Home » इंडिया » Meet Bundelkhand's drought refugees at Delhi's Sarai Kale Khan
 

दिल्ली में बढ़ रही बुंदेलखंड के विस्थापितों की संख्या

(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • अप्रैल महीने की शुरुआत में न्यूज 18 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2015 से मार्च 2016 के बीच बुंदेलखंड से दिल्ली आने वाले लोगों की संख्या करीब 18 लाख है.
  • विशेषज्ञों का मानना है कि 18 लाख का आंकड़ा बेहद कम है क्योंकि इसमें बच्चों और अन्य स्टेशनों से बिना टिकट आने वाले लोगों का आंकड़ा शामिल नहीं है. इसमें बसों से आने वाले लोगों का भी आंकड़ा शामिल नहीं है.

दिल्ली के सराय काले खां पर सुबह के साढ़े सात बजे के करीब आम तौर पर होने वाली चहल-पहल के बीच एक अजीब तरह का सन्नाटा था.

फ्लाइओवर के नीचे आपको बड़ी संख्या में यात्रियों का हुजूम दिखेगा तो दूसरी तरफ वैसे कई लोग दिखाई देंगे, जो अपने सामान के साथ इसके नीचे गुजर बसर करते दिखेंगे. इनके चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं होता है. पूरा फ्लाइओवर बुंदेलखंड से आए सूखा प्रभावितों का ठिकाना बन गया है. इन लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती काम है जिसके बदले में इन्हें मजदूरी मिलती है.

बुंदेलखंड के शरणार्थी

यमुना दास की उम्र 55 साल है. वह एक प्लास्टिक पर बैठे हुए हैं जहां पर सैंकड़ों लोग बैठे हैं. दास को पहली रोटी का इंतजार है. उनकी पत्नी कमला खाना बनाने में जुटी हैं जिससे इस परिवार को दिन का पहला खाना मिलेगा. बुंदेलखंड के टीकमगढ़ से दास के परिवार को दिल्ली आए चार हफ्ते होने जाने को है. दास के पास दो बीघा जमीन है जिसमें उन्होंने गेहूं की खेती की है. लेकिन पिछले दो सालों से फसल खराब हो रही है.

सबसे बुरी स्थिति यह है कि उन्हें मनरेगा के तहत भी 30 दिनों का काम मिला. जबकि इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिनों के काम की गारंटी मिलती है. सूखा प्रभावित क्षेत्रों में इस योजना के तहत 150 दिनों का काम मिलने की गारंटी होती है. 

दास को अभी तक उनके फसल के नुकसान का कोई मुआवजा भी नहीं मिला है. इसके बाद दास के पास दो ही विकल्प था. या तो वह टीकमगढ़ में भूखे सोते या फिर दिल्ली आते. दिल्ली में इससे पहले एक बार किसी ठेकेदार के लिए काम कर चुके दास ने दूसरा विकल्प चुना.

दास, कमला और उनके बेटे बबलू और उनकी पत्नी एवं बच्चे गैर आरक्षित सीट पर बैठकर टीकमगढ़ से निजामुद्दीन पहुंचे. इसके बाद वह सराय काले खां फ्लाइओवर गए  और फिर अपनी प्लास्टिक बिछाई. इसके बाद से दास यहां इंतजार कर रहे हैं. दास बताते हैं, 'अभी तक कोई ठेकेदार सामने नहीं आया है. हम और इंतजार करेंगे. अगर हमें कोई काम नहीं मिलता है तो हम ग्वालियर या आगरा चले जाएंगे.'

बुंदेलखंड से पलायन

अप्रैल महीने की शुरुआत में न्यूज 18 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2015 से मार्च 2016 के बीच बुंदेलखंड से दिल्ली आने वाले लोगों की संख्या करीब 18 लाख है. पलायन के आंकड़े बुंदेलखंड से दिल्ली आने वाली ट्रेनों के गैर आरक्षित सीटों की संख्या के आधार पर निकाले गए हैं. पूरा आंकड़ा आबादी का करीब 10 फीसदी है.

अटारा से 99,294 जबकि बांदा से 10,3567, झांसी से 74,5968, मौरानीपुर से 66,939, खजुराहो से 171,852, कुलपहाड़ 28, 920, हरपालपुर से 170,821, माणिकपुर 54, 657 और चित्रकोट से 61,452 लोग दिल्ली आए हैं.

इनमें पहली बार दिल्ली आए लोगों का भी आंकड़ा शामिल है. दास भी इन्हीं में से एक है. विशेषज्ञों का मानना है कि 18 लाख का आंकड़ा बेहद कम है क्योंकि इसमें बच्चों और अन्य स्टेशनों से बिना टिकट आने वाले लोगों का आंकड़ा शामिल नहीं है. इसमें बसों से आने वाले लोगों का भी आंकड़ा शामिल नहीं है.

स्वराज अभियान के प्रेसिडेंट  योगेंद्र यादव ने कहा, 'जब मैं झांसी स्टेशन पर था तो लोग दिल्ली आने वाली ट्रेन का टिकट लेने के लिए लाइन में खड़े थे. बुंदेलखंड में विस्थापन सामान्य बात है लेकिन यह दीवाली बाद ही होता है. इस बार गर्मियों में दिल्ली आने का मतलब है कि सूखे की वजह से किसानों पर बेहद बुरा असर पड़ा है. अगर ढंग से अध्ययन किया जाए तो यह आंकड़ा 18 लाख से अधिक होगा.' योगेंद्र यादव हाल ही में बुंदेलखंड से पद यात्रा कर वापस लौटे हैं.

यादव बताते हैं, 'केवल गरीब भूमिहीन मजदूर ही विस्थापित नहीं हुए हैं. जिनके पास जमीन है वह भी इस बार बर्बाद हो चुके हैं. इन जमीन मालिकों को भी शहरों की तरफ आना पड़ा है.'

लोगों में गुस्सा

पूनम सुबह चार बजे उठती हैं. उन्हें सुबह में इसलिए जल्दी उठना पड़ता है क्योंकि उन्हें सुबह होने सेे पहले टॉयलेट का इस्तेमाल कर लेना होता है. उनके पति संतोष बताते हैं, 'हमारे पास टॉयलेट का इस्तेमाल करने के लिए भी पैसे नहीं हैं.' संतोष और उनकी पत्नी एवं बच्चे के हर महीने का टॉयलेट खर्च करीब 600 रुपये बैठता है.

पीने के पानी के लिए इनके पास रेलवे स्टेशन का ही विकल्प है. अधिकांश नाश्ते में पानी पीते हैं और फिर गुरुद्वारा के स्वयंसेवकों का इंतजार करते हैं जो इनके लिए प्रसाद लेकर आते हैं. हर दिन इन्हें काम मिलने की उम्मीद होती है लेकिन ऐसा होता नहीं है.

करीब आठ दिन पहले बुंदेलखंड के टीकमगढ़ से दिल्ली पहुंचे राकेश बताते हैं, 'पहले हमें मनरेगा के तहत आसानी से काम मिलता था. हमें फसलों के नुकसान के बाद बीमा की रकम भी मिल जाती थी. उस वक्त हमारे पास कम से कम पानी और खाना होता था लेकिन नई सरकार के आने के बाद सब बदल गया है. हमारी स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है.'

लोग फिर जमा हो जाते हैं और सरकार को कोसने लगते हैं. संतोष कहते हैं, 'प्रधानमंत्री हमेशा बाहर ही होते हैं. उन्हें गरीबों की दयनीय स्थिति के बारे में क्या पता होगा?'

बुंदेलखंड से आए बच्चों को दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है

बुंदेलखंड से आए कई परिवारों के बच्चे पास के सरकारी स्कूल में भी नहीं जा सकते हैं जहां उन्हें मध्याह्न भोजन योेजना का खाना मिल सके. अशिक्षा और कुपोषण की वजह से बच्चों को बाल मजदूरी और भीख मांगने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

हर शाम फ्लाइवे के नीचे रिक्शा वालों की भीड़ जमा हो जाती है. महेश गुहा रिक्शा वालों को बस स्टॉप के पास रिक्शा खड़ा करने के लिए कहते हैं. गुहा बताते हैं, 'मुझे परिवार के साथ लेह जाना है. वहां मुझे छह महीनों के लिए काम मिला है.' 

गुहा इस जगह एकमात्र वैसेे व्यक्ति हैं जो यहां मदद करने में लगे हुए हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंंने जो संपर्क बनाए हैं उससे उन्हें मदद मिलेगी. उनके पास एक और व्यक्ति आता है. यह आदमी कई तरह के काम जानता है. उनके ठेकेदार ने उन्हें प्रतिदिन 500 रुपये देने का वादा किया है. उनकी पत्नी तीजा के दो छोटे बच्चे हैं. वह भी कंस्ट्रक्शन साइट पर अपने पति के साथ काम करेंगी.

गुहा बताते हैं, 'हम पहली बार लेह जा रहे हैं.' वह दिल्ली से बस के जरिये 38 घंटे की यात्रा कर लेह जाएंगे. तीजा साड़ी पहने उनके पास खड़ी हैं. लेकिन उनके पैरों में चप्पल नहीं है. जब उनसे यह पूछा कि क्या उनके पास गर्म कपड़े और जूते हैं. वह हंसते हुए कहती हैं, 'हम वहां जाने के बाद देखेंगे कि क्या हो सकता है. हम बस से उतरने के बाद देखेंगे कि क्या किया जा सकता है.'

First published: 6 June 2016, 14:24 IST
 
अगली कहानी