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मतदाता से मुलाकातः सीएम में सौम्यता और भद्रता होनी चाहिए

सुदर्शना चक्रबर्ती | Updated on: 26 March 2016, 12:47 IST
QUICK PILL
  • चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में अप्रैल से विधान सभा चुनाव \r\nशुरू होंगे. इस मौक़े पर कैच \'मतदाता से मुलाकात\' शृंखला शुरू कर रहा है.
  • इस\r\n शृंखला के दौरान विभिन्न राज्यों के मतदाताओं से बात करके कैच जानने की कोशिश करेगा कि विभिन्न पार्टियों और नेताओं से उनकी क्या उम्मीदें या शिकवे हैं.
कोलकाता का कस्बा विधान सभा क्षेत्र अपनी विविधता के लिए जाना जाता है. एक जमाने में इसे वामपंथी पार्टियों का गढ़ माना जाता था. लेकिन तृणमूल कांग्रेस के नेता जावेद अहमद ख़ान ने इस गढ़ पर विजय हासिल की और यहां के विधायक बने. इस बार भी वो सबस मजबूत दावेदार होंगे. जावेद अहमद खान इस समय ममता बनर्जी सरकार में अग्निशमन और आपातकालीन सेवा मंत्री हैं.

सीपीएम ने उनके खिलाफ युवा नेता सत्रप घोष को उतारा है. पिछले चुनाव में जावेद को मामूली अंतर से जीत मिली थी. इसलिए सीपीएम अपने युवा नेता की जीत को लेकर आशान्वित है.

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कैच ने कस्बा की वोटर रंजना भट्टाचार्य से बात की. वो लंबे समय तक एनजीओ और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़ी रहीं. इससे पहले वो जादवपुर विधान सभा से मतदाता थीं. इस चुनाव में वो दूसरी बार कस्बा में मतदान करेंगी.

आपने पिछले साल नई विधान सभा में मतदान किया था. और पिछली बार ही पश्चिम बंगाल में 35 साल बाद यहां की सत्ता से वामपंथी दल बाहर हुए. इस बदलाव की वजह?


मैं जादवपुर ही में वोट देना चाहती थी लेकिन सीपीएम के स्थानीय इकाई के लोगों ने कहा कि मुझे अपना मतदान केंद्र बदलवा लेना चाहिए. क्योंकि काफी पहले ही मैंने अपना पता बदल लिया था. 

वामपंथी शासन के पहले 15 सालों में बहुत काम हुआ था बाद में पार्टी के निचले स्तर के भ्रष्टाचार ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया

मैं बहुत कम उम्र से ही वामपंथ समर्थक बन गयी थी. जादवपुर में पार्टी कार्यकर्ताओं, प्रत्याशियों और मतदाताओं के बीच अच्छा संबंध है. यहां ऐसा नहीं लगता. पिछले बार जो यहां से जीते थे मैंने उन्हें देखा तक नहीं है.

क्या आप बंगाल में वाम-कांग्रेस गठबंधन को समर्थन दे रही हैं?


मौजूदा हालात में मेरा जवाब है, हां. सीपीएम ने अपने प्रत्याशियों की सूची पहले जारी कर दी तो मुझे अच्छा नहीं लगा. शुरुआत में दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर हिचक थी लेकिन अब स्थिति नियंत्रण में है.

हम इस बात को नजरंदाज नहीं कर सकते कि सीपीएम की सांगठनिक क्षमता कम है. कांग्रेस प्रतिक्रियावादी पार्टी है, हालांकि वो संसदीय राजनीति करती है. इसलिए सत्ता में दोबारा वापस आने के लिए उनका समर्थन लेना सही है. ये गठबंधन मद्दों पर आधारित होना चाहिए.

क्या आपको लगता है कि इस गठबंधन से टीएमसी को रोका जा सकेगा?


इस सवाल के मेरे पास कोई जवाब नहीं है. मेरे लिए भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा महत्वपूर्ण है. आंकड़ों के मामले में मैं कमजोर हूं. मेरे हिसाब से राजनीति में शक्तिप्रदर्शन और गुंडागर्दी बढ रही है. अगर ये दोनों पार्टियां मजबूत गठबंधन बनाती हैं तो वो सत्ताधारी टीएमसी का मुकाबला कर सकती हैं.

वामपंथी दल जब सत्ता में थे तब वो भी डर की राजनीति करते रहे हैं. क्या आप इससे असहमत हैं?


हां, मैं असहमत हूं. मेरी अपनी विधान सभा जादवपुर में मेरा अनुभव काफी अच्छा रहा है. चुनाव के दौरान दोस्ताना माहौल होता था. लेकिन 2011 से हालात बदले हैं.

आपकी विधान सभा में हुए विकास कार्य से आप संतुष्ट हैं?


मैं आपको ठीक ठीक रिपोर्ट तो नहीं दे सकती क्योंकि मैंने ज्यादा काम नहीं देखा है. लेकिन मेरे वार्ड की काउंसिलर, जो सीपीआई की नेता थीं, काफी विकास कार्य करवाती थीं. वो पर्यावरण से जुड़ा काम करती थीं. 

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हालांकि मेरी विधान सभा में  कई बार सड़कें सत्ताधारी पार्टी की मनमर्जी के हिसाब से तोड़ी-बनायी जाती थीं. जनता को इससे कितनी परेशानी होगी इसकी कोई परवाह नहीं करता था. सड़कों पर बत्तियां वगैरह थीं लेकिन ट्रैफिक का हाल बहुत बुरा रहता था.

महिलाओं के लिए आपका इलाका कितना सुरक्षित था?


2011 से पहले तक हम रात को साढ़े नौ-दस बजे तक भी घर लौटते थे तो कोई दिक्कत नहीं होती थी. अब हालात बदल गए हैं. महिलाओं की सुरक्षा एक समस्या बन चुकी है.

मुझे इस उम्र में भी गलियों या सार्वजनिक वाहनों में छेड़खानी का शिकार होना पड़ता है. पहले ऐसा नहीं होता था. इसके लिए न केवल सत्ताधारी पार्टी बल्कि पूरा सिस्टम जिम्मेदार है. दोषियों को वाजिब सज़ा नहीं मिलती.

बंगाल में पहली बार महिला मुख्यमंत्री बनी हैं, तो क्या ऐसे में आपकी उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ गयी थीं?


देखिए, मैं जेंडर के आधार पर विभेद नहीं करना चाहती. लेकिन हम अपने मुख्यमंत्री के तौर-तरीकों और बोल-चाल में एक तरह की सौम्यता और भद्रता की उम्मीद करते हैं. मौजूदा मुख्यमंत्री में इसका अभाव है और पूरी पार्टी में इसकी झलक मिलती है.

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हालांकि पिछले एक-डेढ़ महीने में उनका बरताव थोड़ा नरम हुआ है. अब मुझे नहीं पता कि ये चुनाव की वजह से हुआ है या फिर किसी और कारण से.

बंगाल में बीजेपी के भविष्य को लेकर आप क्या सोचती हैं?


पहले मुझे लगता था कि बंगाल में बीजेपी का ज्यादा असर नहीं है लेकिन लोक सभा में लोगों ने उसे वोट दिया. इसलिए लोग किसी खास परिस्थिति में कैसे बरताव करेंगे ये कहना मुश्किल है.

ग्रामीण इलाकों में अभी भी लोग सांप्रदायिक आधार पर मतदान करत हैं. वो स्थानीय मुद्दों को बहुत ज्यादा तरजीह देते हैं. जबकि उन्हें बड़े सामाजिक मुद्दे से जोड़ने की जरूरत है. हमारे यहां लोग सामाजिक दृष्ठि से कम और राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा वोट देते हैं.

क्या आपको लगता है कि इस बार का परिणाम अलग होगा?


मैं यही कह सकती हूं कि इस बार शहरों में कुछ बदलाव होगा लेकिन गांवों में नहीं. हम बहुत आसानी से पुरानी बातें भूल जाते हैं. लोग पिछले एक-डेढ़ महीने में किए गए सरकार के अच्छे कामों को याद रखेंगे और पिछले पांच साल की उपेक्षा को भूल जाएंगे.

वामपंथी शासन के पहले 15 सालों में बहुत काम हुआ था. बीच के समय में भी काम हुआ लेकिन आखिरी दौर में पार्टी के निचले स्तर के लोगों के भ्रष्टाचार ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया.

टीएमसी नेताओं द्वारा कथित तौर पर पैसे लेनेे के नारद स्टिंग ऑपरेशन का चुनाव पर कितना असर पड़ सकता है?


मुझे लगता है कि ये सत्ताधारी पार्टी के अंदर के लोगों का ही काम है. जहां तक इसके प्रभाव की बात है तो मैं इसपर कुछ नहीं कह सकती.

First published: 26 March 2016, 12:47 IST
 
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