो मैं चुप नहीं रहूंगी. मैं इस लड़ाई को सड़क तक ले आऊंगी.' उन्होंने कहा, 'केंद्रीय मंत्री और रिटायर्ड जनरल वी के सिंह का फरीदाबाद में दलित महिला के बारे में दिया गया बयान बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.' उन्होंने परोक्ष रूप से बीजेपी और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें झूठे मामलों में फंसाने की कोशिश की जा रही है. 

धरातल पर खेल

देश में दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा मायावती ही हैं. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर अगर भाजपा अंबेडकर की राजनीति को हथियाने की कोशिश करेगी तो उसे मायावती का विरोध झेलना ही होगा. ऐसा लगता कि उत्तर प्रदेश चुनाव की दौड़ में मायावती खुद को भाजपा के प्रतिद्वंद्वी के तौर पर पेश कर रही हैं. 9 अक्टूबर को कांशीराम की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मायावती ने कहा था, 'मैं उन्हें इस देश को हिंदू राष्ट्र नहीं बनाने दूंगी.' 

अंबेडकर के बयान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, 'मैं एक हिंदू परिवार में पैदा हुआ हूं. इसे मैं बदल नहीं सकता लेकिन मैं हिंदू मरुंगा नहीं.' मायावती की रणनीति पूरी तरह से साफ है. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और सपा के सांप्रदायिक धुव्रीकरण की कोशिशों की संभावना के खिलाफ मायावती अपने दलित एजेंडे के साथ हिंदू राष्ट्र के मुद्दे को निशाना बनाएंगी.

मायावती हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर ऊंची जातियों के प्रभुत्व के बारे में आगाह कर रही हैं जिसमें दलितों के दमन और अत्याचार के 3000 वर्षों का इतिहास शामिल है. अंबेडकर ने इसके खिलाफ लड़ाई जारी रखी. हिंदू राष्ट्र में दलितों की कोई जगह नहीं है. 

हिंदुत्व का विरोध मुसलमानों को दलितों और बसपा के करीब लाएगा. उत्तर प्रदेश में अगर दलितों और मुसलमानों का शक्तिशाली गठबंधन बनता है और बसपा इस समीकरण को अपने पाले में करने में सफल होती है तो अन्य जातियों का झुकाव इस समीकरण की तरफ आ सकता है.  मायावती के सामने सिर्फ चुनावी चुनौती नहीं है. उनके सामने सामाजिक चुनौती भी है. उन्हें दलितों को भाजपा और आरएसएस के पाले में जाने से रोकना है

मैं भागवत को चुनौती दे रही हूं. यदि उन्होंने दोबारा आरक्षण के खिलाफ बोला तो मैं चुप नहीं रहूंगी

मायावती इस बात को बखूबी समझती है कि हिंदू धर्म पर हमला उनके खिलाफ जा सकता है. लेकिन हिंदू राष्ट्र की अवधारणा की हवा निकालकर वह अपनी स्थिति मजबूत कर सकती हैं. संसद में उनके तेवर से साफ है कि वह भाजपा को मनुवादी और ऊंची जातियों के प्रभुत्व वाली पार्टी बताकर दलितों को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश करेंगी. 

भाजपा अपनी सवर्ण समर्थक की छवि तोड़ने में नाकाम रही है. बिहार में उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. उत्तर प्रदेश में मायावती अगर दलितों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल होती है तो यह भाजपा के लिए बुरी खबर हो सकती है. 

First published: 1 December 2015, 9:22 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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