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आतंकियों को क्षमादान: क्या कामयाब होगी महबूबा मुफ्ती की योजना?

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 May 2016, 17:48 IST
QUICK PILL
  • आतंकवादी अगर संविधान और देश के कानून का पालन करने की शपथ लेते हैं तो जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती उन्हें सार्वजनिक क्षमादान दे सकती हैं.
  • महबूबा का आतंकियों को क्षमादान देने का विचार नया नहीं है. इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के इलाके के आतंकियों के लिए पुनर्वास की योजना ला चुके हैं.

आतंकवादी अगर संविधान और देश के कानून का पालन करने की शपथ लेते हैं तो जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती उन्हें सार्वजनिक क्षमादान दे सकती हैं. मुफ्ती को यह हथियार उठा चुके युवाओं की घर वापसी का रास्ता लगता है.

जम्मू कश्मीर में सेना, सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय अर्द्धसैनिक बल, जम्मू-कश्मीर पुलिस, राज्य और केंद्र की खुफिया एजेंसियों और वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों से बनी एकीकृत कमान की बैठक की पहली बार अध्यक्षता करते हुए महबूबा ने यह बात कही. 

महबूबा का आतंकियों को क्षमादान देने का विचार नया नहीं है. इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के इलाके के आतंकियों के लिए पुनर्वास की योजना ला चुके हैं. 

2010 में तत्कालीन सरकार ने सीमा पार चले गए युवाओं को वापस लाने के लिए पुनर्वास योजना को मंजूरी दी थी. 

राज्य सरकार ने हथियारों का प्रशिक्षण लेने सीमा पर चले गए कश्मीरी युवाओं के सामने बिना हथियारों के लौटने और शांतिपूर्ण जीवन जीने का प्रस्ताव रखा था. 

सरकार ने इसके लिए चार प्रवेश बिंदु रखे थे जहां से युवा आवश्यक मंजूरी लेकर देश वापस आ सकते थे. उमर अब्दुल्ला की सरकार ने इसके लिए पुंछ रावलकोट, ऊरी-मुजफ्फराबाद, वाघा और इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट को चिह्नित किया था.

उमर सरकार की इस नीति के तहत करीब 350 युवा भारत लौटे जिसमें सैयद लियाकत शाह भी शामिल थे. हालांकि शाह को लेेकर उस वक्त विवाद खड़ा हो गया जब दिल्ली पुलिस ने नेपाल की सीमा से गिरफ्तार दिखाया. शाह की गिरफ्तारी को लेकर मीडिया में खासा बवाल हुआ था.

उमर सरकार की पुनर्वास नीति के तहत करीब 350 युवा भारत लौटे जिसमें सैयद लियाकत शाह भी शामिल थे

बाद में पीडीपी-बीजेपी की नई बनी सरकार ने इस नीति को खत्म कर दिया क्योंकि पिछले डेढ़ सालों के दौरान कोई पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर से कोई देश वापस नहीं आया. 

हालांकि अब एक बार फिर से महबूबा की आतंकियों को क्षमादान देने की नीति यह बताती है कि वह इसे घाटी तक सीमित रखना चाहती है. इसकी वजह यह है कि अब शायद ही कोई कश्मीरी युवा हथियारों के प्रशिक्षण के लिए सीमा पार जाता है. अधिकांश आतंकियों को अब स्थानीय इलाकों में ही हथियार चलाने का प्रशिक्षण मिल जाता है.

राज्य के एक बड़े पुलिस अधिकारी ने कहा, 'सीमा पार से आने वाले जेहादी ही केवल पाकिस्तानी होते हैं.'

लेकिन महबूबा के लिए बड़ी समस्या यह है कि कश्मीर के युवाओं के बीच आतंकवाद को लेकर नया उत्साह पैदा हो गया है.

पिछले साल 100 से अधिक कश्मीरी युवा हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर ए तैयबा में शामिल हो गए थे

2015 में सौ से अधिक युवा हिज्ब और लश्कर में शामिल हो गए थे. दशक में पहली बार ऐसा हुआ है जब घाटी के घोषित 142 आतंकियों में 88 घाटी के ही रहने वाले हैं. बाकी के आतंकी पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हैं. 

हालांकि आतंकियों के मारे जाने और भर्ती के बीच असंतुलन की वजह से आतंकियों की संख्या महज 150-200 के बीच है लेेकिन अभी भी इनमें स्थानीय युवाओं की संख्या विदेशी मूल के आतंकियों से ज्यादा है.

जनवरी से लेकर अब तक 30 आतंकी, पांच नागरिक और आठ सुरक्षा बल के जवानों की मौत हो चुकी है. इसके अलावा आतंकियों के जनाजे में शामिल होने वाले लोगों की संख्या में हो रही बढ़ोतरी सरकार के लिए चिंता का विषय है. जनाजे में अक्सर भारत विरोधी नारे लगते हैं.

जेहाद के लिए भर्ती होने वाले नए युवाओं की उम्र 20 साल के आस पास होती है. अधिकारी ने बताया, 'युवा भावना में बहकर आतंकियों के साथ चले जाते हैं. यह कम प्रशिक्षित भी होते हैं.'

तो क्या महबूबा के प्रस्ताव से स्थिति में बदलाव आ पाएगा? 

हुर्रियत के प्रवक्ता अयाज अकबर बताते हैं, 'बिलकुल नहीं. महबूबा एक बार फिर से लक्षण को निशाना बना रही हैं. वह अभी भी जड़ तक पहुंचने की बात नहीं कर रही हैं.' उन्होंने कहा, 'क्षमादान कोई मामला ही नहीं है. मसला यह है कि आखिर कोई युवा क्यों सभी सुविधाओं को छोड़कर जेहाद का रास्ता अपना रहा है.'

अकबर ने कहा कि महबूबा कश्मीर में बस केंद्र सरकार का चेहरा हैं. उन्होंने कहा, 'क्या उनकी पिता की सरकार पिछले साल मशर्रत आलम को छोड़ पाएं? उन्हें दिल्ली के दबाव में फिर से गिरफ्तार करना पड़ा. वह बस दिल्ली पर निर्भर हैं.'

हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के नेता शाहिद उल इस्लाम भी अकबर की बात से इत्तेफाक रखते हैं. उन्होंने कहा, 'अतीत में ऐसी कई नीतियां सामने आ चुकी हैं. कुछ आत्मसमर्पण करते हैं और कुछ क्षमादान मांगते हैं. लेकिन इससे जमीन पर कोई बदलाव नहीं होता है.' इस नई योजना से भी कुछ नहीं बदलेगा.

हुर्रियत का कहना है कि महबूबा क्षमादान की नीति से बीमारी को दूर करने की कोशिश नहीं कर रही हैं

मुख्य धारा की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी इस नीति को लेकर महबूबा पर निशाना साधा है. एनसी के प्रवक्ता आगा रुहुल्ला ने कहा, 'महबूबा एक बार फिर से हमारी नीति को लागू कर रही है जो पहले सफल रही है. 

कई युवा पीओके से वापस आकर शांतिपूर्ण जिंदगी गुजार रहे हैं.' उन्होंने कहा कि नई नीति बस हमारी नीतियों की बहाली है. इससे कोई परिणाम मिलने की संभावना बेहद कम है.

दिलचस्प तौर पर 2010 की अशांति के बाद एनसी ने भी विरोध प्रदर्शन और पत्थरबाजी की घटना में शामिल युवाओं को सामूहिक क्षमादान देने की घोषणा की थी.

हालांकि इसके बावजूद बड़ी संख्या में मामले दर्ज हुए. पुलिस ने कश्मीर के विभिन्न जिलों में 2009 और 2010 के बीच 1,733 मामले दर्ज किए. सबसे ज्यादा मामले श्रीनगर में दर्ज हुए. 

श्रीनगर में 3,175 लोगों के खिलाफ 738 मामले दर्ज हुए. इसके बाद बारामूला में 867 लोगों के खिलाफ 256 मामले दर्ज हुए.

First published: 25 May 2016, 17:48 IST
 
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