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ममता के कार्यकाल में भी मुस्लिमों की हालत जस की तस

शौर्ज्य भौमिक | Updated on: 19 February 2016, 8:13 IST
QUICK PILL
  • स्नैप की रिपोर्ट गाइडेंस गिल्ड और प्रतीचि ट्रस्ट के साथ मिलकर तैयार की गई है. रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल में 80 फीसदी ग्रामीण मुसलमान 5,000 रुपये प्रति महीने से कम की मासिक आमदनी पर जिंदा है. मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन भी इस रिपोर्ट का जिक्र कर चुके हैं. 
  • 2015 में राज्य सरकार की नौकरियों में मुस्लिमों की भागीदारी 5.47 फीसदी रही. 2010-11 में केंद्र सरकार की नौकरियों में मुस्लिमों की भागीदारी 10 फीसदी रही. बंगाल का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से भी कम है.

करीब दो महीनों में पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं. उम्मीद के मुताबिक ही सभी दलों की नजर 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं पर टिकी है जो 294 सीटों वाले विधानसभाओं में करीब 100 सीटों पर उम्मीदवारों को हराने और जिताने में अहम भूमिका रखते हैं.

हालांकि यह साफ लग रहा है कि मुस्लिम मतदाताओं ने ममता बनर्जी के पक्ष में अपनी सहमति दे दी है और इससे बनर्जी के एक बार फिर से जीतने का रास्ता साफ हो गया है. हालांकि स्नैप एसोसिएशन की तरफ से आरटीआई फाइल्स की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि ममता बनर्जी के पांच सालों के शासनकाल में मुस्लिम की भागीदारी में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है. 

बनर्जी के शासनकाल में सरकारी नौकरियों में मुस्लिम प्रतिनिधियों की भागीदारी में कोई बढ़ोतरी नहीं देखने को मिली है. स्नैप एसोसिएशन अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर काम करने वाली संस्था है.

आंकड़े बताते हैं कि ममता के शासनकाल में भी अल्पसंख्यकों की भागीदारी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है 

स्नैप की रिपोर्ट गाइडेंस गिल्ड और प्रतिची ट्रस्ट के साथ मिलकर तैयार की गई है. रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल में 80 फीसदी ग्रामीण मुसलमान 5,000 रुपये प्रति महीने से कम की मासिक आमदनी पर जिंदा है. मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन भी इस रिपोर्ट का जिक्र कर चुके हैं. उन्होंने कहा कि राज्य में गरीबों की आबादी में सबसे बड़ी हिस्सेदारी मुस्लिम समुदाय की है.

क्या बताती है आरटीआई?

  • 2015 में राज्य सरकार की नौकरियों में मुस्लिमों की भागीदारी 5.47 फीसदी रही. 2010-11 में केंद्र सरकार की नौकरियों में मुस्लिमों की भागीदारी 10 फीसदी रही. बंगाल का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से भी कम है.
  • रिपोर्ट को लिखने वाले सुबेर अहमद के मुताबिक, 'मुस्लिमों के पिछड़ेपन के कई कारण हैं. बंगाल के मुस्लिम अधिकांश तौर पर ग्रामीण इलाकों में रहते हैं जबकि स्किल ट्रेनिंग जैसी परियोजनाएं शहर आधारित हैं. ग्रामीण बंगाल में डिजिटल जागरूकता की कमी है और ओबीसी प्रमाणपत्रों का भी सही से वितरण नहीं किया जाता है.'
  • पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने रंगनाथ समिति की सिफारिशों को 2010 में ही स्वीकार किया था और उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में ओबीसी मुसलमानों को 10 फीसदी आरक्षण भी दिया था.
  • हालांकि स्नैप एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक केवल 19 लाख ओबीसी मुसलमानों को ही नौकरी मिली जबकि ओबीसी मुसलमानों की आबादी 2.3 करोड़ है.

शहर आधारित सरकारी नौकरी की स्थिति

  • 2007 में कोलकाता पुलिस में मुस्लिम की भागीदारी 9.1 थी जो अब बढ़कर 9.4 फीसदी हो चुकी है.
  • हालांकि पुलिस जैसी अहम नौकरी में मुसलमानों की भागीदारी बेहद कम है. मसलन सब इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अधिकारियों में मुस्लिमों की भागीदारी 7 फीसदी है. वहीं सार्जेंट रैंक की नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी महज 2 फीसदी है.
  • कोलकाता म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन में मुस्लिम की हिस्सेदारी 4.7 फीसदी है. 2007 में यह 4.4 फीसदी थी. यहां यह याद रखना जरूरी है कि 2010 में तृणमूल कोलकाता चुनाव जीती थी और वह एक बार फिर से 2015 में भी चुन कर आई.

सच्चाई से नहीं भाग सकते

  • उपर के सभी आंकड़ों से पता चलता है कि 2006 में सच्चर समिति की सिफारिशों के बाद मुस्लिमों की स्थिति में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ है. इसके अलावा ममता बनर्जी के शासनकाल में भी बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है.
  • सबसे अहम साल 2007 रहा जब मुस्लिम मतदाताओं ने आंख मूंदकर ममता बनर्जी के पक्ष में मतदान किया. यही वह साल था जब नंदीग्राम में पुलिस बलों के हाथों मुस्लिम मारे गए. रिजवानुर रहमना रहस्यमी तरीके से गायब हो गया और सच्चर समिति ने भी मुसलमानों की खराब स्थिति के बारे में रिपोर्ट सौंप दी.
  • 2011 के चुनावी घोषणापत्र में ममता ने मुस्लिमों के सशक्तिकरण के लिए एक्शन एजेंडा का वादा किया था और उन्होंने इसे सत्ता में आने के 200 दिनों के भीतर पूरा करने का वादा किया था.
  • हालांकि एक्शन प्लान को लेकर ममता बनर्जी को चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ा क्योंकि यह अल्पसंख्यकों का खतरनाक तरीके से तुष्टिकरण किए जाने जैसा था.

बंगाल के मुख्यमंत्री का दावा है कि उनहोंने जो पांच सालों में किया वह मुस्लिम सरकार 400 सालों में भी नहीं कर पाई है. लेकिन जमीनी हकीकत दूसरी है. ममता बनर्जी की सरकार हालांकि मुस्लिमों की हालिया स्थिति से जुड़े आंकड़ों से अनभिज्ञ हैं.

तृणमूल कांग्रेस के सदस्य सुल्तान अहमद ने आनंदबाजार पत्रिका को बताया, 'हमने रिपोर्ट नहीं देखी है. मैं संगठन को पत्र लिखकर सर्वे के तरीकों को फिर से जांचने के लिए कहूंगा. मैं अमर्त्य सेन को भी रिपोर्ट भेजूंगा जिसमें हम उन्हें राज्य के मुसलमानों की स्थिति के बारे में बताएंगे.'

मंगलवार को ममता ने दावा किया कि उनकी सरकार ने साढ़े चार सालों में 68 लाख युवाओं को नौकरी दी है. हालांकि यह बयान इस लिहाज से भी बेकार है क्योंकि इसमें उन्होंने नरेगा और आशा कार्यकर्ताओं की नौकरी को भी जोड़ दिया है. लेकिन स्नैप का आंकड़ा बुरी तस्वीकर पेश करता है. उनके मुताबिक राज्य में आबादी के लिहाज से मुसलमानों को प्रतिनिधित्व मिलने में करीब 60 सालों का समय लगेगा. 

First published: 19 February 2016, 8:13 IST
 
शौर्ज्य भौमिक @sourjyabhowmick

संवाददाता, कैच न्यूज़, डेटा माइनिंग से प्यार. हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियास्पेंड में काम कर चुके हैं.

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