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अकबर के बहाने कमजोर होती मोदी सरकार ! आरोपों में घिरकर पहली बार किसी मंत्री को देना पड़ा इस्तीफा

आदित्य साहू | Updated on: 17 October 2018, 18:42 IST

मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर को आखिरकार अपना इस्तीफा देना पड़ा है. उन पर कई महिला पत्रकारों ने यौन शोषण का आरोप लगायाा था. साल 2001 में गुजरात के सीएम बनने के बाद से आज पीएम बनने के चार साल बाद नरेंद्र मोदी के शासन में पहली बार किसी मंत्री को आरोपों और विपक्षी आलोचना के कारण इस्तीफा देना पड़ा है. यहां तक कि साल 2002 में हुए गुजरात दंगे में इतनी फजीहत होने के बाद भी मोदी सरकार में किसी दबाव के कारण कोई इस्तीफा नहीं हुआ. यह पहली बार है जब मोदी सरकार में किसी मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है.

अकबर जाने-माने संपादक रहे हैं. वह देश के कई अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ, डेक्कन क्रॉनिकल से लेकर द एशियन एज जैसे कई बड़े अखबारों के संपादक रह चुके हैं. अकबर ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जीवनी पर आधारित 'द मेकिंग ऑफ इंडिया' और कश्मीर पर आधारित 'द सीज विदिन' चर्चित किताबें लिखीं. इसके अलावा 'द शेड ऑफ शोर्ड', 'ए कोहेसिव हिस्टरी ऑफ जिहाद' और 'ब्लड ब्रदर्स' के भी लेखक रहे.

अकबर को सियासत में कांग्रेस पार्टी से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी लाए. इंदिरा गांधी के निधन के बाद राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो अकबर के साथ उनके रिश्ते गहरे बने. इसी के बाद अकबर राजनीति में आए. तब उन्होंने पत्रकारिता छोड़ सियासत में कदम रखा. उस समय कांग्रेस ने अकबर को साल 1989 में बिहार के मुस्लिम बाहुल्य लोकसभा सीट किशनगंज से मैदान में उतारा. हालांकि कांग्रेस देश में हार गई, लेकिन अकबर चुनाव जीत गए थे.

फिर साल 1991 में राजीव गांधी के निधन के बाद अकबर कांग्रेस छोड़कर दोबारा पत्रकारिता में लौट आए. अकबर फिर से पूर्णकालिक पत्रकार बन गए थे. यहां तक कि साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद उन्होंने राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर अलोचना की थी. हालांकि बाद में वह कांग्रेस और गांधी परिवार की आलोचना करते हुए कई लेख लिखने के बाद बीजेपी के करीब आए. 

साल 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद वह बीजेपी में शामिल हुए और पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया. 5 जुलाई 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार में वह विदेश राज्यमंत्री बने. तब उन्हें झारखंड से राज्यसभा सदस्य बनाया गया था. इसके बाद दोबारा से मध्य प्रदेश से वह राज्यसभा सदस्य बने.

फिर आया एमजे अकबर का बुरा दिन और भारत में शुरू हुए #MeToo अभियान के तहत उनपर सबसे पहले पत्रकार प्रिया रमानी ने यौन शोषण का आरोप लगाया. प्रिया रमानी ने 'हार्वे विन्सिटन्स ऑफ द वर्ल्ड' नाम से लिखे पोस्ट में कहा था कि एम जे अकबर ने होटल के कमरे में उनका इंटरव्यू लिया था और उन्हें शराब ऑफर की थी. इसके बाद उन्होंने बिस्तर पर उनके पास बैठने को कहा था. महिला पत्रकार ने पोस्ट में लिखा था कि अकबर अश्लील फोन कॉल्स, मैसेज और असहज टिप्पणी करने में माहिर हैं. उन्होंने हिन्दी गाने भी गाए थे.

प्रिया रमानी ने ट्वीट किया था कि एमजे अकबर ने होटल रूम में इंटरव्यू के दौरान कई महिला पत्रकारों के साथ आपत्तिजनक हरकतें की हैं. महिला ने लिखा कि कई युवा महिलाएं उनकी गलत हरकतों की भुक्तभोगी हैं. लेख के प्रकाशन के समय आरोपी का नाम नहीं दिया गया था. लेकिन अब बताया गया कि वे एमजे अकबर हैं.

इसके बाद कई और महिला पत्रकारों ने उन पर यौन शोषण के आरोप लगाए. कुछ पत्रकारों ने तो ऐसी-ऐसी बातें लिखीं जिसे पढ़कर आपको घिन आ जाएगी. फोर्स मैगजीन की एक्जिक्यूटिव एडिट गजाला वहाब ने उनके खिलाफ अपने बुरे अनुभवों के बारे में विस्तार से आपबीती लिखी. इसके बाद विदेशी पत्रकार ने भी उनके खिलाफ यौन शोषण के आरोप लगाए. उनकी आपबीती भी इतनी बुरी थी कि अकबर की चौतरफा आलोचनाएं होने लगीं. 

लेकिन अब आलोचनाएं सिर्फ अकबर की नहीं मोदी सरकार की भी होने लगी. जिस मंत्रालय में वह मंत्री थे उनकी हेड यानि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से जब महिला होने के नाते अकबर के बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने इस पर कोई जवाब नहीं दिया. यहां तक कि मोदी सरकार में कई महिला मंत्रियों ने इस पर चुप्पी साधे रखी. 

इसका नतीजा यह हुआ कि मोदी सरकार का समर्थन करने वाले लोगों को भी अकबर खटकने लगे और सरकार को विपक्ष के साथ-साथ अपने लोगों की आलोचना का भी शिकार होना पड़ा. हद तो तब हो गई जब इतने आरोपों के बाद भी BJP अध्यक्ष अमित शाह ने कह दिया कि हम जांच बिठाएंगे और जांच के बाद ही अकबर पर कोई निर्णय लिया जाएगा. मोदी सरकार के ही एक सांसद उदितराज ने तो अकबर का खुला सपोर्ट कर दिया था.

लेकिन लगभग 10 दिन बीत जाने के बाद जब अकबर वापस भारत आए तो NSA अजीत डोभाल उनसे मिलने गए और फिर वह अमित शाह से भी मिलने गए. हो सकता है डोभाल ने उनसे सरकार की हो रही आलोचनाओं के बारे में अवगत कराया हो. इसके बाद मोदी सरकार के कान खड़े हुए. जिस सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान को जोर-शोर से चलाया था. जब महिला जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उनकी घनघोर आलोचना होने लगी तो सरकार चेती.

वैसे भी इसी साल के अंत में पांच राज्यों में चुनाव हैं और अगले साल देश में आम चुनाव हैं. अगर सरकार इस पर जल्द ही कोई निर्णय न लेती और 18 अक्टूबर को कोर्ट में वह दोषी साबित होते तो मोदी सरकार की देश में और फजीहत हो जाती. शायद इसी डर से नरेंद्र मोदी सरकार ने आनन-फानन में अकबर से इस्तीफा देने को कहा होगा. कहा जा रहा है कि खुद पीएम मोदी ने अकबर से इस्तीफा देने को कहा है. इससे यह तो साबित होता ही है कि कहीं न कहीं मोदी सरकार चुनावों से पहले लोगों की और फजीहत झेलना नहीं चाहती.

First published: 17 October 2018, 18:37 IST
 
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