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जम्मू-कश्मीरः महबूबा की राह में कितने रोड़े हैं?

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 November 2015, 12:42 IST
QUICK PILL
  • जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के समर्थन से सरकार चला रही पीडीपी में नेतृत्व बदलाव की अटकलबाजियों से राजनीति गर्म. खुद सीएम मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा कि महबूबा सीएम बनने की हकदार हैं.
  • महबूबा मुफ्ती पार्टी की अध्यक्ष हैं और जमीनी स्तर पर उनकी पकड़ मजबूत है, लेकिन उनकी पार्टी के सीनियर नेता और सहयोगी दल बीजेपी उनके संग काम करने को राजी होंगे इसपर संदेह जताए जा रहे हैं.

जब 1999 में 151 लोगों ने पीडीपी के ''विजन डॉक्यूमेंट'' पर हस्ताक्षर किया तब कम ही लोगों ने इसे महत्व दिया था. पार्टी का नेतृत्व मुफ्ती मोहम्मद सईद कर रहे थे और यही चीज पार्टी को नजरअंदाज करने के लिए पर्याप्त थी.

हालांकि, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में मुफ्ती को घाटी में थोड़ी सी लोकप्रियता मिली थी. अलगाववाद के दौर में उन्होंने नई दिल्ली में कश्मीर का प्रतिनिधित्व किया था.

तीन साल बाद ही पीडीपी ने राज्य में 1975 से सत्ता में बैठे नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) को बाहर कर दिया और राज्य में सईद के नेतृत्व में एक गैर एनसी सरकार बनी.

साल 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 16 सीटें जीती. सईद ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई.

समझौते के तहत पहले तीन वर्षों के लिए सईद ने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला और उनके बाद गुलाम नबी आजाद राज्य के सीएम बने.

ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से एक गुमनाम सा दल रातों रात एक सियासी ताकत बन गया?

कई राजनीतिक विशलेषकों का मानना है कि ये सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती का कमाल था जिनकी इन दिनों कश्मीर का मुख्यमंत्री बनने की सुगबुगाहट है.

लोगों में जगाया भरोसा

एक समय में राजनेता श्रीनगर के सुरक्षित जगहों से बाहर जाने से डरते थे. लेकिन उसी दौरान महबूबा ने लोगों से जुड़ने के लिए आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित घाटी के दूर-दराज इलाकों का दौरा किया. उन्होंने आतंकवादियों और अलगाववादियों के परिजनों से भी मुलाकात की.

साल 1999 में हिज्बुल मुजाहिद्दीन के गतिविधियों को संचालित करने वाले आमिर खान के बेटे अब्दुल हमीद की मौत कथित रुप से सुरक्षा बलों की हिरासत में हुई थी. महबूबा इस घटना के बाद आमिर के घर गई थीं.

उनके इस रवैये ने उन्हें घाटी के अलगाववादियों के बीच जगह दिलायी. इस तरह पीडीपी राज्य की मुख्य धारा की राजनीति में अलगाववादियों के विकल्प के रूप में दाखिल हुईं क्योंकि ज्यादातर अलगाववादी संगठन चुनावी राजनीति से बाहर थे.

महबूबा के लिए ये नीति कारगर रही. वो राज्य के अलगाववाद प्रभावित सीटों पर वोट पाने में कामयाब रहीं. उन्हें जमात-ए-इस्लामी ने खुलकर समर्थन दिया.

कुछ लोग कहते हैं कि हिज्बुल ने भी कश्मीर की राजनीति में जगह बनाने में छिपे तौर पर पीडीपी की मदद की थी. पार्टी के गठन के 16 साल बाद पीडीपी की राजनैतिक हैसियत राज्य में काफी बढ़ चुकी है. 2002 के चुनाव में पार्टी ने 16 सीटें जीतीं जबकि 2008 में उसे 21 सीटें मिली. इस बार चुनाव में 28 सीटें जीतकर पीडीपी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है.

एक समय में वह संसद सदस्य और विधानसभा सदस्य दोनों के लिए निर्वाचित हुई लेकिन उन्होंने कभी सरकारी पद नहीं लिया. इसकी जगह उन्होंने अपने पिता के साये में काम करना पसंद किया.

अब तक वह केवल पार्टी को मजबूत कर रही हैं और उनके पिता सत्ता संभाल रहे हैं. मुफ्ती ने पार्टी को एकजुट रखने के लिए अहम योगदान दिया है. उनके वरिष्ठता और राजनैतिक कद का सम्मान हर कोई करता है.

भविष्य का सवाल

मुफ्ती मोहम्मद सईद का स्वास्थ्य अब साथ नहीं दे रहा है. ये बात सार्वजनिक रूप से सबसे पहले महबूबा ने ही कही.

18 अगस्त को पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने पिता सईद के बिगड़े सेहत पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ''उनका स्वास्थ्य बेहतर नहीं है. उन्होंने आपके लिए संदेश भेजा है. वह फिर से आत्मसंयम हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उनकी लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करें. ''

मुफ़्ती मोहम्मद सईद जब संभवतः स्वास्थ्य कारणों राज्य से बाहर गये तो नौ दिनों बाद वापस लौटे. इस बीच राज्य के मुख्य सचिव इक़बाल खांडे के इस्तीफ़े के बाद तमाम तरह की चर्चाएं शुरू हो गयीं.

मुफ़्ती जब 29 अगस्त को वापस लौटे और उसी दिन अपने मंत्रियों, विधायकों और विजिटर्स से मिलने और ज़रूरी फ़ाइलें निपटाने के लिए राज्य सचिवालय पहुंचे. वो दोपहर बाद घर लौटे, जहां वो शाम को नाबार्ड के चेयरमैन हर्ष कुमार भानवाला से मिले.

पिछले हफ़्ते राज्य में दोबारा चर्चाएं शुरू हो गयीं. इस बार ख़ुद मुफ़्ती ने इसे हवा दी. जम्मू में मीडिया से बात करते हुए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि महबूबा मुख्यमंत्री बनने की हक़दार हैं.

सईद ने मीडिया से कहा, “ये एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. महबूबा ज़मीन पर पार्टी अध्यक्ष के रूप में काम करती रही हैं. वो विधायक रही हैं. अब लोक सभा सांसद हैं. वो इसकी हक़दार हैं.”

इसलिए सवाल ये है कि महबूबा सीएम बनेंगी कि नहीं, सवाल ये है कि वो कब बनेंगी. कम से कम पीडीपी का यही नज़रिया है. लेकिन महबूबा को सीएम बनाने के नकारात्मक परिणाम क्या हो सकते हैं? ख़ुद उनकी पार्टी के अंदर, पीडीपी-बीजेपी गठबंधन और राज्य की व्यापक राजनीति पर.

महबूबा के सीएम बनने की संभावना पर अभी बीजेपी ने मुहर नहीं लगायी है इसकी तरफ़ इशारा करते हुए राज्य में पार्टी के वरिष्ठ नेता अविनाश राय खन्ना ने फिलहाल राज्य में किसी तरह के सत्ता परिवर्तन की संभावना से इनकार किया.

बीजेपी के राज्य सभा सांसद खन्ना ने कहा, “जम्मू-कश्मीर में सीएम बदलने की अफ़वाहें सच नहीं हैं.”

वो कहते हैं, “गठबंधन सरकार सुचारू ढंग से काम कर रही है. मुफ़्ती मोहम्मद सईद और बीजेपी आलाकमान के बीच ऐसी कोई बैठक नहीं हुई है.”

साल 2002 में हुए चुनाव में जमात-ए-इस्लामी और हिज़्ब-उल-मुजाहिद्दीन ने अंदरखाने महबूबा का समर्थन किया था.

ऐसे में जब राज्य की राजनीति में महबूबा का राजनीतिक क़द ऊपर उठना तय माना जा रहा है, मोदी सरकार उनके राजनीतिक और वैचारिक झुकावों के लेकर असहज है.

रॉ के पूर्व प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत ने अपने संस्मरणों की किताब "कश्मीरः द वाजपेयी ईयर्स” में लिखा है कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को संदेह था कि महबूबा का हिज़्बुल मुजाहिद्दीन से संबंध है और उन्होंने 2002 के चुनावों में हिज्बुल चरमपंथियों से मदद ली थी. इसीलिए जब वाजपेयी 2003 में कश्मीर के दौरे पर गये तो उन्होंने महबूबा के संग मंच साझा करने से मना कर दिया था जबकि वो राज्य की सत्ताधारी पार्टी की प्रमुख थीं.

पीडीपी के अंदर भी महबूबा को सीएम बनाए जाने से अंसतोष उभर सकता है.

पार्टी में कई ऐसे नेता हैं जिनका निजी क़द काफ़ी बड़ा है और वो अपने चुनावी क्षेत्र में व्यापक प्रभाव रखते हैं. ऐसे ही नेताओं में से पूर्व उप-मुख्यमंत्री मुज़फ़्फ़र हुसैन बेग़ और पूर्व वित्त मंत्री तारिक़ हमीन कर्रा की पार्टी से पहले ही ठनी हुई है. ये दोनों नेता फ़िलहाल सांसद हैं.

बेग़ पहले ही राज्य सरकार और पीडीपी के कामकाज पर सवाल उठा चुके हैं. वहीं कर्रा बीजेपी से गठबंधन करने को लेकर पीडीपी की निंदा कर चुके हैं. ऐसे बयानों से ये नेता कश्मीर घाटी में गठबंधन सरकार के कामकाज को लेकर उपज रही खीझ को भांपने की कोशिश कर रहे थे.

महबूबा का विरोध सईद के वफ़ादार माने जाने वाले नेता भी कह सकते हैं. ये नेता मुफ़्ती के तो करीबी हैं लेकिन महबूबा के संग उनका तालमेल उतना गहरा नहीं है. इसलिए ऐसे नेता भी चाहेंगे कि नेता बदले तो भी इसमें जितनी देरी हो उतना अच्छा.

इन हालात के मद्देनज़र सईद के बाद पीडीपी के टूटने की भी आशंका जतायी जा रही है.

बहरहाल, महबूबा के लिए सबसे अच्छी बात ये है कि सईद ख़ुद उनको नई जिम्मेदारी सौंपेंगे. उसके बाद भी वो नेपथ्य से उनकी मदद करते रहेंगे और कोई बग़ावत होती भी है तो उससे वो कड़ाई से निपटेंगे.

महबूबा के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये होगी कि वो पीडीपी और बीजेपी की परस्पर विरोधी विचारधारा के बीच किस तरह तालमेल बैठाती हैं. वो किसी भी तरह झुकती दिखीं तो उनके लिए और उनकी पार्टी को उसकी भारी क़ीमत उठानी होगी.

First published: 20 November 2015, 12:42 IST
 
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