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मोदी मॉडल के मस्कट हैं हंसमुख अधिया

राजीव खन्ना | Updated on: 13 December 2016, 8:09 IST
(प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया )
QUICK PILL
  • 1981 के बैच के आईएएस अधिकारी हंसमुख अधिया ने सालों तक गुजरात में काम करने के बाद अपनी जगह नरेंद्र मोदी के ख़ास सिपहसालारों में बना ली है. 
  • हालांकि तमाम कारगार सुझावों के बाद नोटबंदी नीति के उनके आइडिया की आलोचना भी देशभर में हो रही है. 

राजस्व सचिव हंसमुख अधिया नरेंद्र मोदी की राजनीति और प्रशासन के ब्रैंड का मस्कट हो सकते हैं. अधिकारियों का मानना है कि मोदी का प्रशासन काफी कुछ गुजरात मॉडल पर है. सभी जानते हैं कि 500 और 1000 के नोटों को हटाने का सुझाव देने वालों में एक अधिया भी थे. 

उन्होंने लंबे समय तक गुजरात मॉडल को चलाया है, जिसमें प्रशासन, अध्यात्म, प्रबंधन और नियंत्रण के जुनून का मिला-जुला रूप था. इस मॉडल में नई अवधारणों को लेकर बराबर प्रयोग होते रहे हैं. नोटबंदी उनका ताजा प्रयोग है, जिसने आम आदमी के जीवन में दुश्वारियां बढ़ाईं और काले धन पर अंकुश लगाने के अपने मकसद में पूरी तरह विफल रहा.

अधिया 1981 के बैच के आईएएस अधिकारी हैं और गुजरात के लोहाना समुदाय से हैं. यह समुदाय बिजनेस में काफी चतुर माना जाता है. मोदी के विश्वस्त लोगों में उनके अलावा एक और लोहाना समुदाय से हैं, परिमल नाथवानी, जो झाडखंड से राज्य सभा के सांसद हैं. इनका रिलायंस इंडस्ट्रीज में काफी प्रभाव है.

हंसमुख अधिया

अधिया के अकादमिक कॅरियर से उनकी शख्सियत समझने में मदद मिलती है. 1981 में कॉमर्स में स्नातकोत्तर की डिग्री, 2003 में बंगलुरू आईआईएम से जन नीति और प्रबंधन में डिप्लोमा और फिर यहीं स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय से योग में पीएचडी. उनकी थीसिस ‘प्रबंधन पर योग के प्रभाव’ पर है.

गुजरात में अधिया को मोदी का खास आदमी माना जाता था. ये उन नौकरशाहों में थे, जो मोदी के मीडिया से दूरी बनाए रखने के निर्देशों को गंभीरता से मानते थे. उन्होंने कभी मीडिया से बातचीत को बढ़ावा नहीं दिया और नौकरशाहियों के सर्किल में भी ज्यादा घुसते नहीं थे. 

ख़ास सिपहसालार

2001 में कच्छ के भूकंप और 2002 में सामूहिक हत्या के बाद जब मोदी राज में भाजपा की लोकप्रियता अचानक गिरने लगी थी, अधिया ने इस मुश्किल घड़ी में मोदी की छवि फिर से बनाने में अहम भूमिका निभाई. बदले में मोदी ने उन्हें अपने विश्वस्त लोगों में शामिल कर लिया. उन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय में अतिरिक्त मुख्य सचिव का पद दिया.

उद्यम विभाग में रहने के दौरान अधिया ने 2003 में वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट लॉन्च करने में मदद की. इस समिट के बाद मोदी के राज में गुजरात मुख्य औद्योगिक स्थल बना और लगातार बना रहा. उसके बाद कई अन्य राज्यों ने इसका अनुसरण किया. 

अधिया को 2003 के कर्मयोगी अभियान के लिए बेहतर जाना जाता है. इसके माध्यम से उन्होंने ‘बेहतर शासन के लिए गुजरात के डूबते प्रशासन को उबारा.’ हालांकि उसका प्रचार मोदी के नाम से किया गया था, पर सारा खेल अधिया का था. 

इस अभियान ने काफी लोगों का ध्यान खींचा और आलोचना भी हुई कि तालुका स्तर पर प्रशासन में जो स्टाफ पहले से कम था, उस पर इससे काफी बोझ बढ़ गया. कई लोगों ने इसे 2002 में हुई हिंसा से बनी मोदी की खराब छवि को ‘अच्छी’ बनाने की कोशिश माना. 

मोदी के कर्मयोगी

उसके बाद आए चिंतन शिविर, जहां वरिष्ठ नौकरशाहों के लिए मोदी की गुप्त सभाएं होती थीं. पहले राज्य स्तर पर, बाद में जिला और फिर तालुका स्तर पर. इसके पीछे भी अधिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही. उन्हें अक्सर मोदी का प्रमुख कर्मयोगी कहा जाता था, इन इवेंट्स में वे ही योग के सेशन रखवाते थे. इन शिविरों में आने वालों के लिए योग करना अनिवार्य था. 

जब वे पीएचडी पूरी करने के बाद प्रशासन में लौटे, तो उन्होंने गुजरात प्रशासन को जापानी कायजन दर्शन से भी परिचित करवाने का प्रयास किया. उन्होंने लोगों के काम और निजी कौशल में निरंतर सुधार के लिए जापान के बिजनेस दर्शन को लागू करने के प्रयोग किए. 

हालांकि गुजरात के प्रशासन को दशकों से कवर कर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, ‘शायद वे भूल गए हैं कि भारत में यह जापान नहीं, गुजरात है. ऐसी कवायद केवल वहीं चल सकती है. पर इससे उनके प्रयोग करते रहने की प्रवृति सामने आती है.’

लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कन्या केलावणी और गुणोत्सव अभियान शुरू किए गए. इनका लक्ष्य प्राथमिक स्कूलों में बच्चियों की संख्या बढ़ाना था. इसका श्रेय भी अधिया को दिया जाता है. गुजरात सरकार का दावा है कि इससे ग्रामीण इलाकों में काफी बदलाव आया, खासकर जनजातीय इलाकों में, पर एक एनजीओ ने इनके दावों पर विवाद खड़ा किया.

चोपड़ी नहीं चोपड़ा

2010 में शिक्षा विभाग में अधिया ने ‘वांचे गुजरात’ लॉन्च किया. यह मुहिम ‘अच्छी किताबें’ पढऩे के विचार से शुरू किया गया था ताकि गुजरात को ‘सुपठित समाज’ बनाया जा सके. इसके पीछे तर्क यह था कि गुजरात को उद्यमियों और कारोबारियों का राज्य माना जाता है और यहां लोगों में अच्छी किताबें पढऩे की आदत नहीं है. वे ‘चोपड़ा’ रखने में माहिर थे, ‘चोपड़ी’ में नहीं.

इसके बाद से 50 लाख से ज्यादा छात्र लाइब्रेरी में रोज एक घंटा पढऩे लगे. मोदी ने भी गांधीनगर की सेंटल लाइब्रेरी में एम.के. गांधी की ‘हिंद स्वराज’ पढ़ी. पर यह अभियान उस समय पीछे छूट गया जब मोदी और उनकी टीम और नए विचार और, और नए अभियानों के साथ आई.

अधिया अध्यात्म पर कॉलम लिखते थे और दो किताबें भी लिखी हैं, ‘रिइंवेंटिंग गर्वनमेंट थ्रू एचआरएम स्ट्रेटजीज़’ और ‘माय नोट्स टू मायसेल्फ’. ‘माय नोट्स टू मायसेल्फ’ में उन्होंने ज्यादातर कर्मयोगी अभियान के औचित्य पर लिखा है. 

दिलचस्प है कि अधिया का वित्त विभाग में पहले मुख्य सचिव और बाद में अतिरिक्त मुख्य सचिव के कार्यकाल को किसी भी महत्वपूर्ण आर्थिक फैसले के लिए याद नहीं किया जाता. पत्रकार ने कहा, ‘फिर भी मोदी अपने विश्वासपात्रों को दिल्ली ले आए और उन्हें खासतौर पर वित्त मंत्रालय में रखा.’ 

कहा जाता है कि अधिया का पिछले साल के दो विवादास्पद बजट प्रस्तावों में हाथ था. उनका एक फैसला यह था कि कर्मचारियों के पीएफ या ईपीएफ से आशिंक रूप से कर काटा जाए और गहनों पर एक प्रतिशत उत्पादन शुल्क लगाया जाए. अंतत: सरकार को दोनों पर शर्मसार होना पड़ा. नोटबंदी के मामले में क्या होता है, देखना बाकी है.

First published: 13 December 2016, 8:09 IST
 
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