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जम्मू कश्मीर: हुर्रियत की तहरीक़ पर भारी महबूबा का मरहम

रियाज-उर-रहमान | Updated on: 11 January 2017, 7:45 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती जब विधानसभा में बोलने के लिए उठीं तो विपक्ष ने उनके सामने पिछले साल फैली भारी अशांति पर बोलने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा था. अशांति के इस दौर में लगभग 100 लोगों की जानें गई, और इसमें सैकड़ों लोग अंधे हो गए.

महबूबा ने इस मुद्दे पर अपना बयान तो दिया लेकिन उनके पास इसके अलावा भी बहुत कुछ था. उन्होंने हिंसा के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए एक योजना पेश कर दी, उनके ऐसे किसी कदम के बारे में तो उस हुर्रियत ने भी नहीं सोचा था जिसने अशांति के उस दौर में विरोध-प्रदर्शनों को बढ़ावा दिया था.

महबूबा ने सरकार की ओर से अशांति के दिनों में मारे गए लोगों के परिजनों को 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा कर दी. महबूबा ने कुछ बड़े मामलों में मृतकों के परिजनों को नौकरी दिए जाने पर विचार करने की बात भी कही. इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने अशांति के इस दौर में अपनी आंख गंवा चुके लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा भी किया.

मुख्यमंत्री ने कहा कि अंशाति के दिनों में जिन लोगों की आंखों की रोशनी प्रभावित हुई है उनके लिए दिल्ली और दूसरे राज्यों में शिक्षा का प्रबंध किया जाएगा. महबूबा ने यह भी कहा कि वे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अरुण जेटली से पहले ही इस बारे में बात कर चुकी हैं.

एसआईटी का ऐलान

गौर करने की बात यह है कि मारे गए लोगों की जांच की विपक्ष की मांग के जवाब में मुख्यमंत्री ने करन नगर में एटीएम गॉर्ड और दूसरी अन्य हत्याओं की जांच के लिए एक विशेष जांच दल गठित किए जाने की घोषणा भी की. इसके अलावा मुख्यमंत्री ने हरेक जिले में एक विशेष जांच दल गठित किए जाने की घोषणा की, जो कि उस जिले में हुई मौतों और घायल लोगों के मामलों की जांच करेगा और इस बात की रिपोर्ट देगा कि क्या वहां स्थिति से निपटने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग किया गया था. 

इन जांच दलों को एक विशेष समयावधि में ही रिपोर्ट देनी होगी. मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि एक बार रिपोर्ट आ जाने के बाद सरकार पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगी.

मुख्यमंत्री ने यह भी घोषणा की कि सरकार पिछले दिनों बंदी बनाए गए लोगों के मामलों की समीक्षा करेगी और आश्वासन दिया कि जो लोग इन मामलों में अधिक शामिल नहीं होंगे उन्हें छोड़ दिया जाएगा. इसके अलावा मुख्यमंत्री ने पिछले विरोध-प्रदर्शनों में गिरफ्तार किए गए लोगों के मामलों की समीक्षा की बात भी कही.

पुरानी पहल धीमी पड़ी

मुख्यमंत्री ने कहा कि काम-काज संभालने के तुरंत बाद ही उन्होंने 2008 के बाद गिरफ्तार किए गए सभी युवाओं के मामलों की समीक्षा की बात कही थी जिससे कि वे युवा पुन: एक नई जिंदगी की शुरुआत कर सकें. उन्होंने कहा कि लेकिन दुर्भाग्य से घाटी में अशांति फैल जाने की वजह से वह पूरी प्रक्रिया बहुत धीमी हो गई.

स्थानीय उग्रवादियों तक पहुंचने की अपनी इस पहल के अंतर्गत मुख्यमंत्री महबूबा ने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों के साथ उनकी पिछली यूनिफाइड कमांड मीटिंग में उन्होंने साफ कहा था कि हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उग्रवाद की वारदातों में शामिल रहे स्थानीय युवाओं को भी मुख्यधारा के जीवन में लौटने का मौका मिले. और इसके लिए सभी संभव प्रयास करने होंगे.

मुख्यमंत्री ने सदन को यह भी बताया कि अब तक मुठभेड़ के दौरान छह युवाओं को उनके परिवार की सहायता से बचाया जा चुका है.

उम्मीद की किरण

अशांति के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों का आंकड़ा जारी करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि अब सिर्फ 138 लोग ही पुलिस की कस्टडी में हैं. बाकी गिरफ्तार किए गए सभी लोगों को जमानत पर छोड़ा जा चुका है. उन्होंने बताया कि पीएसए के तहत गिरफ्तार किए गए 463 लोगों में से 145 लोगों को अब तक छोड़ा जा चुका है.

अपने भाषण के दौरान महबूबा ने नेशनल कॉन्फ्रेंस से कहा कि वे नहीं चाहतीं कि 2010 तथा 2016 की अशांति में तुलना की जाए. मुख्यमंत्री ने कहा कि हमें लोगों ने इसलिए नहीं चुना है कि हम मारे गए लोगों की गिनती करते रहें, बल्कि इसलिए चुना है कि जम्मू-कश्मीर को इस दलदल से बाहर निकाला जाए.

उन्होंने सदन के सभी साथियों से सहयोग करने की अपील करते हुए कहा कि हमें ऐसे प्रयास करने होंगे कि अब हिंसा का ऐसा कोई दुष्चक्र शुरू नहीं हो और हमारे लोगों को किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़े.

मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों लोगों के मारे जाने के प्रति सदन के द्वारा सर्वमत से चिंता जताते हुए दु:ख और खेद जताए जाने की भी सराहना की और कहा कि सभी सरोकारों के लोगों को आगे आना चाहिए जिससे कि एक हिंसा मुक्त और शांतिपूर्ण राज्य की स्थापना की जा सके.

अलगाववादियों पर ठीकरा

वहीं मुख्यमंत्री ने प्रदर्शनकारियों को भड़काने के लिए पाकिस्तान और अलगाववादियों को दोषी ठहराते हुए कहा कि वे कश्मीरी पंडित और सैनिक कॉलोनियों के मुद्दे पर तो इस काम में सफल नहीं हुए लेकिन बुरहान वानी के मुद्दे पर वे सफल हो गए. मुख्यमंत्री ने कहा कि अशांति फैलाने के प्रयास काफी पहले से ही हो गए थे. उन्होंने कहा कि जिस दिन बुरहान मारा गया, उस दिन मस्जिदों पर नारे लगाए गए और बड़ी संख्या में सीडी भी बांटी गईं.

महबूबा ने यह भी दोहराया कि प्रधानमंत्री मोदी के बातचीत के प्रयास के जवाब में पाकिस्तान बराबर आतंकवादी हमलों को समर्थन देने की रणनीति में जुटा हुआ है और हुर्रियत ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नेतृत्व में आए सभी दलों के प्रतिनिधि मंडल के लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए थे.

इतना ही नहीं, महबूबा ने लोगों के मारे जाने को भी तर्कसंगत ठहराने की दिशा में अपना बयान दिया. उन्होंने कहा कि जब भीड़ पुलिस स्टेशन पर हमला करती हो और सिक्योरिटी कैंपों पर पेट्रोल पंप, पत्थरों और कुल्हाड़ियों से हमला किया जाता हो तो सुरक्षा बलों के लिए भी संयम बरतना मुश्किल हो जाता है.

फिर भी सवाल पुनर्वास का

सीएम के भाषण में पुनर्वास के मुद्दे पर ज्यादा कुछ ठोस नजर नहीं आया. इस मुद्दे पर उनके बयानों में वही सब नजर आया जो कि वह मीडिया से बातचीत करते देती रही हैं लेकिन जो जमीन पर कभी नहीं उतरते. लेकिन मुआवजे के रूप में आर्थिक सहयोग दिए जाने और हिंसा के शिकार युवाओं को सरकारी नौकरी दिए जाने की घोषणा कर मुख्यमंत्री ने हुर्रियत और विपक्षी दल दोनों पर एक बढ़त हासिल कर ली है. यह ऐसा कदम है जो कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह भी 2010 की अशांति के दौरान 120 युवाओं के मारे जाने पर नहीं उठा पाए थे.

पिछले दिनों उनकी सरकार की ओर से जो अतिवादी कदम उठाए गए थे, उसके बाद से महबूबा की सरकार विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही थी. इस पुनर्वास पैकेज से वे कश्मीरी समाज में अलग-थलग पड़ गए युवाओं तक एक उपयोगितावादी पुल का निर्माण करने में सफल हो सकती हैं जिससे कि आगे जाकर उनको पुन: जनसमर्थन वापस अपने पक्ष में लाने में मदद मिल सके.

First published: 11 January 2017, 7:45 IST
 
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