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बुनियादी आय की नीति पर कुछ चुभने वाले बुनियादी सवाल

अमिताभ पांडेय | Updated on: 28 January 2017, 8:14 IST

सत्ता में आने के लिए राजनेताओं को वोट चाहिए. एक बार सत्ता में आ जाने के बाद वे ऐसी नीतियां और विचारधारा चुनते हैं, जो उनके लिए राजनीतिक फायदे की हो. इस तरह नीति निर्धारण, वोट लेना और सिद्धांत, ये सब आपस में गुंथे हुए हैं. इसके बावजूद यह आवश्यक है कि तर्क और, यदि संभव हो तो, आंकड़ों के आधार पर नीति के मुख्य विकल्पों को आंकने की कोशिश की जाए.

हाल ही में वरिष्ठ नीति निर्माताओं ने बेसिक इनकम योजना का सुझाव दिया है. हैरानी की बात है कि प्रतिष्ठान में ही इसका सार्वजनिक रूप से विरोध हो रहा है. इस तरह की कोई योजना लागू होती है, तो यह आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था में काफी अहम कदम होगा. इस तरह की नीति को मजबूती देने वाली जो बुनियादी बातें हैं, उसे करीब से, निष्पक्षता से देखने और उस पर विस्तार से सार्वजनिक बहस की जरूरत है.

कितनी न्यूनतम आय और किसे मिले?

यदि सरकार को ‘जनकल्याण’ के स्थाई मानदंड के रूप में ‘बुनियादी आय’ का वितरण करना है, तो पहला सवाल न्यूनतम आय तय करने का है और यह भी कि इसे पाने वाले कौन होंगे. परंपरागत रूप से गरीब वे माने जाते हैं, जिनके पास एक निश्चित न्यूनतम कैलोरीज लेने का सामर्थ्य नहीं होता.

इसे पैसों के संदर्भ में देखा जाए, तो उसे ‘बुनियादी न्यूनतम आवश्यकता’ माना जा सकता है. ‘गरीबी रेखा’ से नीचे की जनसंख्या के प्रतिशत पर बहस के बावजूद, इस तरह के ‘बुनियादी न्यूनतम आवश्यकता’ तक शायद बिना किसी ज्यादा मतभेद के पहुंचा जा सकता है. इस विषय में काफी काम  हुआ है. 

सबसे विवादस्पद मुद्दा यह है कि इस का लाभ लेने वाले कौन लोग होंगे. सीधा-सा जवाब है, केवल वे जो ‘गरीबी रेखा’ से नीचे हैं. उन्हें यह ‘बुनियादी आय’ मिलनी चाहिए. बदकिस्मती से, जिन सर्वे के आधार पर गरीबी के प्रतिशत का अनुमान किया जाता है, वह प्रतिशत हर भारतीय का सूचीबद्ध शेयर और उनकी कैलोरी की खपत नहीं है. हमारे पास 1.2 बिलियन लोगों की वर्गीकृत सूची नहीं है कि कौन गरीब है या नहीं हैं. इसलिए कोई कैसे जान सकता है कि किसे बुनियादी न्यूनतम आय मिलनी चाहिए और किसे नहीं? 

यह मुद्दा व्यवहार में और किसी भी उचित समय सीमा में हल होता नजर नहीं आ रहा. इसके अलावा शोध से सामने आया है कि गरीबी स्थिर, अपरिवर्तनशील तथ्य नहीं है. किसी समय विशेष में गरीबों की सही सूची जादू से बना भी ली जाए, तो भी यह स्थाई सूची नहीं होगी.

लोग विभिन्न कारणों से विभिन्न समयों में मुफलिसी में आ जाते हैं और उससे बाहर भी निकल जाते हैं. गरीबी परिवर्तनशील तथ्य है. आधुनिक भारत की किस संस्था पर ऐसी परिवर्तनशील सूची बनाने और बनाए रखने पर भरोसा किया जा सकता है? उसकी किस हद तक विश्वसनीयता रहेगी?

लागू करने की मुश्किलें

यहां संस्थागत क्षमता पर संक्षेप में विचार करना आवश्यक है. भारत ने साधारण जन के लिए नीति लागू करने में, पिछले 6 दशकों से ज्यादा समय में अपनी नाकाबिलियत ही दिखाई है. ना तो ये महान योजनाएं नई हैं और ना ही अंधाधुंध भ्रष्टाचार और अयोग्यता नई बात है. इस कारण ऐसी योजनाएं स्थानीय राजनेता, नौकरशाह और उच्च वर्ग के लोगों और उनके समर्थकों की संपन्नता का साधन बन कर रह गई हैं. 

यदि गरीबों को पहचानना है और उन पर मोहर लगानी है, तो जवाबदेह लोगों द्वारा मौजूदा संपत्ति में हिस्सेदारी बढ़ाना (रेंट सीकिंग) अनिवार्य करना होगा. अर्थशास्त्रियों के शब्द-जाल में ‘समावेश’ और ‘निष्कासन’ की गलतियां, कम से कम कहें तो भी बहुत अहम हो सकती हैं. सूची को निरंतर अद्यतन रखना होगा, उस पर नजर रखनी होगी. पर क्या इस मांग को पूरा करना संभव है? यह असंभव लगता है. 

आय के संसाधन की समस्या

इसका एक समाधान यूनिवर्सल स्कीम हो सकती है. इसे कई विशेषज्ञों ने सुझाया है, और इसके लिए प्रारंभिक प्रयोग और विस्तृत आंकड़े उपलब्ध हैं. हर नागरिक न्यूनतम बुनियादी आय का हकदार होना चाहिए. यहां नागरिक और गैरनागरिक वासियों की समस्या ना हो. इससे उन्हें चुनने और योजना लागू करने में अंतर्निहित भ्रष्टाचार की समस्या दूर होगी. हालांकि इससे करोड़ों सशक्त जनसंख्या को बुनियादी आय देने के लिए जरूरी संसाधनों की समस्या व्यापक रूप से बढ़ेगी. 

विशेषज्ञों का तर्क है कि पैसों की व्यवस्था हो सकती है यदि खाद्य वस्तुएं, खाद और पेट्रोलियम के लिए हाल में दी जाने वाली भारी सब्सिडी को हटा दिया जाए और दूसरे अनावश्यक खर्चों में कटौती कर दी जाए. पर यह जितना कहना आसान है, उतना करना मुश्किल. इसमें निहित स्वार्थ-कथित वोट बैंक-बहुत महत्वपूर्ण है और उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है.

तकनीक से मदद मिलेगी?

हम मान भी लें कि संसाधन खोजे जा सकते हैं,  तो फिर लागू करने की अहम समस्या आती है. यहां जादू की छड़ी तकनीक है. सभी नागरिकों को आधार कार्ड जारी किए गए हैं और इन्हें सभी बैंक खातों से लिंक किया गया है. यह सैद्धांतिक रूप से तो ठीक लगता है. अनकही धारणा यह है कि आधार कार्ड फर्जी होने की कोई गुंजाइश नहीं है और उस आवेदन को पुष्ट करने के लिए पर्याप्त मजबूत आधार है, जिससे हर कार्डधारी अपने खातों से नियमित रूप से पैसा ट्रांसफर करवा सकता है. 

इस व्यवस्था में कार्डधारी की मृत्यु हो जाने पर डेटा को बराबर अद्यतन करने की जरूरत पड़ेगी. यह अपने आप में बड़ा काम है और इसके लिए राष्ट्रव्यापी मोनीटरिंग सिस्टम की आवश्यकता है, जो फिलहाल मौजूद नहीं है. इसके अलावा हर नागरिक के पास आधार कार्ड है या नहीं और वह बैंक खाते के साथ लिंक किया हुआ है या नहीं, इसे सुनिश्चित करने का काम अब भी चल रहा है. यह विकास और सामाजिक बदलाव का साधन बने, उससे पहले इसे पूरा करने और पुष्ट करने की आवश्यकता है. 

परिवर्तनकारी असर

अधिकांश महान विचारों के उलट, इसे एक अहम अध्ययन से पुष्ट किया गया है. मध्यप्रदेश के 9 गांवों में 6000 स्त्री-पुरुष और बच्चों को डेढ़ साल तक बुनियादी आय दी गई. अधिकांश को हर महीने. गांवों में जाकर प्रोफेशनल अर्थशास्त्रियों ने इसके प्रभाव को मॉनीटर किया और विस्तार से अध्ययन किया. 

निष्कर्ष था कि ‘एक साधारण बुनियादी आय का बिना किसी शर्त के व्यक्तिगत रूप से नकद भुगतान’ का ‘परिवर्तनकारी’ असर रहेगा. इससे ‘उत्पादकता, आय और काम और श्रम में बढ़ोतरी होगी’, ‘विस्तृत, संतोषजनक और अपेक्षाकृत न्यायसंगत रूप से काम की गुणवत्ता और मात्रा बढ़ेगी’ और ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता, खासकर औरतों की बढ़ेगी...उनकी भी जो शारीरिक-मानसिक रूप से अक्षम और बुजुर्ग हैं.’

भारत जैसे विशाल देश के लिए, जहां बहुत सारी अनेकताएं हैं, यह सैंपल छोटा है. राष्ट्रव्यापी नीति अपनाने से पहले शायद इस तरह के अध्ययनों को विभिन्न इलाकों में करवाने की जरूरत है, केवल सकारात्मक नतीजे ही नहीं, संभावित नकारात्मकता देखने के लिए भी. यहां फिर विश्वसनीयता की समस्या खड़ी होती है. ऐसे अध्ययनों को विश्वास के साथ दोहराना मुश्किल होगा, खासतौर से तब जब यह अध्ययन सरकारी हो. 

चाहे जैसा भी हो, पर हमारे पास कम से कम विस्तृत, विश्वसनीय, विशेषज्ञों द्वारा किया अध्ययन है. इसके काफी स्पष्ट नतीजे हैं. हमने देखा है और भुगता भी है कि पहले नीतियां, छोटे सेंपल रहे, तो प्रोफेशनल अध्ययन की बजाय बिना किसी ठोस आधार के अपना ली गईं.

सारी मुश्किल की जड़ लागू करने में है. बुनियादी आय की नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक तैयारी, श्रमसाध्य, लंबी और विस्तृत कवायद की रहेगी. एक ऐसी व्यवस्था आवश्यक है, जो एकदम सटीक हो और लगातार आवश्यक विस्तृत डेटा इकट्ठा कर सके. 

इससे नीति को व्यापक रूप से और ईमानदारी से लागू करना सुनिश्चित किया जा सकेगा. इसमें बैंकिंग व्यवस्था की अहम भूमिका रहेगी-और इस व्यवस्था ने हाल के महीनों में अपनी महिमा के अनुरूप काम नहीं किया है. बुनियादी आय के संदर्भ में, सावधानी से तैयारी की बजाय बेसब्र लोकलुभावन पर जोर देने से बहुत संभव है कि यह मुश्किलों को न्यौता देने वाली नीति रहेगी. 

First published: 28 January 2017, 8:14 IST
 
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