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अलगाववादियों की 'चहेती' महबूबा को आने लगा है भारत पर 'प्यार'

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 3 June 2016, 22:47 IST
(कैच)
QUICK PILL
  • पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और उसकी नेता महबूबा मुफ्ती को कश्मीर के अलगाववादी गुटों के प्रति उदार माना जाता है.
  • मोहम्मद सईद की जगह राज्य की सीएम बनीं महबूबा मुफ्ती का सुर अब इस मसले पर थोड़ा बदलता नजर आ रहा है.
  • महबूबा ने 28 मई को राज्य विधान सभा में अपने भाषण में कहा, \"मेरे पिता को भारत की अवधारणा में हमेशा यकीन था.\'\'

पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और उसकी नेता महबूबा मुफ्ती को कश्मीर के अलगाववादी गुटों के प्रति उदार माना जाता है. लेकिन अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की जगह राज्य की सीएम बनीं महबूबा मुफ्ती का सुर अब इस मसले पर थोड़ा बदलता नजर आ रहा है.

सीएम महबूबा ने 28 मई को राज्य विधान सभा में अपने भाषण में कहा, "मेरे पिता सम्मानित आदमी थे. वो शेख अब्दुल्ला की तरह भारत-परस्त से अलगाववादी और फिर भारत-परस्त नहीं हुए थे. उन्हें भारत की अवधारणा में हमेशा यकीन था. वो इस बात से खुश हुए थे कि शेख अब्दुल्ला ने आखिरकार भारत से जुड़ने का फैसला किया था."

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माना जा रहा है कि महबूबा अलगाववादियों के प्रति उदार रुख रखने वाली अपनी छवि को बदलना चाहती हैं. हालांकि महबूबा कश्मीर के स्वराज के अधिकार की मुखर पैरोकार रही हैं.

महबूबा ने कहा, "मेरे पिता ने कभी अपनी राजनीतिक विचारधारा नहीं बदली और उन्हें भारतीय होने का 'यकीन' था." महबूबा ने कहा कि उन्हें अपने पिता के सपनो को पूरा करना है, वरना वो सत्ता की बागडोर नहीं संभालतीं. 

बदला रुख

महबूबा शायद भूल गईं कि उनकी पार्टी कश्मीर में स्वराज की मांग के साथ ही पाकिस्तान को शामिल करके एक व्यापक आर्थिक-राजनीतिक ढांचा बनाने की बात कहती रही है.

उनकी पार्टी संवैधानिक बदलाव, दो मुद्राओं, राज्य पर लागू केंद्रीय कानूनों को हटाने, राज्यपाल के चुनाव की मांग के साथ ही राज्यपाल को सदरे-रियासत और मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहे जाने की वकालत करती रही है.

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इसके उलट महबूबा ने अपने ताजा भाषण में ये संदेश देने की कोशिश की कि घाटी में एकमात्र उनकी पार्टी ही सच्ची भारत-परस्त है. 

महबूबा ने कहा, "जब मुफ्ती साहब अपने इंतकाल से पहले आखिरी बार फारूक़ साहब से मिले तो उन्होंने उनसे पूछा, 'शेख साहब पहले भारत से क्यों जुड़े और फिर एक बार इस फैसले से हटकर दोबारा इसी पर क्यों वापस आए?'

मूलभूत मुद्दा

महबूबा राज्यपाल के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोल रही थीं. अपने 80 मिनट के भाषण में उन्होंने राज्य के इतिहास से जुड़ा सबसे मूलभूत मुद्दा उठाया. 

महबूबा ने अपने नए रुख के इजाहर के लिए विधानसभा सत्र को चुना. नतीजतन, उनके भाषण का मुख्यधारा की मीडिया और सोशल मीडिया पर काफी प्रचार मिला.

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परंपरागत तौर पर घाटी की भारत-परस्त पार्टियां अपनी राजनीति को अलगाववादी प्रतीत होने वाले जुमलों में लपेट कर पेश करती हैं ताकि उनका राजनीतिक वजूद बचा रहे.

पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) जैसी पार्टियां जनता को चुनाव में भागीदारी करने के लिए स्वराज और स्वायत्तता जैसे जुमले का प्रयोग करती हैं.

पाकिस्तान पर निशाना

दरअसल, मौजूदा विधान सभा सत्र में एनसी ने राज्य की स्वायत्तता का प्रस्ताव पेश किया है. जबकि जम्मू-कश्मीर विधानसभा 1999 में ही भारी बहुमत से स्वायत्तता प्रस्ताव पारित कर चुकी है. उस समय राज्य में एनसी सरकार (1996-2002) थी.

ऐसे में महबूबा अचानक से जनता के बीच भारत की अवधारणा का मुद्दा क्यों उठा रही हैं? वो भी तब जब राज्य की राजनीतिक स्थिति के अनुसार भारत से वैचारिक दूरी रखना चुनावी तौर पर फायदेमंद साबित होता है.

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राज्य में एनसी के खराब प्रदर्शन के पीछे उसका भारत की तरफ बढ़ता झुकाव एक बड़ी वजह माना जाता है. फारूख़ अब्दुल्ला का पाकिस्तान को खुली धमकी देने को भी पार्टी की हार की एक वजह बताया जाता है. 

लेकिन महबूबा पाकिस्तान पर निशाना साधने से भी नहीं चूक रही हैं. जम्मू में एक रैली में महबूबा ने कहा, "पाकिस्तान में सरकार अपनी ही जनता से लड़ रही है. सुन्नी शिया को मार रहे हैं और शिया सुन्नी को."  उस रैली में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे.

रुख बदलने की वजह

कश्मीर घाटी में महबूबा के बदले हुए रुख को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं.

अकादमिक रेखा चौधरी कहती हैं, "मुझे लगता है कि इसकी वजह उनके पिता का इंतकाल है. मुफ्ती साहब की भारत-परस्त के रूप में निर्विवाद छवि थी, उस समय महबूबा के लिए घाटी की अलगाववाद समर्थक इलाकों में अवाम का समर्थन पाने के लिए नरम रुख दिखाना आसान था. अब वो ऐसा नहीं कर सकतीं."

महबूबा अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की भूमिका अपनाना चाहती हैं: रेखा चौधरी

चौधरी कहती हैं, "सीएम बनने से वो जिम्मेदार भी हो गईं हैं. अब वो दोतरफा राजनीतिक बयान नहीं दे सकतीं. और बीजेपी उनकी साझीदार भी है."

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चौधरी मानती हैं कि महबूबा कुछ नया नहीं कर रही बल्कि अपने पिता की भूमिका अपनाने का प्रयास कर रही हैं, साथ ही वो केंद्र सरकार को भी साफ संकेत देना चाहती हैं.

महबूबा अपने पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद को भारत-परस्ती के प्रतीक और शेख अब्दुल्ला को अलगाववाद के प्रतीक के तौर पर पेश करना चाहती हैं. मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवार की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता घाटी में दशकों पुरानी है.

महबूबा ने कहा, "जब मुफ्ती साहब 1958-59 में राजनीति में आए कश्मीर में भारत-परस्त राजनीति की कोई जगह नहीं थी. जो लोग ऐसी राजनीति करते थे उन्हें काफिर और गद्दार कहा जाता था. ऐसे माहौल में मेरे पिता कश्मीर में भारत के लिए खड़े हुए."

First published: 3 June 2016, 22:47 IST
 
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