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मिलिए अटरली-बटरली अमूल गर्ल के पापा से

अमित कुमार बाजपेयी | Updated on: 28 April 2016, 20:32 IST

पिछले पांच दशकों से हर दिन नजर आने वाले अमूल के विज्ञापन पर आपकी नजर न पड़ी हो ऐसा नहीं हो सकता. साथ ही अटरली-बटरली अमूल गर्ल ने भी आपको जरूर आकर्षित किया होगा. 

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अमूल गर्ल के पापा यानी इसे लाने वाले कौन लोग हैं. जो आज तक हर मुद्दे पर अमूल गर्ल को विज्ञापन में सेट करने के साथ देश के ज्वलंत मुद्दों को जनता के सामने रखते हैं. 

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अमूल के विज्ञापन राजनीति, भारत, अंतरराष्ट्रीय, फिल्म, तकनीक, विवाद, निधन, आपदा, खेल, मनोरंजन, साहित्य, भोजन समेत न जाने कितने क्षेत्रों से जुड़े होते हैं.

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दरअसल अमूल के विज्ञापनों को तैयार करने के लिए तीन लोगों  की टीम काम करती है. जो हर सप्ताह छह कार्टून तैयार करती है. इसके लिए ऐड एजेंसी डाकुन्हा कम्यूनिकेशंस यह पूरा ऐड कैंपेन तैयार करती है. 

इसके क्रिएटिव हेड राहुल डाकुन्हा, कॉपी राइटर मनीष झावेरी और करीब ढाई दशकों से अमूल गर्ल को बनाने वाले कार्टूनिस्ट जयंत राणे हैं. 

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सबसे बाएं कार्टूनिस्ट जयंत राणे, एजेंसी हेड राहुल डाकुन्हा और कॉपी राइटर मनीष झावेरी (साभारः एफैैक्स)

डाकुन्हा और झावेरी सामान्यता रोजाना अपना दिन एक ही तरह से शुरू करते हैं. सुबह वे अखबारों को खंगालते हैं और उनमें छोटे-बड़े घोटाले, मजदूरों का आंदोलन, खेलों का विवाद, भ्रष्टाचार प्रदर्शन, इमारतों का ढह जाना, कुछ विवादित होना या फिर ऐसा कुछ भी खोजते हैं जिनपर देशभर में चर्चा हो रही होती है.

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हालांकि डाकुन्हाद्वारा तैयार किए जाने वाले विज्ञापन काफी आक्रामक होते हैं और कभी-कभी विवादों में छाए हैं. लेकिन यह विज्ञापन एजेंसी इतने बोल्ड और सख्त संदेश देने वाले ऐड तैयार करे इसका श्रेय इस सहकारी दुग्ध संस्था अमूल के संस्थापक वर्गीज कुरियन को जाता है. 

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2012 में दुनिया को अलविदा कह चुके कुरियन ने ही डाकुन्हाकम्यूनिकेशंस को यह आजादी दी थी कि वे राजनीतिक उठापटक, ताकतवर शख्सियतों समेत विवादित मुद्दों को अपने विज्ञापनों में शामिल करें और उन्हें देश भर में तमाम होर्डिंग्स और अखबारों में छपवाएं. 

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एक वेबसाइट से बातचीत में राहुल दाचुन्हा ने कहा था, "मुझे लगता है कुरियन एक ऐसे व्यक्ति हैं जो किसी से नहीं डरते."

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वहीं, रोजाना सुबह विज्ञापन के लिए मुद्दा ढूंढ़ने के बाद उसकी पटकथा के बारे में चर्चा की जाती है. अंग्रेजी और हिंदी के शब्दों की कमी न पड़े इसके लिए कार्यालय में शब्दकोश रखे हुए हैं.

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राहुल डाकुन्हा (साभारः रैडिट)

पटकथा और इसका मुद्दा तैयार होने के बाद कार्टूनिस्ट जयंत राणे को इस बारे में बताया जाता है. राणे एक कागज पर अपनी पेंसिल घुमाना शुरू कर देते हैं और अमूमन आधे घंटे में अमूल गर्ल के साथ उस मुद्दे से जुड़ी मुख्य तस्वीर दे देते हैं. 

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इसके बाद डाकुन्हाइसमें हो सकने वाले जरूरी सुधारों और बेहतर किए जाने की संभावना होने पर कुछ जानकारी देते हैं और फिर ऐड फाइनल हो जाता है. 

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इसके बाद राणे इन कार्टून को वाटर कलर्स से पेंट करते हैं और फिर इसके सूखने के बाद इसकी स्कैनिंग कर तस्वीर को कंप्यूटर पर ले लिया जाता है. एक टाइपोग्राफर तस्वीर के ऊपर जरूरी टेक्स्ट टाइप कर देता है. 

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बता दें कि डाकुन्हा1993 से अमूल कैंपेन से जुड़े हुए हैं. उन्होंने अपने पिता सिलवेस्टर डाकुन्हासे यह काम लिया था. सिल्वेस्टर 1966 से अमूल से जुड़े हुए थे.

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अमूल विज्ञापन की शुरुआत

1966 में एडवरटाइजिंग सेल्स एंड प्रमोशन के मैनेजिंग डायरेक्टर सिल्वेस्टर डाकुन्हाको अमूल बटर का काम मिला. 1945 मे लॉन्च किए गए इस बटर (मक्खन) की इससे पहले सार्वजनिक पहचान एक बोरिंग उत्पाद के रूप में थी. क्योंकि शुरुआती ऐड एजेंसी उस वक्त रोजमर्रा के सामान्य और कॉरपोरेट विज्ञापनों तक की इसे सीमित रखना चाहती थी. 

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सिल्वेस्टर डाकुन्हा

सिल्वेस्टर डाकुन्हा ने इस काम को एक चुनौती के रूप में लिया और उन्होंने इसकी पहचान को बदलने की ठानी. उस वक्त अमूल का विरोधी ब्रांड पॉल्सन था. 

1915 मे पेस्टॉन्जी एडुल्जी द्वारा मुंबई में शुरू किए गए डेयरी प्रोडक्ट्स ब्रांड ने 1930 में अपनी पहली डेयरी गुजरात के आणंद में सात लाख रुपये से खोली थी. पॉल्सन ने लोगों को पारंपरिक दुग्ध उत्पादों की जगह अपने उत्पाद इस्तेमाल करने का काम किया और बाजार बनाया. 

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1945 तक पॉल्सन ने अपना प्रतिवर्ष मक्खन उत्पाद 30 लाख पाउंड्स कर लिया था. लेकिन इसकी मोनोपोली, सरकार का समर्थन और किसानों के सहयोग-सहायता में योगदान न करने के कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल ने एक सहकारी समिति खोलने के अपने विचार को मूर्त रूप दिया और 14 दिसंबर 1946 को गुजरात के आणंद में अमूल (आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड) की स्थापना की.

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पॉल्सन अपने वित्रापन में एक बटर गर्ल का इस्तेमाल करता था. इसको टक्कर देने के लिए सिल्वेस्टर ने खूब दिमागी घोड़े दौड़ाए. पॉल्सन की बटर गर्ल उस वक्त एक अंग्रेज लड़की थी जो हिंदुस्तानियों से खुद को बेहतर ढंग से नहीं जोड़ पाती थी. लेकिन उत्पाद की उपल्बधता के चलते लोग उसे ही ज्यादा खरीदते थे. 

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सिल्वेस्टर ने अपनी एजेंसी के आर्ट डायरेक्टर यूस्टेस पॉल फर्नांडीज के साथ बैठकर एक ऐसी ऐड गर्ल को बनाने की कल्पना की जो आसानी से लोगों और विशेषकर गृहणियों के दिलों में समा जाए. 

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यूस्टेस पॉल फर्नांडीज

बस फिर क्या था काम शुरू हुआ और एक शरारती, छोटे बाल एक खड़ी चोटी, बड़ी-बड़ी आंखें, मुंह से बाहर निकलती मक्खन चाटती जीभ, गेहुंआ रंग, सामान्य ऊंचाई और सफेद पर लाल गोले वाली फ्रॉक पहले अमूल गर्ल का जन्म हुआ. इसे अपनी पेंसिल से जन्म देने वाले इसके पापा फर्नांडीज बने.

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1976 का विज्ञापन

इसके बाद 1966 के अक्तूबर में मुंबई के लैंप कियॉस्क्स, बस अड्डो समेत कई महत्वपूर्ण स्थानों पर घोड़े पर बैठी अमूल गर्ल की होर्डिंग्स-पोस्टर लगा दिए गए. इसके नीचे सीधे शब्दों में लिखा गया Thoroughbread, Utterly Butterly Delicious Amul (पूरी ब्रेड के ऊपर केवल अटरली बटरली स्वादिष्ट अमूल). इसके बाद एजेंसी दफ्तर में इसे पसंद करने वाले लोगों के फोन आने शुरू हो गए और इस विज्ञापन का प्रभाव जबर्दस्त रहा. 

इसके बाद की कहानी हम सबके सामने है.

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First published: 28 April 2016, 20:32 IST
 
अमित कुमार बाजपेयी @amit_bajpai2000

पत्रकारिता में एक दशक से ज्यादा का अनुभव. ऑनलाइन और ऑफलाइन कारोबार, गैज़ेट वर्ल्ड, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, एजुकेशन पर पैनी नज़र रखते हैं. ग्रेटर नोएडा में हुई फार्मूला वन रेसिंग को लगातार दो साल कवर किया. एक्सपो मार्ट की शुरुआत से लेकर वहां होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों-संगोष्ठियों की रिपोर्टिंग.

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