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केजरीवाल का 551 करोड़ का कर्ज भी एमसीडी को गड्ढे से निकाल नहीं सकेगा

सौम्या शंकर | Updated on: 4 February 2016, 22:03 IST
QUICK PILL
  • एमसीडी को 551 करोड़ रुपये का कर्ज दिए जाने के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा वह लोगों के बीच ऐसा भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही कि एमसीडी की खराब हालत के लिए दिल्ली सरकार जिम्मेदार है.
  • दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली सरकार पर एमसीडी का कुछ भी बकाया नहीं है. मौजूदा समस्या के लिए एमसीडी ही पूरी तरह से जिम्मेदार है. उन्होंने कहा कि सरकार ने मौजूदा वित्तीय वर्ष में तीनों नगर निकायों को दोगुना फंड का आवंटन किया है जिसके दूसरी जगह खर्च किया जा चुका है.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और बीजेपी के नेतृत्व वाली एमसीडी की आपसी लड़ाई में दिल्ली पिछले साल फरवरी महीने से ही उलझी हुई है. बुधवार को केजरीवाल ने एमसीडी को राहत देते हुए उसे 551 करोड़ रुपये का कर्ज दिए जाने की घोषणा की ताकि दोनों निगमों के हड़ताली कर्मचारियों के वेतन का भुगतानन किया जा सके. इसके अलावा एनडीएमसी को भी स्टाम्प ड्यूटी बिल के बदले 142 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा.

केजरीवाल ने कहा, 'ऐसा बताने की कोशिश की जा रही है कि एमसीडी की खराब वित्तीय हालत के लिए दिल्ली सरकार जिम्मेदार है जबकि इनकी कमान पिछले 10 सालों से बीजेपी के हाथों में रही है. एमसीडी में बड़े घोटाले हुए हैं. एमसीडी में हड़ताल के जरिये यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि दिल्ली में संकट है.' नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला करते हुए केजरीवाल ने कहा, 'केंद्र दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाने की फिराक में है.'

केजरीवाल ने कहा कि एमसीडी की खराब वित्तीय हालत के लिए वह खुद जिम्मेदार है जिसका दिल्ली सरकार से कोई लेना-देना नहीं है

दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली सरकार पर एमसीडी का कुछ भी बकाया नहीं है. मौजूदा समस्या के लिए एमसीडी ही पूरी तरह से जिम्मेदार है. उन्होंने कहा कि सरकार ने मौजूदा वित्तीय वर्ष में तीनों नगर निकायों को दोगुना फंड का आवंटन किया है जिसके दूसरी जगह खर्च किया जा चुका है. उन्होंने कहा कि सीबीआई को फंड के हेराफेरी की जांच करनी चाहिए. फंड की हेरा-फेरी की वजह से ही एमसीडी की हालत खराब हुई है.

हालांकि केजरीवाल के 551 करोड़ रुपये के कर्ज से एमसीडी को थोड़ी ही राहत मिलेगी. पिछले वाकये को देखकर कहा जा सकता है कि एमसीडी के पास वित्तीय प्रबंधन का कोई टिकाऊ मॉडल नहीं है. इससे निकलने का एक ही तरीका है कि वह पहले अपने घर को ठीक करे.

कौन है जिम्मेदार?

आम आदमी पार्टी (आप) के मुताबिक दिल्ली सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए एमसीडी के पूरे बकाये का भुगतान कर दिया है. लेकिन निगम के अधिकारियों का कहना है कि सरकार ने केवल बजटीय अनुमान के मुताबिक ही फंड का भुगतान किया है न कि बजटीय जरूरतों के मुताबिक.

आप के मुताबिक 2014 की समान अवधि के मुकाबले दिल्ली सरकार अभी तक उत्तरी दिल्ली निगम को मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान उसके लिए लक्षित फंड का 75 फीसदी जबकि दक्षिणी दिल्ली निगम को 69 फीसदी  तो पूर्वी दिल्ली निगम को 64 फीसदी रकम का भुगतान कर चुकी है.

आप के मुताबिक अगर केंद्र सरकार की संस्था डीडीए एमसीडी के 1,551 करोड़ रुपये का भुगतान कर देती है तो निगम को वित्तीय संकट से उबरने में मदद मिल जाएगी.

एमसीडी का नजरिया

दिल्ली नगर निगम का कहना है कि आवंटित राशि का पूरा भुगतान कर दिया गया है लेकिन शीला दीक्षित के सत्ता से बाहर होने के बाद म्यूनिसिपल रिफॉर्म फंड का अभी तक भुगतान नहीं किया गया है. निगम के मुताबिक यह रकम 1,322 करोड़ रुपये बनती है.

इसके अलावा उन्होंने चौथे वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने में होने वाली देरी को लेकर सरकार पर भी निशाना साधा. रिपोर्ट को विधानसभा में रखा जा चुका है और पिछले साल 2 दिसंबर को आप की सरकार ने इसे स्वीकार भी कर लिया. रिपोर्ट में राज्य सरकार के करों में निगमों को ज्यादा हिस्सेदारी देने की बात की गई है.

हालांकि सरकार का कहना है कि वह तभी इसे लागू करेगी जबकि केंद्र सरकार ऐसा करेगी. निगम ने इसे पिछले समय से जोड़ते हुए तीनों निगमों के लिए 2013 के बाद से 6,176 करोड़ रुपये के फंड घाटे का हिसाब बनाया है.

इसके अलावा एमसीडी को स्वच्छ भारत अभियान के लिए शहरी विकास मंत्रालय से 500 करोड़ रुपये दिए जाने का वादा किया गया था लेकिन अभी तक यह रकम भी जारी नहीं की गई है.

राज्य और केंद्र में तू-तू-मैं-मैं

समस्या की मूल जड़ दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच शक्ति के बंटवारे की अनोखी व्यवस्था है. बीजेपी शासित नगर निगम केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकार को रिपोर्ट करती है. हालांकि उन्हें फंड दिल्ली सरकार से मिलता है और इस बजट को केंद्र से मंजूरी मिलती है.

तीनों निगमों के मेयर ने हाल ही में अखबार में विज्ञापन देकर यह दावा किया था कि दिल्ली सरकार ही संवैधानिक तौर पर तीनों निगमों को चलाने और उसके प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है.

हालांकि राज्य सरकार लगातार कहती रही है कि एमसीडी पर वही सीधे नियंत्रण नहीं रखते हैं. 30 अक्टूबर को खुले पत्र में सीएम ने कहा कि ऐसी अफवाह फैलाई जा रही है कि निगम दिल्ली सरकार के तहत आते हैं जो कि 'पूरी तरह से गलत है.'

अक्षमता और फंड का 'बेजा इस्तेमाल'

आम आदमी पार्टी की सरकार बार-बार यह कहती रही है कि एमसीडी में वेतन का घोटाला हुआ है क्योंकि सालाना बजट का इस्तेमाल सैलरी देने में नहीं किया जा रहा है.

इसके अलावा बड़ी समस्या प्रॉपर्टी टैक्स को लागू करने की है जिसे अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है और साथ ही एमसीडी व्यवस्था को सरल बनाने में विफल रही है. मसलन पूर्वी और उत्तरी निगम एक साथ 125 करोड़ रुपये की रकम पेंशन पर खर्च करती हैं जबकि यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है.

जब एमसीडी का तीन भागों में बंटवारा किया गया तब सबसे ज्यादा राजस्व वाला क्षेत्र दक्षिणी निगम के क्षेत्राधिकार में चला गया

नौकरशाहों की सुस्ती और जवाबदेही के अभाव की वजह से भी समस्या विकराल हुई है. 2014-15 में मुंबई प्रजा फाउंडेशन के सर्वे में यह बात सामने आई कि जवाबदेही के मामले में तीनों निगमों की हालत बेहद खराब रही है.

समाधान

दिल्ली सरकार ने एमसीडी को बेल आउट देने की पेशकश की है लेकिन दीर्घकालिक रणनीति के अभाव में इस वित्तीय मदद से फौरी राहत ही मिलेगी. उत्तरी निगम हर साल 2,000  करोड़ रुपये का राजस्व जुटाता है और इसका सालाना खर्च 2,800 करोड़ रुपये है.

राज्य सरकार हर साल इस अंतर को नहीं भर सकती. चौथे वित्त आयोग की सिफारिशें को लागू किए जाने से निगमों की कर हिस्सेदारी बढ़ेगी. हालांकि लंबे समय के लिए एमसीडी को राजनीतिक और चुनावी फायदों को धत्ता बताते हुए कुछ अलोकप्रिय फैसले लेने होंगे ताकि वह अपनी स्थिति सुधार सके.

निगमों को करों में बढ़ोतरी करने का फैसला लेना चाहिए. एमसीडी का एकीकरण या फिर इसे राज्य सरकार के अधीन लाए जाने पर भी विचार करना चाहिए. हालांकि यह गठबंधन राज्य के दर्जे की राजनीतिक में उलझ सकता है. ऐसी स्थिति में निगम को अपने कर्ज को माफ किए जाने की मांग करनी चाहिए. एमसीडी ने शीला दीक्षित के कार्यकाल में इसकी मांग की थी लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं मिल पाया. 

First published: 4 February 2016, 22:03 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

A correspondent with Catch, Soumya covers politics, social issues, education, art, culture and cinema. A lamenter and celebrator of the human condition, she hopes to live long enough to witness the next big leap in human evolution or the ultimate alien takeover of the world.

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