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पर्यावरण का अनुपम, अनुपम मिश्र

प्रभाष जोशी | Updated on: 19 December 2016, 13:37 IST
(फाइल फोटो )

यह कागद मैं उन्हीं अनुपम मिश्र और उनके काम पर काले कर रहा हूं, जिनका ज़िक्र आपने कई बार देखा और पढ़ा होगा. यह जीने का वह रवैया है जिसे पहले समझे बिना अनुपम मिश्र के काम और उसे करने के तरीके को समझना मुश्किल है. जो बहुत सीधा-सपाट और समर्पित दिखता है वह वैसा ही होता तो ज़िन्दगी रेगिस्तान की सीधी और समतल सड़क की तरह उबाऊ होती. 

आप, हम सब एक पहलू के लोग होते और दुनिया लम्बाई चौड़ाई और गहराई के तीन पहलुओं वाली बहुरूपी और अनन्त सम्भावनाओं से भरी नहीं होती. विराट पुरुष की कृपा है कि जीवन-संसार अनन्त और अगम्य है. 

कितना अच्छा है कि अपने हाथों की पकड़, आंखों की पहुंच और मन की समझ से परे इतना कुछ है कि अपनी पकड़, पहुंच और समझ में कभी आ ही नहीं सकता. ऐसा है इसीलिये तो जाना, करना और खोजना है. ऐसा न हो तो जीने और संसार में रह क्या जाएगा?

मन में कहीं बैठा था कि अनुपम से मुठभेड़ सन इकहत्तर में हुई. लेकिन यह गलत है. गांधी शताब्दी समिति की प्रकाशन सलाहकार समिति का काम सम्भालने के बाद देवेन्द्र भाई यानी राष्ट्रीय समिति के संगठन मन्त्री ने कहा कि भवानी भाई ने गांधी जी पर बहुत-सी कविताएं लिखी हैं. वे उनसे लो और प्रकाशित करो.

उन्हें लेने के जुगाड़ में ही भवानी प्रसाद मिश्र के घर जाना हुआ और वहीं उनके तीसरे बेटे यानी माननीय अनुपम प्रसाद मिश्र, अनुपम मिश्र या पमपम से मिलना हुआ. भवानी भाई की ये कविताएँ ‘गांधी पंचशती' के नाम छपीं, इसमें पांच सौ से ज्यादा कविताएं हैं.

सेवक की विनम्र भूमिका

गांधी शताब्दी समाप्त होते-होते एक दिन देवेन्द्र भाई ने कहा कि अनुपम आने वाले हैं, उनका हमें गांधी मार्ग और दूसरे प्रकाशनों में उपभोग करना है. फिर राधाकृष्ण जी ने कहा कि किसी को भेज रहा हूं, जरा देख लेना. अनुपम को देखा हुआ था. लेकिन किसी के भी भेजे हुए को अपन दूर ही रखते हैं. जब तक कोई भेजा हुआ आया हुआ नहीं हो जाता तब तक वह अपनी आंखो में नहीं चढ़ता.

बहरहाल, अनुपम ने काम शुरू किया - सेवक की विनम्र भूमिका में. सर्वोदय में सेवकों और उनकी विनम्र भूमिकाओं का तब बड़ा महत्व होता था. सीखी या ओढ़ी हुई विनम्रता और सेवकाई को मैं व्यंग्य से ही वर्णित कर सकता हूं. विनम्र और सेवक होते हुए भी अनुपम सेवा को काम की तरह कर सकता था.

सेवा का पुण्य की तरह ही बड़ा पसारा होता है. विनम्र सेवक का अहम कई बार तानाशाह के अहम से भी बड़ा होता है. तानाशाह तो फिर भी झुकता है और समझौता करता है, क्योंकि वह जानता है कि ज्यादती कर रहा है. लेकिन विनम्र सेवक को लगता है कि वह गलत कुछ कर ही नहीं सकता, क्योंकि अपने लिये तो वह कुछ करता ही नहीं है ना.

अनुपम में अपने को सेवा का यह आत्म औचित्य नहीं दिखा हालांकि काम वह दूसरों से ज्यादा ही करता था. लादने वाले को ना नहीं करता था और बिना यह दिखाए बिना कि शहीद कर दिया गया है - लदान उठाए रहता. तब उसकी उम्र रही होगी इक्कीस-बाईस की. संस्कृत में एम ए किया था और समाजवादी युवजन सभा का सक्रिय सदस्य रह चुका था. संस्कृत पढ़ने वाले का पोंगापन और युवजन सभा वाले की बड़बोली क्रान्तिकारिता - माननीय अनुपम मिश्र में नहीं थी. 

भवानी प्रसाद मिश्र के पुत्र होने और चमचमाती दुनिया छोड़ कर गांधी संस्था करने का एहसान भी वह दूसरों पर नहीं करता था. ऐसे रहता, जैसे रहने की क्षमा मांग रहा हो. आपको लजाने या आत्मदया में नहीं, सहज ही. जैसे उसका होना आप पर अतिक्रमण हो और इसलिये चाहता हो कि आप उसे माफ कर दें. जैसे किसी पर उसका कोई अधिकार ही न हो और उसे जो मिला है या मिल रहा है वह देने वाले की कृपा हो. 

मई बहत्तर में छतरपुर में डाकुओं के समर्पण के बाद लौटने के लिये चम्बल घाटी शान्ति मिशन ने हमें एक जीप दे दी. हम चले तो अनुपम चकित. उसे भरोसा ही न हो कि अपने को एक पूरी जीप मिल सकती है. सच, इस जीप में अपन ही हैं और अपने कहने पर ही यह चलेगी. ऐसे विनम्र सेवक का आप क्या कर लेंगे? समझ न आये तो अचार भी डाल कर नहीं रख सकते. अनुपम मिश्र से बरतना आसान नहीं था. अब भी नहीं है.

बहरहाल, गांधी शताब्दी आई-गई हो गई और गांधी संस्थाओं ने उपसंहार की तरह गांधी जी का काम फिर शुरु किया. विनोबा क्षेत्र सन्यास लेकर पवार के परमधाम में बैठे और बी से बाबा और बी से बोगस कह कर ग्राम स्वराज कायम करने की निजी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए. 

सबको लगता था कि अब यह काम जेपी का है. और जेपी को लगने लगा कि ग्राम स्वराज सर्वेषाम् अविरोधेन नहीं आयेगा. संघर्ष के बिना आन्दोलन में गति और शक्ति नहीं आयेगी और अन्याय से तो लड़ना ही होगा. बाबा के रास्ते से जेपी कुछ करना चाहते थे, लेकिन लक्ष्य उनका भी ग्राम स्वराज ही था. मुसहरी में जेपी ने नक्सलवादी हिंसा का सामना करने का एलान किया. फिर बांग्लादेश के संघर्ष और चम्बल के डाकुओं के समर्पण में लग गए.

पुण्य कर्म

अनुपम ने तालाब को भारतीय समाज में रख कर देखा है. समझा है. अद्भुत जानकारी इकट्ठी की है और उसे मोतियों की तरह ही पिरोया है. कोई भारतीय ही तालाब के बारे में ऐसी किताब लिख सकता था. लेकिन भारतीय इंजीनियर नहीं, पर्यावरणविद नहीं, शोधक विद्वान नहीं, भारत के समाज और तालाब से उसके सम्बन्ध को सम्मान से समझने वाला विनम्र भारतीय. ऐसी सामग्री हिन्दी में ही नहीं अंग्रेजी और किसी भी भारतीय भाषा में आप को तलाब पर नहीं मिलेगी. 

तालाब पानी का इंतजाम करने का पुण्य कर्म है जो इस देश के सभी लोगों ने किया है. सर्वोदयी गतिविधियों का दिल्ली में केन्द्र 'गांधी शान्ति प्रतिष्ठान' हो गया और अनुपम और मैं आन्दोलन के बारे में लिखने, पत्रिकाएं निकालने और सर्वोदय प्रेस सर्विस चलाने में लग गए. उसी सिलसिले में अनुपम का उत्तराखण्ड आना-जाना होता. भवानी बाबू गांधी निधि में ही रहने आ गए थे, इसलिये कामकाज दिन-रात हो सकता था. 

फिर चमोली में चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी ने 'चिपको' कर दिया. चिपको आन्दोलन पर पहली रपट अनुपम मिश्र ने ही लिखी. चूंकि सर्वोदयी पत्रिकाओं की पहुंच सीमित थी इसलिये वह रपट हमने रघुवीर सहाय को दी और 'दिनमान' में उन्होंने उसे अच्छी तरह छापा. चिपको आन्दोलन को बीस से ज्यादा साल हो गए हैं, लेकिन अनुपम का उत्तराखण्ड से सम्बन्ध अब भी उतना ही आत्मीय है. 

जिसे आज हम पर्यावरण के नाम से जानते हैं, उसके संरक्षण का पहला आन्दोलन चिपको ही था और वह किसी पश्चिमी प्रेरणा से शुरु नहीं हुआ. पेड़ों को कटने से रोकने के लिये शुरु हुए इस आन्दोलन और इससे आई पर्यावरणीय चेतना पर कोई लिख सकता है तो अनुपम मिश्र. लेकिन कोई कहे कि वही लिखने के अधिकारी हैं तो अनुपम मिश्र हाथ जोड़ लेंगे. अपना क्या है जी, अपन जानते ही क्या हैं!

'एक्सप्रेस' के दिन

लेकिन इसके पहले कि अनुपम मिश्र पूरी तरह पर्यावरण के काम में पड़ते, बिहार आन्दोलन छिड़ गया. हम लोग गांधी शान्ति प्रतिष्ठान से 'एवरीमैन्स' होते हुए 'एक्सप्रेस' पहुंच गए और 'प्रजानीति' निकालने लगे. तब भी दिल्ली के एक्सप्रेस दफ्तर में कोई विनम्र सेवक पत्रकार था तो अनुपम मिश्र. सबकी कॉपी ठीक करना, प्रूफ पढ़ना, पेज बनवाना, तम्बाकू के पान के जरिये प्रेस को प्रसन्न रखना और झोला लटका कर पैदल दफ्तर आना और जब भी काम पूरा हो पैदल ही घर जाना. 

प्रोफेशनल जर्नलिस्टों के बीच अनुपम मिश्र विनम्र सेवक मिशनरी पत्रकार रहे. इमरजेंसी लगी, ‘प्रजानीति’ और फिर 'आसपास' बन्द हुआ तो अनुपम को इस मुश्किल भूमिका से मुक्ति मिली. 'जनसत्ता' निकला तो रामनाथ जी गोयनका की बहुत इच्छा थी कि अनुपम उसमें आ जाएं. अपन ने भी उसे समझाने-पटाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अनुपम बन्दा लौट कर पत्रकार नहीं हुआ.

प्रोफेशनल पत्रकार हो सकते की तबीयत अनुपम मिश्र की नहीं है. क्यों नहीं है? यह आगे समझ में आएगा. इमरजेंसी में ‘एक्सप्रेस’ से भी बुरा हाल गांधी शान्ति प्रतिष्ठान का था. बाबूलाल शर्मा की सेवाएं अब भी वहीं थी, वे वहां चले गए. मैं भी किसी तरह वहीं लौटा. लेकिन अनुपम मिश्र फ्रीलांसर हो गए. 

आपने बहुतेरे फ्रीलांसर देखे होंगे. अनुपम उनकी छवि में कभी फिट नहीं हो सकता. लेकिन इमरजेंसी के उन दिनों में जो भी करने को मिल जाए और अच्छा और काफी था. अनुपम और उदयन शर्मा इधर-उधर लिख कर थोड़ा-बहुत कमा लेते. अनुपम फोटोग्राफी भी कर सकता है. लेकिन फोटो- पत्रकारिता से कोई आमदनी नहीं होती.

इमरजेंसी उठी और चुनाव में जनता पार्टी की हवा बहने लगी तो कई लोग कहते कि अब हम लोगों के वारे-न्यारे हो जाएंगे. किसी को यह भी लगता कि प्रभाष जोशी तो चुनाव लड़के लोकसभा पहुंच जाएगा. जेपी से निकटता को भला कौन नहीं भुनायेगा. लेकिन अपन 'एक्सप्रेस' में चुनाव सेल चलाने में लगे और अनुपम वहां भी मदद करने लगा. जनता पार्टी जीती तो गांधी शान्ति प्रतिष्ठान से सरकारी दमन का साया हटा. अनुपम आखिर प्रतिष्ठान में काम करने लगा. अपना एक पांव 'एक्सप्रेस' में और दूसरा शान्ति प्रतिष्ठान में. 

देश का काम विदेशी रुपयों से?

उन्हीं दिनों नैरोबी से राष्ट्रसंघ के पर्यावरण कार्यक्रम का पत्र मिला कि क्या गांधी शांति प्रतिष्ठान भारत की स्वयंसेवी संस्थाओं का एक सर्वे करके दे सकता है? हम इतने डॉलर सर्वे के लिये दे सकेंगे. यह भी ख्याल रखिये कि क्या ये संस्थाएं पर्यावरण का काम करने में रुचि ले सकती हैं. राधाकृष्ण जी और मुझे लगा कि यह सर्वे तो अनुपम ही सबसे अच्छा कर सकता है. 

काम उसे दिया गया और निश्चित समय में न सिर्फ पूरा हुआ बल्कि जितना खर्च मिला था उसका एक तिहाई भी खर्च नहीं हुआ. उस सर्वे से अनुपम का देश की स्वयंसेवी संस्थाओं और पर्यावरण के काम में लगी विदेशी संस्थाओं से जो सम्पर्क हुआ वह न सिर्फ कायम है बल्कि जीवन्त चल रहा है.

लेकिन एक बार राधाकृष्ण जी ने अनुपम से कहा कि फलां-फलां विदेशी संस्था से इतना पैसा इस प्रोजेक्ट के लिये मिला है और हमारी इच्छा है कि इसमें से तुम पांच-छ: हज़ार रुपया महीना ले लो. तब अनुपम के मित्र इससे ज्यादा वेतन सहज ही पाते थे और प्रोजेक्ट करने वाले को तो वे पैसे मिलने ही थे. लेकिन अनुपम घबराया-सा मेरे पास आया. वह प्रतिष्ठान की सात सौ रुपट्टी के अलावा कहीं से भी एक पैसा लेने को तैयार नहीं था. विदेशी पैसा है, मैं जानता हूँ इफरात में मिलता है. इसे लेने वालों का पतन भी मैंने देखा है. अपने देश का काम हम दूसरों के पैसे से क्यों करें?

अगर आप अनुपम को जानते हों तो उसका संकोच एकदम समझ में आ जाएगा. नहीं तो उसके मुंह पर तारीफ और पीठ पीछे बुद्धू कहने वालों में आप भी शामिल हो सकते हैं. पिछले तीन साल से होशंगाबाद में नर्मदा के किनारे उसके लिये पर्यावरण की कोई संस्था खड़ी करने के जुगाड़ में हूं. इसलिये भी कि देश के पर्यावरण के लिये नर्मदा योजना आर-पार की साबित हो सकती है. 

लेकिन अनुपम को सरकारी जमीन और पैसा नहीं चाहिये. विदेशी पैसे को वह हाथ नहीं लगाएगा, और तो और, गांधी शान्ति प्रतिष्ठान छोड़कर अपना बनाया गांधी शान्ति केन्द्र चला रहे, राधाकृष्ण जी से भी वह संस्था खड़ी करने के लिये एकमुश्त पैसा नहीं लेगा. कुछ उद्योगपतियों से पैसा ला सकता हूं, लेकिन मुझे मालूम है कि वे पैसा क्यों और कैसे देते हैं. और वह लाना अनुपम के साथ छल करना होगा.

पॉवर विदाउट परपज़

पर्यावरण का काम आजकल विदेश यात्रा का सबसे सुलभ मार्ग है. अनुपम एक-आध बार तो नैरोबी गया, क्योंकि पर्यावरण सम्पर्क केन्द्र के बोर्ड में निदेशक बना दिया गया था. कुछ और यात्राएं भी वैसे ही की जैसे आप-हम मेरठ, अलवर या चण्डीगढ़ हो आते हैं. झोला टांगा और हो आए. मैं नहीं जानता कि बाहर बैठक में अंग्रेजी कैसे बोलता होगा? बोलना ही नहीं चाहता. मुंह टेढ़ा करके अमेरिकी स्लैंग में अंग्रेजी बोलना तो अनुपम के लिये पाप-कर्म होगा. धीरे-धीरे उसने बहुत जरूरी विदेश यात्राएं भी बन्द कर दीं. 

पिछले साल रियो में हुए विश्व सम्मेलन का कार्यक्रम तय करने के लिए पिछले साल फ्रांस सरकार की मदद से पर्यावरण सम्पर्क केंद्र ने पेरिस में सम्मेलन किया था. अनुपम को ही लोग भेजते थे. उसने भेजे पर खुद ऐन मौके पर ना कर गया. रियो भी नहीं गया. 

भारत सरकार या राज्य सरकारों को पर्यावरण पर सलाह वह नहीं देता. कमेटियों और प्रतिनिधिमंडलों में शामिल नहीं होता. गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में चुपचाप सिर गड़ाये मनोयोग से काम करता रहता है. उसकी पुरानी कुर्सी के पीछे एक स्टिकर चिपका है - पॉवर विदाउट परपज - सस्ता बिना प्रयोजन के. अनुपम के पास प्रयोजन ही नहीं सत्ता का स्पर्श भी नहीं है. आज तक वैसे ही तंगी में यात्रा करता है जैसे हम जेपी आन्दोलन के समय झोला लटकाये किया करते थे. और ज्यादातर यात्राएँ बीहड़, सुनसान, रेगिस्तान या जंगलों से.

अनुपम को लड़कपन में गिलटी की टीबी हुई थी. इस बीच उसके दिल ने भवानी बाबूवाला रास्ता पकड़ लिया था. नारी कभी पचास हो जाए और कभी एक सौ पचास. दिल का चलना इतना अनियमित हो गया कि सब परेशान, कौन जाने कब क्या हो जाए! लड़-झगड़ कर डॉक्टर खलीलुल्लाह को दिखाया. उन्होंने गोली दी और कहा कि पेस मेकर लगवा लो. मन्ना यानी भवानी बाबू को लगा ही था. 

लेकिन अनुपम ने न गोली ली न पेस मेकर लगवाना मंजूर किया. निमोनिया कभी भी हो जाए. मुझे और बनवारी (जो कि अनुपम के कॉलेज के दोस्त हैं) को लगे कि अनुपम में शहीद होने की इच्छा है. लेकिन अनुपम अपनी बीमारी से पर्यावरण काम करते हुए और किताबे निकालते हुए लड़ रहा है.

चिट्ठी लिखकर किताब बेची

'देश का पर्यावरण' उसने कोई नौ-दस साल पहले निकाली. सम्पादित है. लेकिन क्या तो जानकारी, क्या भाषा, क्या सज्जा और क्या सफाई! जिस दिलीप चिंचालकर ने ‘जनसत्ता’ का मास्टहेड बनाया, अखबार डिजाइन किया उसी दिलीप ने इस किताब का ले आऊट, स्केचिंग और सज्जा की है. हिन्दी में ही नहीं, इस देश में अंग्रेजी में भी ऐसी किताब निकली हो तो बताना! 

लेकिन अनुपम ने किताब निकालने में भी शान्ति प्रतिष्ठान का पैसा नहीं लगाया. फोल्डर छपाया. संस्थाओं और पर्यावरण में रुचि रखने वाले लोगों से अग्रिम कीमत मंगवाई. उसी से कागज़ खरीदा, छपाई करवाई. फिर खुद ही चिट्ठी लिख-लिख कर किताब बेची. दो हजार छपाई थी, आठ हजार लागत लगी. दो लाख कमाकर अनुपम ने प्रतिष्ठान में जमा कराया. 

4 साल बाद ‘हमारा पर्यावरण’ निकाली. ‘देश के पर्यावरण’ से भी बेहतर इसका भी फोल्डर छपवाकर अग्रिम कीमत इकट्ठी की. इस बार खर्च डेढ़ लाख के आस-पास हुआ. पुस्तक छपी 6 हजार. फिर चिट्ठियां लिखकर बेची. शान्ति प्रतिष्ठान में जमा कराए (कमा कर) नौ लाख रुपए. आज ये दोनों किताबें दुर्लभ हैं और मजा यह है कि पर्यावरण मन्त्रालय ने इन पुस्तकों को नहीं खरीदा. 

हिन्दी के किसी भी राज्य ने किताबों की सरकारी खरीद में इसे नहीं खरीदा. किसी प्रकाशक ने वितरण और बिक्री में कोई मदद नहीं की. पिछले दस साल के देश के पर्यावरण पर हिन्दी में ऐसी किताबें नहीं निकलीं. अनुपम ने न सिर्फ लिखी और छापी, बेची भी और कोई दस लाख कमाकर संस्था को दिया.

और अनुपम मिश्र ने ‘आज भी खरे हैं तालाब’ निकाली है यह संपादित नहीं है अनुपम ने खुद लिखी है. नाम कहीं अन्दर है छोटा सा, लेकिन हिन्दी के चोटी के विद्वान ऐसी सीधी, सरल, आत्मीय और हरवाक्य में एक बात कहने वाली हिन्दी तो जरा लिखकर बताएं! जानकारी की तो बात कर ही नहीं रहा हूं. अनुपम ने तालाब को भारतीय समाज में रख कर देखा है. समझा है. अद्भुत जानकारी इकट्ठी की है और उसे मोतियों की तरह की पिरोया है. 

कोई भारतीय ही तालाब के बारे में ऐसी किताब लिख सकता था. लेकिन भारतीय इंजीनियर नहीं, पर्यावरणविद नहीं, शोधक विद्वान नहीं, भारत के समाज और तालाब से उसके सम्बन्ध को सम्मान से समझने वाला विनम्र भारतीय. ऐसी सामग्री हिन्दी में ही नहीं अंग्रेजी और किसी भी भारतीय भाषा में आप को तलाब पर नहीं मिलेगी. तालाब पानी का इंतजाम करने का पुण्य कर्म है जो इस देश के सभी लोगों ने किया है. उनको उनके ज्ञान को और उनके समर्पण को बता सकने वाली एक यही किताब है. 

आप चाहें तो कोलकाता का राष्ट्रीय सभागार देख लें. यह किताब भी दूसरी किताबों की तरह ही निकली है. ‘वृक्ष मित्र पुरस्कार’ जिस साल चला अनुपम को दिया गया था. पर्यावरण का अनुपम, अनुपम मिश्र है. उसके जैसे व्यक्ति की पुण्याई पर हमारे जैसे लोग जी रहे हैं. यह उसका और हमारा- दोनों का सौभाग्य है.

अनुपम मिश्र पर यह यह लेख 2006 में प्रभाष जोशी ने लिखा था जिसे इंडिया वॉटर पोर्टल से साभार लिया गया है. 

First published: 19 December 2016, 13:37 IST
 
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