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महबूबा की मांग: पूर्व आतंकियों की नेपाल के रास्ते घर वापसी हो

गौहर गिलानी | Updated on: 7 June 2016, 23:01 IST

महबूबा मुफ्ती ने पिछले सप्ताह केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की. उन्होंने गृहमंत्री से आग्रह किया कि वे कश्मीर केंद्रित विश्वास बहाली के उपायों को पुनर्जीवित करें ताकि "ताजा शांति प्रयासों को मजबूत किया जा सके और शांति एवं सुलह की प्रक्रिया को वापस पटरी पर लाया जा सके".

सरकार के बयान के अनुसार, मुख्यमंत्री ने उन कश्मीरी युवाओं के पुनर्वास को सुविधाजनक एवं आसान बनाने पर जाेर दिया "जो हथियारबंद प्रशिक्षण के लिए नियंत्रण रेखा के पार चले गए थे और अब वे वापस लौटकर सामान्य जीवन जीना चाहते हैं."

महबूबा ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान में रह रहे उन कश्मीरी युवकों की वापसी के लिए "नेपाल मार्ग को वैध बना दिया जाए" जिन्होंने हिंसा का रास्ता त्याग दिया है.

सरकार के प्रवक्ता नईम अख्तर ने कैच न्यूज से इस बात की पुष्टि की कि महबूबा ने राजनाथ के सामने यह मांग उठाई थी. अख्तर ने कहा, "केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार पाक अधिकृत कश्मीर से कश्मीरी युवकों की वापसी के लिए नेपाल मार्ग को वैध करने के तौर-तरीकों पर विचार करेगी."

हम केंद्र सरकार से एक सकारात्मक हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं

अख्तर ने तर्क दिया कि "वे हमारे अपने नागरिक हैं. अगर वे हिंसा का रास्ता छोड़ने के बाद वापस लौटना चाहते हैं तो हमें इस मुद्दे का हल मानवीय आधार पर निकालना होगा." 

उन्होंने कैच को बताया कि "चूंकि यह मार्ग सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है और पूर्व आतंकियों की वापसी के लिए मौजूदा नीति के तहत नहीं आता, इसलिए हमने इसे उठाया है. हम केंद्र सरकार से एक सकारात्मक हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं."

'वे साधारण मेहमान नहीं हैं...'

कश्मीर के प्रमुख राजनीति शास्त्री प्रोफेसर गुल वानी इस मामले में ज्यादा उम्मीद नहीं रखते. वानी इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि क्या "कश्मीर में सुलह प्रक्रिया में तेजी लाने में" दिल्ली में नरेंद्र मोदी के हिंदू राष्ट्रवादी शासन की रुचि होगी?

उन्होंने कैच को बताया, "केंद्रीय बिंदु कश्मीरी युवकों की वापसी है. मुझे भराेसा नहीं है कि भाजपा सरकार कश्मीर केंद्रीत विश्वास बहाली उपाय को आगे बढ़ाएगी और विशेषकर पूर्व आतंकियों की वापसी को किसी मानवीय समस्या की तरह लेगी, क्योंकि इसके गहरे राजनीतिक अर्थ होंगे." 

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उन्होंने यह भी कहा कि "आखिरकार पूर्व आतंकियों ने 'कुछ पाने या करने' के लिए सीमा पार की थी. वे कोई साधारण मेहमान तो नहीं हैं."

वानी के अनुसार, कश्मीरी युवकों की वापसी के लिए पहले से ही एक नीति मौजूद है. इसके अनुसार कश्मीरी युवाओं की वापसी के लिए "परिस्थितियों के अनुसार वापसी के एक निश्चित मार्ग को शामिल किया जा सकता है या बंद किया जा सकता, बशर्ते उन्हें सुरक्षा मंजूरी मिल जाए आदि."

वे इस प्रयास पर नई दिल्ली की प्रतिक्रिया के बारे में आशावादी नहीं हैं. "दुर्भाग्य से, हमने मोदी सरकार को दिल्ली-श्रीनगर वार्ता प्रक्रिया में जान फूंकने जैसा कोई कदम उठाने में दिलचस्पी लेते नहीं देखा है. इसी कारण संदेह पैदा होता है कि भाजपा पूर्व आतंकियों की वापसी के लिए नेपाल मार्ग को वैध करने की अनुमति देगी."

मौजूदा वापसी नीति

उमर अब्दुल्ला सरकार ने 2010 में "पूर्व आतंकियों की राज्य में वापसी पर नीति" बनाई थी. इस आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास नीति को औपचारिक रूप से 23 नवंबर 2010 को पेश किया गया था. 

कैच द्वारा प्राप्त किए गए सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह नीति "उन पूर्व आतंकवादियों को सुविधा देने के लिए बनाई गई थी जो जम्मू-कश्मीर राज्य के हैं और उग्रवाद का प्रशिक्षण लेने के लिए सीमा पार पाक अधिकृत कश्मीर/पाकिस्तान में चले गए थे, लेकिन हृदय परिवर्तन के कारण उन्होंने विद्रोही गतिविधियों को छोड़ दिया है और अब राज्य में लौटने को इच्छुक हैं."

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इसके 14 मुख्य बिंदुओं में से एक यह है कि "वापस आने वाले की काउंसिलिंग के बाद भी उसके आचरण और व्यवहार पर स्थानीय पुलिस द्वारा और राज्य सीआईडी द्वारा दो साल तक पैनी नजर रखी जाएगी."

नीति के अनुसार, लौटने वाले पूर्व उग्रवादियों को "सिर्फ वाघा के ज्वाइंट चेक पोस्ट, अटारी, सलामाबाद या नियंत्रण रेखा पर चाकन दा बाग क्रॉसिंग या फिर नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के माध्यम से ही प्रवेश करने की अनुमति दी है."

'वे तो भगवान की संतान ही नहीं...'

1990 के दशक में अनेक कश्मीरी युवा जब 20 से 30 साल की उम्र के थे तो हथियारों का प्रशिक्षण लेने के लिए नियंत्रण रेखा के पार चले गए थे. अब वे 40 से 50 साल के पड़ाव में हैं. अधिकांश शादी कर चुके हैं और उनके बीवी-बच्चे भी हैं... और यही इस मुद्दे को पेचीदा बनाता है.

नीति को लागू करने में शामिल रहे एक सूत्र ने बताया, "जब 1990 के दशक में उन्होंने सीमा पार की, तब वे निराशा से भरे थे. अब पाक अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान से उनका मोहभंग हो चुका है. 

वे वापस आना चाहते हैं, लेकिन उनके सामने एक संकट आ जाता है कि उनकी पत्नी और बच्चों के लिए राष्ट्रीयता का मुद्दा आएगा, स्थायी निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड आदि का सवाल आएगा. वे एक तरह से भगवान की संतान हैं ही नहीं".

2010 के बाद से कम से कम 489 उग्रवादी लौट चुके हैं और उनकी पत्नियों की संख्या है 218

मौजूदा नीति उन लोगों पर और उनके आश्रितों पर लागू होती है " जो 1 जनवरी 1989 से 31 दिसंबर 2009 के बीच सीमा पार कर पाक अधिकृत कश्मीर/पाकिस्तान चले गए थे."

लौटने की अनुमति के लिए जिले के पुलिस अधीक्षक के समक्ष आवेदन करना होगा. इसके तहत वापसी करने वालों की श्रेणियां तय की गई हैं कि कौन लोग आवेदन कर सकते हैं. 

पुलिस अधीक्षक मामले को सीआईडी को अग्रेषित कर देता है. इसके बाद सीआईडी "जहां जरूरत होती है आईबी, रॉ और सेना के साथ विचार-विमर्श कर" वापसी के अनुरोध का विश्लेषण करती है. और फिर एक फाइल तैयार की जाती है.

दस्तावेज कहते हैं कि "इस तरह तैयार की गई फाइल को सीआईडी द्वारा गृह विभाग को भेज दिया जाता है. गृह विभाग में अंतिम निर्णय लिया जाता है कि क्या आवेदन स्वीकार किया जाना चाहिए या एक समिति को सौंप दिया जाना चाहिए."

अब तक कम से कम 489 पूर्व आतंकी इस नीति के तहत लौट आए हैं. पुलिस के एक सूत्र ने कैच को बताया, "2010 के बाद से कम से कम 489 उग्रवादी लौट चुके हैं और उनकी पत्नियों की संख्या है 218."

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सूत्र ने कहा कि अभी हाल ही "कम से कम 20 पूर्व आतंकियों के वापस आने के अावेदनों को सभी चार-पांच एजेंसियों से सहमति मिल गई है जबकि पांच अन्य के आवेदनों को भारतीय सेना द्वारा कुछ आशंका जताए जाने के बाद अस्वीकार कर दिया गया है."

मार्च 2013 में, उमर ने विधानसभा को बताया था कि पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में 3974 कश्मीरी आतंकवादी थे. 

इनमें से 1,089 ने वापस लौटने और 2010 नीति के तहत आत्मसमर्पण करने की अनुमति के लिए आवेदन किया था और 241 पूर्व आतंकवादी वास्तव में लौट आए थे, जिनमें से ज्यादातर पाकिस्तानी पत्नियों और बच्चों के साथ लौटे थे.

अनधिकृत मार्ग

डेली एक्सेल्सियर ने 2013 में रिपोर्ट दी थी कि जहां ये लोग नीति में निर्दिष्ट मार्गों से वापस लौटे थे, वहीं कम से कम 200 पूर्व आतंकी "अनधिकृत" नेपाल मार्ग से अपने घर लौटे थे. उनका काम करने का ढंग काफी सरल था- वे पाकिस्तान में नकली पासपोर्ट और वीजा खरीदते और हवाई मार्ग से नेपाल पहुंच जाते. 

वहां से वे उत्तर प्रदेश और बिहार से लगने वाली खुली सीमा को चुपके से पार कर भारत में घुस जाते. रिपोर्ट के अनुसार उनमें से अधिकांश अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ थे.

एक राजनीतिक विश्लेषक ने नाम न छापने के अनुरोध के साथ कहा कि "दिलचस्प है कि उस समय कश्मीर के सशस्त्र विद्रोह के दौरान नेपाल को भी काफी बदनामी झेलनी पड़ी थी कि वह कश्मीरी युवाओं को हथियारों के प्रशिक्षण के लिए 'आजाद' कश्मीर और पाकिस्तान में भेजने के लिए एक लांच पैड के रूप में कार्य कर रहा है."

लियाकत का मामला

मार्च 2013 में उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले का निवासी पूर्व आतंकवादी लियाकत शाह आत्मसमर्पण करने के लिए नेपाल के रास्ते लौट आया. लेकिन वह घाटी में पहुंच पाता, उससे पहले दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था.

पुलिस ने दावा किया कि उसने लियाकत को दिल्ली में एक होटल से गिरफ्तार कर लिया और "उसके पास से एक एके -56 राइफल भी जब्त कर ली". उन्होंने यह भी कहा कि वह अफजल गुरु की फांसी का बदला लेने के लिए भारत में घुस आया था.

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हालांकि जम्मू-कश्मीर पुलिस ने जोर देकर कहा कि वह आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास नीति का लाभ उठाने के लिए लौटा था. आखिरकार जनवरी 2015 में एनआईए ने मंजूरी दे दी तो उसे छोड़ दिया गया.

एनआईए ने पाया कि दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ के कुछ अधिकारियों ने एक मुखबिर साबिर खान पठान उर्फ मुन्ना की मदद से लियाकत को फंसाया था. लियाकत को फंसाने के लिए हथियार पठान ने रखे थे.

इस घटना के बाद से जम्मू-कश्मीर में यह मांग उठने लगी कि पूर्व आतंकियों की वापसी के लिए "नेपाल मार्ग" को कानूनी मान्यता दी जाए. अब, महबूबा ने औपचारिक रूप से उसी मांग को उठाया है. क्या मोदी शासन इस मांग को सुनेगा?

First published: 7 June 2016, 23:01 IST
 
गौहर गिलानी @catchnews

श्रीनगर स्थित पत्रकार, टिप्पणीकार और राजनीतिक विश्लेषक. पूर्व में डॉयचे वैले, जर्मनी से जुड़े रहे हैं.

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