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स्टेट्समैनशिप से दूर, आत्ममुग्धता के शिकार हैं प्रधानमंत्री मोदी

भारत भूषण | Updated on: 23 November 2015, 13:31 IST
QUICK PILL
  • मई 2014 में लोकसभा\r\nचुनाव के दौरान उन्हें जिस तरह से सभी जाति, वर्ग और समुदाय का\r\nएकतरफा समर्थन मिला था, वह खुमारी अब उतरने लगी है.
  • विपक्ष ने गठबंधन की राजनीति के फायदे को समझ लिया है. लिहाजा अब\r\nसिर्फ मोदी के दम पर कोई बड़ा चुनाव जीतने की कल्पना भी भाजपा नहीं करेगी.

लंदन के वेंबले स्टेडियम में ब्रिटिश प्रधानमंत्री और भारतीय मूल के नागरिकों ने जिस भव्यता और गर्मजोशी के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया, उसने उनमें में नई ऊर्जा भर दी है. मोदी इस तरह के लाव-लश्कर और दिखावे के आदी रहे हैं.

वेंबले स्टेडियम में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने जिस उत्साह और उम्मीद के साथ 'अच्छे दिन आएंगे, जरूर आएंगे' का दावा किया, वह बिहार चुनाव में मिली करारी हार के बाद मोदी के लिए सबसे बड़ा मरहम था. बिहार में भाजपा की जबरदस्त शिकस्त के बाद वेंबले में उमड़ी 60,000 लोगों की भारी भीड़ ने मोदी को जरूरी राहत दी. उत्साहित मोदी 'थैंक यू वेंबले' कहना नहीं भूले.

प्रधानमंत्री बनने के करीब 18 महीनों बाद मोदी की लार्जर दैन लाइफ वाली छवि में दरार पड़ने लगी है. साफ तौर पर कहा जा सकता है कि बिहार विधानसभा चुनाव और उसके पहले दिल्ली का विधानसभा चुनाव मोदी के खिलाफ दिया गया बड़ा जनादेश है. मई 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें जिस तरह से सभी जाति, वर्ग और समुदाय का एकतरफा समर्थन मिला था, वह खुमारी अब उतरने लगी है.

हालांकि अभी प्रधानमंत्री मोदी को खारिज करना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह उनके राजनीतिक आभामंडल की परतों का मुआयना करने का सही वक्त है. मोदी पैसे के लिए राजनीति में नहीं आए हैं. उनके लिए यह ताकत, प्रतिष्ठा और दंभ का जरिया है. आप उन्हें जितना करीब से देखने की कोशिश करेंगे उतना ही चकित होंगे. मोदी जिस तरह से अपने आप को भाग्य विधाता और भारत के नागरिकों का मसीहा बताने की कोशिश करते हैं, वह किसी को भी चौंकाता है. उनके भाषणों में अक्सर इसकी झलक दिखाई देती है, जिसमें वह यह बताने की कोशिश करते हैं कि वह अकेले किस तरीके से सभी वादों को पूरा कर सकते हैं और बाकी लोग उन वादों को पूरा करने में विफल रहे हैं.

चाहे मामला गुजरात का हो या देश का. दोनों ही मामलों में वह अपने आप को किसी चक्रवर्ती सम्राट की तरह प्रोजेक्ट करते हैं. न्यूयॉर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डेन, सिडनी का अल्फोंस एरेना या फिर लंदन का वेंबले स्टेडियम हो, हर जगह वे पूरी योजना के साथ किसी रॉक स्टार की तरह मंच सजाते हैं. इतनी सारी चमक-दमक और हो-हल्ले वाला आयोजन यह जाहिर करता है कि उनमें खुद को सुर्खियों में बनाए  रखने की असीमित भूख है. विदेश में मोदी की सभाओं का आयोजन न तो विदेश मंत्रालय करता है और न ही इसका खर्चा मेजबान मुल्क उठाते हैं. इसका पूरा आयोजन उनके भक्तों की फौज करती है.

क्या मोदी के मन में कहीं वह बात बैठी हुई है कि अतीत में पश्चिमी मुल्कों और वहां के नेताओं ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वो 'हकदार' थे? और इसीलिए शायद वो हर विदेशी दौरे में अपने भक्तों की तरफ से आयोजित रॉक स्टार जैसी सभाओं में मेजबान मुल्क के मुखिया को भी आमंत्रित करते हैं?

सुरक्षा के आवरण में

बार-बार खुद को चाय वाला बताकर वो एक भावनात्मक खोल अपने आसपास बनाए रखते हैं. अपनी चायवाला छवि के जरिए वो खुद को ऐसे पेश करते हैं जो अन्य नेताओं (अच्छी पृष्ठभूमि और पढ़ा-लिखा) के मुकाबले कहीं ज्यादा योग्य हैं क्योंकि वह एक पिछड़ी हुई पृष्ठभूमि से आया है.

'मन की बात' के जरिये उन्हें भारत की भावी पीढ़ी का रोल मॉडल के तौर पर दिखाने की कोशिश की जाती है लेकिन सच यह है कि अक्सर उनकी बातें प्रेरणाहीन और नीरस होती है. ये सब वो एक खास किस्म के माहौल में करते हैं. वहां एक समर्पित किस्म का श्रोता मौजूद होता है जो उनके आभामंडल से अभिभूत होता है. मसलन बाल दिवस के मौके पर स्कूली बच्चों के सामने की गई बात हो या फिर रेडियो पर होने वाला एकतरफा संवाद जिसमें श्रोता के पास कोई सवाल पूछने का अवसर ही नहीं होता.

शोशेबाजी और दिखावे के प्रति उनका जबर्दस्त रुझान, शानदार कपड़े-लत्ते का शौक, कोई मौजूद न हो तब भी हवा में बार-बार हाथ उठाना, बात-बात में अपनी मां का जिक्र करके गले का रुंध जाना, ये सब अब कहानियों का हिस्सा बन चुका है. गुजरात के उनके एक मित्र बताते हैं, 'उन्हें (नरेंद्र मोदी) दिखावा पसंद है. देव आनंद की तरह हैट के साथ रेड स्कार्फ पहनना, राजेश खन्ना की तरह लहराते हुए बात करना और मंच पर राज कपूर की नकल करना उनकी आदतों में शुमार है.'

इनके भीतर खुद को लेकर आत्मुग्धता बुरी तरह से हावी दिखती है. अपने नामवाला सूट हो, चटख रंगों वाले कपड़े हों या फिर दिन में कई-कई बार कपड़े बदलने की आदत ये सब बताता है कि यह व्यक्ति अपने दिखावे को लेकर कितना व्यस्त रहता है.

सबसे बड़ी बात कि वह कैमरे का इस्तेमाल करना बखूबी जानते हैं. उन्हें पता है कि टेलीविजन को क्या चाहिए. जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने टीवी इंटरव्यू देने के लिए एक विशेष स्टूडियो बनाया था जिसमें उनकी कुर्सी की पोजिशनिंग तक का ख्याल रखा गया था. न्यूज चैनलों के कैमरामैन को यहां तक बताया जाता था कि उन्हें कैमरा कहां रखना है.

चीन के प्रधानमंत्री शी जिनपिंग के साथ झूला झूलने का मामला हो या फिर अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ लाइव चाय पीना या फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रैंकॉइस ओलांद के साथ बोट पर सैर. यह सब कुछ खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित करने की रणनीति के साथ किया गया. तीनों मुलाकातों में दर्शकों को उनके बीच हुई बातचीत की भनक तक नहीं लगी. उनके हिस्से में बस दुनिया के बड़े नेताओं के साथ मोदी की निकटकता की तारीफ करना ही आया.

ओल्ड हैबिटडाइ हार्ड

मोदी बेहद शातिराना तरीकों से शीर्ष पर पहुंचे हैं और वहां बने रहने के लिए उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं. गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कभी भी अपने फायदे के लिए दूसरों का इस्तेमाल करने में झिझक महसूस नहीं की. उन्होंने अपनी ही पार्टी में बंटवारा कर दिया और उन तमाम मंत्रियों को किनारे लगा दिया जिनकी मदद से उन्होंने खुद को मुख्यमंत्री पद पर मजबूत किया था.

जब वो प्रधानमंत्री बने तब सबसे पहले उन्होंने उन लोगों को ठिकाने लगाने का काम किया जो उनसे सवाल कर सकते थे या फिर जिनका राजनीति अनुभव उनसे ज्यादा था.

जिस तरह से उन्होंने 2002 के दंगों को संभाला उससे स्पष्ट होता है कि उनके दिल में सहानुभूति या हमदर्दी नाम की कोई चीज नहीं है. यही बात उनके काल में गुजरात में आतंकवाद के नाम पर हुई तमाम फर्जी मुठभेड़ों से भी साबित हुई.

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी निर्दयता के ये गुण बार-बार परिलक्षित हुए हैं. मोदी की नैतिकता का दायरा बेहद संकीर्ण है. दूसरों के दुख और पीड़ा से उन्हें ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. देश में बढ़ती असहिष्णुता का मामला हो, लेखकों और तर्कवादियों की हत्या हो, बीफ खाने की अफवाह पर की गई निर्दोष की हत्या हो या फिर मवेशियों को ले जा रहे लोगों के साथ हुई मारपीट हो, मोदी की प्रतिक्रिया बेहद देर से, आधी-अधूरी और बेमन से आई.

बावजूद इसके वे विदेशों में देश के संविधान की तारीफ करते हैं, राष्ट्र की विविधता का सम्मान करने की बात करते हैं, नागरिकों के अधिकारों की स्वतंत्रता की बात करते है. देश के बाहर वे स्टेट्समैन का मुखौटा ओढ़े रहते हैं, लेकिन देश में आकर उनका रवैया बिल्कुल अलग हो जाता है. यहा वे हर चीज में मोल-तोल और निर्दयता का चोला पहन लेते हैं.

फीकी पड़ी चमक

मोदी चाहते हैं कि लोग उनकी उन झूठी बातों पर यकीन करें जो उन्होंने अपने बारे में खुद गढ़ी हैं. लेकिन पिछले 18 महीनों में उनकी पोल खुलने लगी है.

वह संसद चला पाने और आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को आगे बढ़ा पाने में बुरी तरह विफल रहे हैं. विपक्ष और अपनी ही पार्टी के सांसदों के प्रति उनका रवैया अहंकारी और मगरूर शासक के जैसा है. अपने सांसदों के प्रति स्कूल मास्टर वाले रवैए से पार्टी के तमाम सांसद नाराज हैं. इसके अलावा उनमें अपनी आलोचना सुनने का धैर्य भी नहीं है.

जिन लोगों को उनके आने के बाद आर्थिक सुधारों के मोर्च पर चमत्कार की उम्मीद थी वे अब निराश हो चले हैं, इनमें उनकी समर्थक बैंकर लॉबी भी है. जिन लोगों को नई नौकरियां सृजित होने की उम्मीद थी उनकी सारी आशा अब उस 15 लाख रुपए पर टिक गई है जिसे मोदी विदेश से काला धन लाने के बाद उनके अकाउंट में डालने वाले थे. (हालांकि मोदी ने इसे जुमला बताकर इससे किनारा कर लिया है).

'मोदी-मोदी' का जाप करने वालों में सिर्फ वही लोग रह गए हैं जिन्हें हम-आप अनिवासी भारतीय कहते हैं, जिन्होंने बहुत पहलेे भारत की नागरिकता पर किसी और देश की नागरिकता को तरजीह दी थी.

आने वाले समय में मोदी की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. बिहार चुनाव के नतीजों ने उनकी स्थिति को बुरी तरह से कमजोर किया है.

आने वाले साल में कई बड़े राज्यों के चुनाव होने हैं. मई-जून 2016 में पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव होने हैं. वहीं पंजाब, मणिपुर और गोवा में मार्च 2017 में विधानसभा के चुनाव होंगे. उसी के साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी चुनाव होंगे.

चूंकि विपक्ष ने गठबंधन की राजनीति के फायदे को सममझ लिया है. लिहाजा अब सिर्फ मोदी के दम पर कोई बड़ा चुनाव जीतने की कल्पना भी भाजपा नहीं करेगी.

पश्चिम बंगालअसमपंजाब और उत्तर प्रदेश का चुनाव हारने की स्थिति में मोदी की चमक और फीकी पडे़गी

जिस तरह की मोदी ने अपनी छवि गढ़ रखी है उसे देखते हुए उनके लिए विफलता को संभालना और भी मुश्किल होगा बनिस्बत उनकी सफलता के. शायद भारतीयों ने बहुत जल्दी इस बात को समझ लिया है कि जिस मसीहा को वे अपना तारणहार समझ कर ले आए थे असल में कोई स्टेट्समैन नहीं बल्कि आत्मुग्धता का शिकार एक बहुरूपिया है

First published: 23 November 2015, 13:31 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

Editor of Catch News, Bharat has been a hack for 25 years. He has been the founding Editor of Mail Today, Executive Editor of the Hindustan Times, Editor of The Telegraph in Delhi, Editor of the Express News Service, Washington Correspondent of the Indian Express and an Assistant Editor with The Times of India.

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