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क्या था 30 जून को 30 साल का हुआ ऐतिहासिक मिजो समझौता?

सादिक़ नक़वी | Updated on: 2 July 2016, 8:15 IST
QUICK PILL
  • 30 जून 1986 को भारत सरकार और मिजो विद्रोहियों के बीच मिजोरम समझौता हुआ था. लालडेंगा विद्रोही मिजो नेशनल फ्र्रंट के नेता थे और पूर्व के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के आदेश पर जेल में बंद किया गया था.
  • बड़ौदा डायनामाइट केस में जॉर्ज फर्नांडीज का केस लड़ने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता स्वराज कौशल ने लालडेंगा का मुकदमा लड़ा और उन्हें बाहर निकालने में सफल रहे. 
  • कौशल ने हालांकि न केवल लालडेंगा को रिहा कराया बल्कि उन्होंने बाद में मिजो विद्रोहियों और सरकार के बीच होने वाले समझौते में भी अहम भूमिका निभाई. उनकी कोशिशों की वजह से 30 जून 1986 को मिजोरम समझौता हुआ.

आपातकाल के दौरान स्वराज कौशल ने बड़ौदा डायनामाइट केस में जार्ज फर्नांडीज का पक्ष रखा और वह मुकदमा जीतने में सफल भी रहें. बाद में फर्नांडीज देश के रक्षा मंत्री बने. लेकिन जब पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने 1979 में लालडेंगा मामले में उनसे संपर्क किया तो उनका रुख उत्साहित करने वाला नहीं था. लालडेंगा विद्रोही मिजो नेशनल फ्रंट के नेता थे और उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के आदेश पर जेल में रखा गया था.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं, 'मैं उस वक्त बहुत उत्साहित नहीं था क्योंकि मैं केवल ऐसे मुकदमें लड़ने का इच्छुक नहीं था.' उन्होंने कहा, 'कोई भी वकील लालडेंगा का केस लड़ने को तैयार नहीं था क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे.'

कौशल ने हालांकि न केवल लालडेंगा को रिहा कराया बल्कि उन्होंने बाद में मिजो विद्रोहियों और सरकार के बीच होने वाले समझौते में भी अहम भूमिका निभाई. उनकी कोशिशों की वजह से 30 जून 1986 को मिजोरम समझौता हुआ.

बाद में जब लालडेंगा की सरकार गिरी और उन्हें भूमिगत होना पड़ा तो सरकार और लालडेंगा के बीच विश्वास बहाली के लिए स्वराज कौशल को राज्यपाल बनाकर भेजा गया. सरकार के साथ समझौता वार्ता शुरू होने के बाद लालडेंगा को मासिक भत्ता मिलना शुरू हुआ. इस कारण उनकी गिरफ्तारी थम गई. 

इतना ही नहीं मोरारजी ने उन्हें चेतावनी दे रखी थी, 'आत्मसमर्पण करो या मैं तुम्हें जेल भेज दूंगा.' कौशल को लगता है कि यह सरकार की तरफ से धोखा था क्योंकि बातचीत विफल होने की स्थिति में मिजो नेता और उनके परिवार को सुरक्षित रास्ता दिया जाना चाहिए था.

मोरारजी ने लालडेंगा को चेतावनी दे रखी थी, 'आत्मसमर्पण करो या मैं तुम्हें जेल भेज दूंगा.'

लालडेंगा को दक्षिणी दिल्ली के गुलमोहर पार्क में रहने के लिए घर दिया गया था. लेकिन तुरंत ही उनकी सभी सुविधाएं हटा ली गईं. उनके पास बस एक जीप बची और जिसे वह मणिपुर से अपने साथ लाए थे. यही वह वक्त था तब उन्होंने कौशल से संपर्क किया. उन्होंने कौशल को बताया कि जिस वकील से उन्होंने संपर्क किया था वह गायब हो चुका है. लालडेंगा ने उनसे कुछ दिनों के लिए मदद मांगी.

बाद में शाम को लालडेंगा के बेटे और लालधुलथाना राल्टे मेरे घर पर आए. लालधुलथाना अभी फिलीपींस में भारत के राजदूत हैं. उन्होंने मुझसे मुकदमा लड़ने की गुहार लगाई. अगले दिन मैं पटियाला हाउस गयाा और वहां मेरी पहली बार लालडेंगा से मुलाकात हुई. मुझे तब मिजो विद्रोह के बारे में कुछ भी पता नहीं था.

कौशल बताते हैं, 'लेकिन मुझे उनकी बात में दम लगा और वह मुझे पसंद आए. अगले कुछ दिनों में वह वकील का इंतजाम नहीं कर सके और फिर मुझे जाना पड़ा. मुकदमा शुरू हुआ और फिर उन्हें जमानत मिली.'

भारत के खिलाफ षडयंत्र करने के मामले में वह अपनी जमानत की प्रक्रिया पूरी कर पाते, इससे पहले ही उन्हें विदेशी मुद्रा रखने के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया. यह रकम उन्हें भारत सरकार ने ही मुहैया कराई थी. हालांकि फिर भी मैं जमानत लेने में सफल रहा. आप अनुमान लगाइए कि उस वक्त किसने उनकी जमानत की गारंटी दी? लालथनहवाला, जो आज अभी मिजोरम के मुख्यमंत्री हैं. 'हालांकि बाद में दोनों एक दूसरे के दुश्मन हो गए.'

सुनवाई के दौरान कौशल के लालडेंगा के साथ बने रिश्तों से आगे बातचीत में मदद मिली और इससे आखिरकार मिजोरम में शांति लाने में मदद मिली.

30 जून को मिजोरम समझौते की 30वीं जयंती है. इस मौके पर कैच ने कौशल से बातचीत की प्रक्रिया को लेकर बातचीत की.

बातचीत कैसे शुरू हुई?

लालडेंगा पाकिस्तान में थे. वह भारत सरकार के साथ बातचीत शुरू करना चाहते थे. उन्होंने अपने दो सहयोगियों को पंजाब भेजा. इनमें से एक जोरामथांगा थे जो बाद में मिजोरम के मुख्यमंत्री बने. पाकिस्तान मिजो और भारत के बीच बातचीत का इच्छुक नहीं था. 

पूरी रात चलने के बाद लालडेंगा के दोना भरोसेमंद सहयोगी सुबह पंजाब पहुंचे. उन्हें लगा कि वह भारत में पहुंच गए हैं, इसलिए उन्होंने नमस्ते बोला. लेकिन किसानों ने बदले में उन्हें अस्सलामलैकुम बोलकर उनका स्वागत किया. 

वह अभी भी पाकिस्तान में ही थे और जल्द ही उन्हें सैनिकों ने पकड़ लिया. लालडेंगा ने काबुल में भारतीय दूतावास से संपर्क किया और फिर काबुल के जरिये बातचीत शुरू हुई.

रॉ ने उन्हें पाकिस्तानी पासपोर्ट दिया और फिर वह बॉन, पेरिस और अन्य जगहों पर बातचीत के लिए आए. आखिरकार वह जनवरी 1976 में भारत आए. लालडेंगा को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया.

मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं और बातचीत शुरू होती इससे पहले ही संजय गांधी मारे गए. लालडेंगा औैर उनकी पत्नी इस शवयात्रा में गए और इंदिरा ने उन्हें कहा, 'हमें मिजो समस्या के बारे में कुछ करना होगा.' 1982 में बातचीत टूट गई. सरकार ने लालडेंगा को पासपोर्ट दिया जो एक साल के लिए वैध था. लालडेंगा ने मुझसे पूछा कि उन्हें कहां जाना चाहिए? मैंने डायरेक्टरी देखी और लंदन का नाम लिया. 

बाद में मैंने बीबीसी से बातचीत की और ब्रिटेन को पता लग गया कि वह आ रहे हैं. ब्रिटेन ने उन्हें राजनीतिक आश्रय दिया. जार्ज फर्नांडीज ही एकमात्र वैसे व्यक्ति थे जिन्होंने लंदन में संपर्क खोजनेे में मदद की. 1984 में बातचीत फिर शुरू हुई और 1986 में समझौते पर हस्ताक्षर हो गया.

उस वक्त आर डी प्रधान गृह सचिव हुआ करते थे. बाद में उन्होंने लिखा कि 30 जून को इस समझौते पर हस्ताक्षर किया गया क्योंकि उसी दिन वह रिटायर हो रहे थे. क्या यह सही है?

बिलकुल गलत. आखिरी समय तक लालडेंगा प्रधान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करना नहीं चाहते थे. वह राजीव गांधी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहते थे जो पहले असम और पंजाब समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके थे. मैं उन्हें बताया, 'आपके लिए बेहतर होगा कि आप गृह सचिव के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करो क्योंंकि यह वास्तविक पद है.' उस दिन समझौते पर इसलिए हस्ताक्षर किया गया क्योंकि इसी दिन इस पर बात बनी. इसलिए नहीं कि उस दिन प्रधान रिटायर हो रहे थे.

बातचीत के प्रति राजीव गांधी का क्या रवैया था?

राजीव गांधी ने मदद की. समझौते में दो-तीन प्रावधान ऐसे थे जिसके बारे में प्रधान का दावा था कि उन्होंने इसे सुलझाया है. यह गलत है.

सरकार समझौते में समान नागरिक संहिता चाहती थी क्योंकि  उस वक्त शाहबानो मामला गरम था. लेकिन आप कैसे इसे मिजो पर लागू कर सकते थे जिनका अपना निजी कानून है. राजीव गांधी के साथ यह समझ थी कि कुछ प्रावधानों को प्रधानमंत्री के स्तर पर सुलझा लिया जाएगा. राजीव गांधी ने उन प्रावधानों को रद्द कर दिया.

पहले मुख्यमंत्री के तौर पर लालडेंगा का कार्यकाल कैसा रहा?

वह समझौते के तुरंत बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते थे लेकिन उन्होंने 22 अगस्त तक इंतजार करना उचित समझा क्योंकि वह भारतीय झंडे को सलाम करना चाहते थे. 1988 में केंद्र सरकार ने उनकी पार्टी को तोड़ दिया और फिर उनकी सरकार गिर गई.

आपको समझौते के तीस साल बाद मिजोरम कैसा लगता है?

जब हम समझौते को तैयार कर रहे थे तब हमें पता नहीं था कि हम मॉडल बनाने जा रहे हैं. हमें लग रहा था कि हम बस एक समस्या को सुलझा रहे हैं जिसमें करीब 3,000 से अधिक लोगों की जान गई थी. इसे तैयार करने में सात साल लग गए. 

हमें नहीं पता था कि आगे चलकर यह देश के लिए मिसाल बन जाएगा. यह समझौता तब लागू हुआ जब श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बीच बातचीत चल रही थी.

क्या आपको लगता है कि मौजूदा पीढ़ी समझौते से खुश है?

मैं नहीं जानता क्योंकि मेरा कार्यकाल खत्म होने के बाद मैं वहां गया नहीं. लेकिन मुझे लगता है कि पूर्वोत्तर में विद्रोह लंबे समय तक जारी रहेगा. वैश्वीकरण की वजह से बड़ी संख्या में  लोगों का पलायन हुआ है. मैं दिल्ली, मुंबई और चंडीगढ़ जैसे शहरों में मिजो लोगों से मिलता हूं.

वैश्वीकरण ने किस तरह से स्थितियों को बदला है?

इसने बड़ा बदलाव किया है. विद्रोह अब लालडेंगा या फिजो के समय की तरह  कभी नहीं होगा. लोगों को अब लोकतंत्र में रहने का मतलब पता है. आप विद्रोह शुरू कर सकते हैं लेकिन यह चल नहीं पाएगा. अब चीन समर्थन नहीं देता. पाकिस्तान समर्थन दे नहीं सकता. पहले गांवों की गोलबंदी बड़ी ताकत हुआ करते थे लेकिन अब वैश्वीकरण की वजह से शहरों में विस्थापन हो रहा है.

First published: 2 July 2016, 8:15 IST
 
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