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जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री होंगी महबूबा

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • मुफ्ती के निधन के बाद अब महबूबा के मुख्यमंत्री बनने की प्रबल संभावना है. लेकिन उन्हें अपने ही कुछ वफादारों से झटका भी मिल सकता है. पार्टी के वरिष्ठ नेता जो मुफ्ती के करीब थे वे महबूबा को पचा नहीं पाएंगे. मुफ्ती के निधन के बाद पीडीपी में एकता को लेकर भी आशंकाएं उभरने लगी हैं.
  • हालांकि महबूबा पार्टी की निर्विवाद नेता हैं. जब नेता श्रीनगर जैसे महफूज इलाके में घूमने से कतराते थे तब भी वो घाटी के भीतरी इलाकों में खुलेआम दौरे कर रही थीं.

1999 में पीडीपी की स्थापना के पहले 151 लोगों के 'विजन डॉक्यूमेंट' पर हस्ताक्षर किए जाने की घटना को कुछ ही लोगों ने गंभीरता से लिया था. पार्टी की कमान मुफ्ती मोहम्मद सईद के हाथ में थी और इस वजह से इसे नजरअंदाज कर दिया गया. 

भारत के पूर्व गृहमंत्री रह चुके मुफ्ती को उस वक्त घाटी में उतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी. अधिकांश लोगों के लिए वह कश्मीर में नई दिल्ली के प्रतिनिधि थे. लेकिन महज तीन सालों के भीतर पीडीपी राज्य की पहली गैर नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार की अगुवाई कर रही थी. जम्मू-कश्मीर में 1975 के बाद से पहली बार ऐसी सरकार बनी जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस की कोई भूमिका नहीं थी.

2002 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को 16 सीटों पर ही सफलता मिली और उसे कांग्रेस से हाथ मिलाना पड़ा. मुफ्ती छह साल के कार्यकाल वाली सरकार के पहले तीन सालों तक मुख्यमंत्री बने और उसके बाद फिर गठबंधन की शर्तों के मुताबिक सरकार की कमान कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद के हाथों में रही.

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या वजह रही जिसके कारण पार्टी रातों रात मुख्यधारा की राजनीतिक ताकत बनने में सफल हो गई. यह सब कुछ मुफ्ती की बेटी महबूबा मुफ्ती की वजह से हुआ जो अब राज्य के अगले मुख्यमंत्री की दावेदार हैं.

लंबा सफर

जब नेता श्रीनगर जैसे महफूज इलाके में घूमने से कतरा रहे थे तब महबूबा घाटी के भीतरी इलाकों में बेबाक घूम रही थीं. महबूबा वैसे वक्त में घाटी में समय बिता रही थी जब आतंकियों का खतरा टला नहीं था. उन्होंने आतंकवादियों और अलगाववादियों के परिवार वालों से मुलाकात करने में भी हिचक नहीं दिखाई. 1999 में वह हिज्ब-उल-मुजाहिद्दीन के ऑपरेशन चीफ आमिर खान के घर भी गईं जिसका बेटा अब्दुल हमीद कथित तौर पर सुरक्षा बलों की हिरासत में मारा गया था.

इस एक कदम से उन्हें घाटी के अलगाववाद समर्थित नेताओं के बीच पहुंच बनाने का मौका मिला और फिर पीडीपी अलगाववादी संगठनों के विकल्प के तौर पर सामने आई जो चुनावी राजनीति का बहिष्कार करते रहे हैं.

महबूबा की रणनीति काम कर गई और उन्हें घाटी में अलगाववादियों का जबरदस्त समर्थन मिला. खासकर जमाते इस्लामी के काडरों ने पार्टी के पक्ष में मतदान करवाया और उन्हें हिज्ब का भी छुपा समर्थन मिला. कुछ का कहना है कि इस वजह से पीडीपी कश्मीर की राजनीति में गहराई तक उतरने में सफल रही.

1999 में महबूबा ने हिज्ब के कमांडर के घर का दौरा किया जिसका बेटा पुलिस बलों की हिरासत में मारा गया था

16 सालों में पीडीपी सशक्त और टिकाऊ राजनीतिक विकल्प बनकर सामने आई है. पार्टी को 2002 में 16 सीटों पर जीत मिली थी जो 2008 में बढ़कर 21 हो गई और अब यह पार्टी 28 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है.

महबूबा इस बीच दो बार लोकसभा और विधानसभा के लिए चुनी गईं लेकिन उन्होंने कोई पदभार नहीं लिया. उन्होंने अपने पिता के साये में काम करने को तरजीह दी. अभी तक उन्होंने अपने पिता को ही आगे रखा. मुफ्ती हालांकि अभी तक पार्टी को एकजुट बनाए रखने में सफल रहे थे और उनकी वरिष्ठता की वजह से भी पार्टी कार्यकर्ताओं का उन्हें आदर और सम्मान मिला.

लेकिन सईद की बीमारी के बाद कमान महबूबा के कंधों पर आ गई. 18 अगस्त को पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलने के दौरान पिता की खराब सेहत का जिक्र कर वह रोने लगीं. उन्होंने कहा, 'उनकी तबीयत ठीक नहीं है. उन्होंने आप सभी के लिए शुभकामनाएं भेजी हैं. आप सभी उनकी लंबी जिंदगी की दुआ कीजिए.'

मुफ्ती उस वक्त राज्य से बाहर मेडिकल चेक-अप के लिए गए हुए थे. वह नौ दिनों बाद लौटे. इस बीच चीफ सेक्रेटरी इकबाल खांडे के अचानक इस्तीफा देने के कारण अटकलों का बाजार गर्म था. मुफ्ती ने 29 अगस्त को लौटकर सभी तरह की अटकलों पर विराम लगा दिया. उन्होंने न केवल विधायकों से मुलाकात की बल्कि कई अहम फाइलों को भी निपटाया. वह दोपहर को घर गए जहां उन्होंने शाम के समय नाबार्ड के चेयरमैन हर्ष कुमार भानवाला से मुलाकात की.

हाल के हफ्तों में फिर से अटकलें लगाई जाने लगीं. यह दिनों दिन थमने की बजाय तेज ही हो रही थी. इस वक्त मुफ्ती ने खुद ही जवाब दिया. कुछ दिनों पहले जम्मू में मीडिया से बातचीत करने के दौरान उन्होंने महबूबा को मुख्यमंत्री का वाजिब उम्मीदवार बताया था. उन्होंने कहा, 'यह एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और महबूबा पार्टी के प्रेसिडेंट के तौर पर काम करती रही है. वह विधायक भी रह चुकी हैं और फिलहाल लोकसभा में सांसद हैं. वह इस काबिल हैं.'

अब इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं था कि महबूबा मुख्यमंत्री बनेंगी लेकिन कब? इसे लेकर इंतजार ही किया जा सकता था. अब सवाल यह है कि मुफ्ती की मौत के बाद क्या होगा?

आगे क्या होगा?

जो संकेत मिल रहे हैं उसके मुताबिक बीजेपी महबूबा की प्रस्तावित दावेदारी को लेकर सहमत नहीं है. पार्टी के वरिष्ठ नेता अविनाश राय ने सत्ता के हस्तांतरण की संभावना को खारिज कर दिया है.

राज्यसभा में बीजेपी के मुख्य सचेतक खन्ना ने कहा, 'इस अफवाह में कोई सच्चाई नहीं है कि जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री को लेकर फैसला हो चुका है.' उन्होंने कहा, 'गठबंधन की सरकार बेहतर तरीके से चल रही है. मुफ्ती और बीजेपी आलाकमान के बीच न तो ऐसी कोई बातचीत हुई है और न ही बैठक.'

2003 में वाजपेयी ने कश्मीर का दौरा किया तब उन्होंने महबूबा के साथ मंच साझा करने से मना कर दिया

हालांकि इसके बावजूद महबूबा को मुख्यमंत्री बनने से नहीं रोका जा सकता. तब क्या होगा? इसे लेकर कोई शंका नहीं है उनकी विचारधारा को लेकर नई दिल्ली कतई सहज नहीं है.

रॉ के पूर्व प्रमुख अमरजीत सिंह दौलत अपनी किताब 'कश्मीर: द वाजपेयी ईयर्स' में बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को भी महबूबा पर हिज्ब के साथ संबंध होने का शक था और उन्होंने 2002 के चुनाव के दौरान आतंकवादियों की मदद ली. इसलिए जब 2003 में वाजपेयी ने कश्मीर का दौरा किया तब उन्होंने महबूबा के साथ मंच साझा करने से मना कर दिया. वह उस वक्त पीडीपी की प्रेसिडेंट थीं.

महबूबा अपनी ही पार्टी में कई लोगों के लिए समस्या बन सकती हैं. उनकी पार्टी में कई ऐसे नेता है जिनकी राजनैतिक समझ एक दूसरे से बिलकुल भी मेल नहीं खाती है. पूर्व डिप्टी सीएम मुजफ्फर हुसैन बेग और पूर्व वित्त मंत्री तारिक हमीद खान पार्टी आमने-सामने की स्थिति में है. अभी यह दोनों नेता सांसद हैं.

बेग राज्य सरकार और पीडीपी की आलोचना कर चुके हैं वहीं कारा बीजेपी के साथ हाथ मिलाए जाने के फैसले की आलोचना कर चुके हैं. ऐसा करते हुए उन्होंने घाटी में गठबंधन सरकार के खिलाफ बढ़ते असंतोष को अपने पाले में करने की कोशिश की है.

महबूबा को अपने वफादारों की तरफ से भी झटका मिल सकता है. जो ऐसे नेता हैं वह मुफ्ती के करीबी थे न कि महबूबा के. ऐसे में निश्चित तौर पर वह महबूबा को मुख्यमंत्री बनने देने में देरी कराएंगे. मुफ्ती के जाने के बाद पीडीपी में एकता को लेकर कई आशंकाएं उभरने लगी हैं.

हालांकि महबूबा के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि मुफ्ती खुद उन्हें इस कुर्सी तक ले गए हैं. ऐसे में किसी भी व्यक्ति को महबूबा का विरोध करने में खासी परेशानी होगी. महबूबा के लिए वास्तविक चुनौती पीडीपी और बीजेपी जैसे धुर विरोधी विचारधाराओं के बीच सामंजस्य बिठाने की होगी. किसी भी पक्ष की तरफ झुकाव महबूबा और उनकी पार्टी के लिए घातक होगी.

First published: 8 January 2016, 3:18 IST
 
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