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नैतिकता की खाल में आखेटक मीडिया

अतुल चौरसिया | Updated on: 3 September 2016, 7:46 IST

नैतिकता के ऊपर श्रीलाल शुक्ल द्वारा लिखी अमर कृति राग दरबारी में बहुत करीने से रोशनी डाली गई है. उपन्यास के दो पात्रों मालवीयजी और गयादीन के बीच नैतिकता को लेकर दिलचस्प विमर्श है, इसका संक्षिप्त अंश एक बार फिर से पढ़ा जाना चाहिए-

मालवीयजी को गयादीन की चिन्ताधारा बहुत ही गहन जान पड़ी. गहन थी भी. वे अभी किनारे पर बालू ही में लोट रहे थे. बोले, "गयादीनजी, मै जानता हूं कि इन बातों से हम मास्टरों का कोई मतलब नहीं. चाहे कालिज के बदले वैद्यजी आटा चक्की की मशीन लगवा लें, चाहे प्रिंसिपल अपनी लड़की शादी कर लें, फ़िर भी यह संस्था है तो आप लोगो की ही! उसमें खुलेआम इतनी बेजा बाते हो! नैतिकता का जहां नाम ही न हो!"

इतनी देर में पहली बार गयादीन के मुंह पर कुछ परेशानी-सी झलकी. पर जब वे बोले तो आवाज वही पहले-जैसी थकी-थकी सी थी. उन्होंने कहा, "नैतिकता का नाम न लो मास्टर साहब, किसी ने सुन लिया तो चालान कर देगा."

लोग चुप रहे. फ़िर गयादीन ने कुछ हरकत दिखायी. उनकी निगाह एक कोने की ओर चली गयी. वहां लकड़ी की एक टूटी-फ़ूटी चौकी पड़ी थी. उसकी ओर उंगली उठाकर गयादीन ने कहां, "नैतिकता, समझ लो कि यही चौकी है. एक कोने में पड़ी है. सभा-सोसायटी के वक्त इस पर चादर बिछा दी जाती है. तब बड़ी बढ़िया दिखती है. इस पर चढ़कर लेक्चर फटकार दिया जाता है. यह उसी के लिए है."

सीडी सियासी हत्या का सबसे कारगर हथियार रहा है, सेक्स इसका सबसे जरूरी अवयव है, जिससे इसे नैतिक वैधता मिलती है

आजकल टेलीविजन मीडिया का एक हिस्सा भी नैतिकता की इसी टूटी-फूटी चौकी पर अपनी चादर बिछाकर लेक्चर फटकार रहा है. 'आप' नेता और मंत्री संदीप कुमार के अंतरंग पलों की सीडी सामने आने के बाद देश (जिसे टेलीविजन का परदा माना जाय) में नैतिकता के हथियार पर नए सिरे से शान चढ़ाई जा रही है. कुछ टीवी चैनलों पर इस बाबत बड़ी-बड़ी चर्चाएं आयोजित की गईं. विपक्षी पार्टियों का शोरगुल तो फिर भी समझ में आता है लेकिन जिस तरह से टीवी मीडिया का एक हिस्सा इस मामले में आखेटक की भूमिका निभा रहा है उसे और किस तरह से देखा जाय?

सियासत में अब सीडी का कारोबार भी पुराना हो चला है, हालांकि सीडी से पहले भी इस तरह के खटकरम सियासी हत्या, घात-प्रतिघात का सबसे कारगर हथियार रहे हैं. सेक्स इसका सबसे जरूरी अवयव है जिसके सहारे नैतिकता की बहस बड़ी आसानी से वैधता का चोला धर लेती है. कभी स्टिल फोटो के जरिए, कभी वीडियो टेप के जरिए तो कभी सिर्फ ऑडियो के जरिए.

अस्सी के दशक में बाबू जगजीवन राम और उनके बेटे सुरेश राम का राजनीतिक जीवन इसी तरह की सेक्स तस्वीरों के जरिए खत्म कर दिया गया था. मेनका गांधी की पत्रिका सूर्या ने तब बाबू जगजीवन राम के पुत्र सुरेश राम के अंतरंग संबंधों की तस्वीरें छाप कर पीत पत्रकारिता की दुनिया में झंडा गाड़ दिया था.

उस दौर में बाबू जगजीवन राम बहुत बड़े कद के नेता थे और कहा जाता है कि इंदिरा गांधी उनके इस बड़े कद से चिंतित रहा करती थी. लिहाजा उनकी शह पर उनकी बहू की पत्रिका ने यह काम अंजाम दिया.

कानून की नजर में कोई अपराध नहीं

राजनीति और मीडिया में इस तरह के काम धड़ल्ले से होते रहे हैं. लोगों के निजी जीवन में भी ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं. हमने अमर सिंह की बिपासा बसु से बातचीत भी रस लेकर सुना, कभी संघ के बड़े प्रचारक रहे संजय जोशी को इसी तरह की एक सीडी के जरिए संघ और भाजपा में किनारे लगा दिया गया. कहते हैं कि संजय जोशी ने वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी प्रतिद्वंद्विता की कीमत चुकाई. कांग्रेस के बड़े नेता अभिषेक मनु सिंघवी की एक कथित सीडी भी देश ने देखी. ये उसी भाजपा और कांग्रेस के लोग हैं जिनके लोग आज 'आप' की नैतिकता का चीरहरण करने में लगे हुए हैं.

दरअसल मीडिया भी इस पूरी व्यवस्था में मौजूद दोहरेपन का शिकार है और उसी कीचड़ में मछली मार रहा है. उसे शायद यह पता भी हो कि कानून की नजर में यह कोई अपराध नहीं है कि दो वयस्क आपसी सहमति से किसी तरह के संबंध में हैं. यह तभी अपराध की श्रेणी में आता है जब या तो महिला ने किसी तरह की शिकायत दर्ज कराई हो या फिर पुरुष के परिजनों की इस संबंध को लेकर कोई आपत्ति हो. लेकिन वह मीडिया फिर भी मानता नहीं.

दो वयस्क आपसी सहमति से अगर किसी तरह के संबंध में हैं तो यह कानूनी रूप से अपराध नहीं है.

सिर्फ सार्वजनिक जीवन में होना ही इस बात की गारंटी हो जाय कि आप तमाम मानवीय भावनाओं और इच्छाओं से ऊपर उठ जाय तो यह बेहद बचकानी सोच होगी. फिर भी नैतिकता की ढोल चैनलों में बज रही है, जमकर बज रही है.

संदीप कुमार के मामले में अगर कोई अपराधी है और कानून के शिकंजे में आ सकता है तो वह व्यक्ति है जिसने किसी के बेडरूम में घुसकर उसके नितांत निजी क्षणों को सार्वजनिक करने का अपराध किया है.

लेकिन हमारा एक सच हमारा समाज है. वही समाज जो अपने अंदर इतने विरोधाभास समेटे हुए है कि उसकी नैतिकता का तर्क वहीं धराशायी हो जाय, लेकिन यह हाय-हाय करना भी यहां राष्ट्रीय परंपरा का हिस्सा बन चुका है जिसे निभा कर हम मान लेते हैं कि समाज स्वच्छ हो गया, नैतिकता बहाल हो गई.

दहेज जमकर ली जा रही है, दी जा रही है. महिलाएं यहीं सबसे ज्यादा दुर्दशा की शिकार हैं. दलित हर दिन जातिगत श्रेष्ठता बोध का शिकार बन रहा है, अल्पसंख्यकों को गुंडा-बदमाश बना कर हमारे अवचेतन में बिठा दिया गया है. भ्रष्टाचार के रूप में हमारे-आपके बीच के ही लोग हमसे-आपसे उगाही करने में एकदम नहीं सकुचाते. इन तमाम बेशर्मियों की मौजूदगी में भी हमारी महान संस्कृति सदियों से कायम है.

इस सच्चाई के बरक्स जब हम टीवी चैनलों की वर्तमान हायतौबा पर नजर डालते हैं तब हमें कुछ चीजें समझने में आसानी होती है. इन चैनलों के भीतर का माहौल इतना भयावह है कि एक चैनल के दरवाजे पर उसकी प्रमुख महिला एंकर ने जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. उसका आरोप भी दैहिक शोषण का था. नैतिकता के इस सामूहिक विलाप में वह चैनल भी शामिल है.

मीडिया के खंडहर में इस तरह की अनगिनत कहानियां दफन कर दी गईं जिन्हें खंगाल कर इसके दिवालिएपन का अंदाजा मिलेगा

दरअसल यह विलाप हमारा स्थायी भाव है. लोग इसे चमड़ी का मोटा हो जाना भी कहते हैं. यह मामला पर उपदेश कुशल बहुतेरे से भी थोड़ा आगे का है. अपना दामन झीना होने के बावजूद दूसरों को उपदेश देने में कतई झिझकना नहीं है.

आज जो चैनल संदीप कुमार के बहाने नैतिकता की ठेकेदारी कर रहे हैं उनका अतीत इस बात के लिए खंगाला जाना चाहिए कि जब-जब उनके यहां इस तरह के मामले सामने आए तब उनकी और बाकी चैनलों की प्रतिक्रिया क्या रही थी.

मीडिया के खंडहर में इस तरह की अनगिनत कहानियां दफन कर दी गईं. एक पत्रकार होने के नाते हम और तमाम लोग आए दिन मीडिया में होने वाली इस तरह की घटनाओं को सुनते रहते हैं. अक्सर एक तर्क आता है कि दोनों पक्षों की सहमति का मामला था. लेकिन यही तर्क संदीप कुमार पर चैनल लागू नहीं करते.

नैतिकता की ठेकेदारी कर रहे हैं चैनल

समस्या की जड़ यही है कि मीडिया को समाज के आगे-आगे चलना चाहिए था लेकिन वह समाज के पीछे उसके विरोधाभासों, दोहरेपन और पाखंड का पिछलग्गू बन गया है.

इसके पीछे सिर्फ उसकी व्यावसायिक मजबूरियों का तर्क नहीं माना जा सकता. कहीं न कहीं यह पूरे समाज में हिलोरे लेती उस वायरिज्म (दर्शनरति) की प्रबल भावना है जो टीवी चैनलों के परदे पर चुन-चुन कर छलकती रहती है. दर्शनरति यानी किसी के अंतरंग पलों को उसकी जानकारी के बिना निहारना और संतुष्ट हो जाना.

वायरिज्म (दर्शनरति) की प्रबल भावना है जो टीवी चैनलों के परदे पर चुन-चुन कर छलकती रहती है

जिस मीडिया की कोशिश यह होनी चाहिए थी कि वह लोगों को मन मिजाज से देश के कानून को, उसकी अवधारणा का, निजता का सम्मान करने के लिए तैयार करता वह उल्टे उसकी खाप मानसिकता को पुचकारने के काम में लीन है.

ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं होता जब 'आप' का शीर्ष नेता दस मिनट के अंदर सीडी देखकर अपने सिपाही को 140 शब्दों के मंच पर बर्खास्तगी का ऐलान कर देता है, उसे सफाई का मौका दिए बिना, सीडी की सत्यता की कानूनी पुष्टि किए बिना. जज, मुंसिफ और मुद्दई सब वही है.

यह सब करने के बाद वह नेता खुद भी विजयी भाव लिए नैतिकता की उसी अंधी सुरंग में जा घुसता है जहां पहले से ही कुछ लोग हाय-हाय कर रहे थे. उसका तर्क होता है हमने कर दिखाया दस मिनट के भीतर, अब तुम करो.

यह खतरनाक स्थिति होती है. मीडिया के आखेटकों को एक फर्जी ताकत का भान होता है कि उनके पुरुषार्थ से ही यह जीत संभव हुई है लिहाजा वो और बड़ी कीमत मांगने के लिए ऊंचे सुर में हाय-हाय करने लगते हैं. अब आवाज आने लगती है कि नैतिकता के नाम पर अरविंद केजरीवाल इस्तीफा दें.

यह आवाज तब तक आती है जब तक चौकी पर चादर बिछी है. जल्द ही चादर उड़ जाती है, चौकी फूहड़ और बदरंग नजर आने लगती है. यही मीडिया की नैतिकता है.

First published: 3 September 2016, 7:46 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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