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एमएम कल्बुर्गी पुण्यतिथि: एक साल बाद उनकी हत्या को हम कैसे देखते हैं?

प्रो. चमन लाल | Updated on: 30 August 2016, 7:55 IST

ठीक एक साल पहले 30 अगस्त 2015 की सुबह करीब 8.30 बजे प्रोफेसर कल्बुर्गी कर्नाटक के धारवाड़ नगर के अपने घर में नाश्ते के लिए परिवार के साथ बैठे थे, तभी दरवाजे की घंटी बजी, जो उनकी पत्नी ने सुनकर, दरवाजा खोला. दो युवक यह कह कर घर में दाखिल हुए कि वे प्रोफेसर कल्बुर्गी के छात्र रहे हैं और उनसे बात करने आए हैं.

श्रीमति कल्बुर्गी ने उनका स्वागत किया और उनके लिए चाय-काफी बनाने रसोई में गयी. तभी अचानक उन युवकों ने प्रोफेसर कल्बुर्गी के माथे और छाती पर पिस्तौल से सीधे दो गोलियां दाग दी और पहले से चालू रखे मोटरसाइकल पर भाग गए. अस्पताल पहुंचने से पहले ही प्रोफेसर कल्बुर्गी चल बसे थे. प्रोफेसर कल्बुर्गी जो 1998 से 2001 तक कन्नड़ विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे, रिटायर होने उपरांत धारवाड़ में बस गए थे.

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प्रोफेसर कल्बुर्गी जैसे विद्वान की इस तरह से हत्या क्यों की गयी? ये हत्या भी उस कड़ी का अंग थी, जिसके चलते ठीक इससे दो साल पहले 20 अगस्त 2013 को पुणे में 68 वर्षीय तर्कवादी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और इससे करीब छह महीने पहले 20 फरवरी 2013 को कोल्हापुर में 82 वर्षीय कामरेड गोविंद पनसारे की हत्या की गयी थी.

प्रोफेसर कल्बुर्गी की शहादत के एक साल पूरा होने के अवसर पर धारवाड़ में 30 अगस्त 2016 को देश भर से पुरस्कार वापिस करने वाले व दूसरे लेखक/कलाकार तथा कर्नाटक के सैकड़ों कार्यकर्ता उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्र हो रहे हैं. कल्बुर्गी, दाभोलकर और पनसारे- तीनों परिवार भी इस मौके पर साथ रहेंगे, जिन्हें अभी तक इंसाफ नहीं मिला है.

इस अवसर पर प्रोफेसर कल्बुर्गी के शानदार व्यक्तित्व पर एक नज़र डालना वाजिब होगा:

मालेशप्पा मदिवलप्पा कल्बुर्गी का जन्म 28 नवंबर, 1938 को कर्नाटक के मौजूदा बीजापुर ज़िले के तालुका सिंगड़ी के यारागल गांव में हुआ, जो धारवाड़ से बहुत दूर नहीं है. उनके माता-पिता किसान थे, जिन्होंने कल्बुर्गी को बीजापुर से प्रारम्भिक और उच्च शिक्षा दिलाई. बाद में कर्नाटक विश्वविद्यालय धारवाड़ से उन्होंने कन्नड़ भाषा में स्वर्ण पदक के साथ एमए की परीक्षा पास की, जिसके बाद उन्हें इसी विश्वविद्यालय के कन्नड़ विभाग में व्याख्याता की नौकरी मिल गयी. इसी विभाग में वे 1982 तक प्रोफेसर व अध्यक्ष बन गए, साथ ही वे बस्वेश्वरा पीठ के अध्यक्ष भी बन गए. उन्होंने पीएचडी की उपाधि भी कन्नड़ साहित्य में प्राप्त कर ली थी.

कल्बुर्गी वचन साहित्य के मर्मज्ञ थे और वे वचन साहित्य के बड़े संकलन के संपादन के साथ भी जुड़े थे

प्रोफेसर कल्बुर्गी कर्नाटक सरकार द्वारा प्रकाशित- ‘समग्र वचन संपुट’ के संपादक थे और बेंद्रे स्मारक राष्ट्रीय न्यास के अध्यक्ष तथा साहित्य अकादमी के कन्नड़ सलाहकार बोर्ड के सदस्य भी. कल्बुर्गी वचन साहित्य के मर्मज्ञ थे और वे वचन साहित्य के बड़े संकलन के संपादन के साथ-साथ उसके 22 भाषाओं में अनुवाद की योजना से भी जुड़े थे. उनके द्वारा लिखित और संकलित 103 पुस्तकें और 600 से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं.

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प्रोफेसर कल्बुर्गी को 2006 में राष्ट्रीय साहित्य अकादमी के पुरस्कार उनके शोध संकलन मार्ग-4 के लिए प्राप्त हुया था. उन्हें प्राप्त अन्य पुरस्कारों में कर्नाटक राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार, जनपद पुरस्कार, यक्ष गंगा पुरस्कार व वचन साहित्य श्री, पंपा व बसवा पुरस्कार शामिल हैं.

प्रोफेसर कल्बुर्गी शुरू से ही गंभीर और आलोचनात्मक दृष्टि वाले शोधार्थी रहे हैं और कन्नड़ के प्राचीन और मध्य कालीन साहित्यिक रचनाओं के तार्किक विश्लेषण के कारण उन्होंने बहुत से दुश्मन बना डाले, जो उन्हीं के लिंगायत समुदाय के अनुदार लोग थे.

1989 में बसवा के कुछ पदों की उनकी व्याख्या पर उन्हें जो धमकियां मिली, इससे उन्हें सुरक्षा लेनी पड़ी और सुरक्षा में वे विश्वविद्यालय में पढ़ाने जाते थे. बाद में उन्होंने अपने निंदकों से समझौता कर लिया और अपने विश्लेषण से आपत्तिजनक हिस्से हटा कर सुरक्षा वापिस कर दी.

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लेकिन उन्होंने बाद में कहा कि, ‘परिवार की सुरक्षा’ के कारण ऐसा किया और यह ‘बौद्धिक आत्महत्या के समान’ था‘! 2015 में तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन को भी ऐसी परिस्थितियों में ‘लेखक की आत्महत्या’ करनी पड़ी थी.

उन्होंने बताया कि पुलिस सुरक्षा ‘परिवार की सुरक्षा’ के कारण लेना पड़ा था और यह ‘बौद्धिक आत्महत्या के समान’ था

बाद में कन्नड़ विश्वविद्यालय के कुलपति रूप में उन्होंने कई शोध योजनाएं शुरू कीं, जिनमें कैफ़ियतें, आदिल शाही साहित्य, कम जाने जाते शाही परिवारों के साहित्य पर शोध शामिल थे. 1वीं सदी के ‘शरण’ साहित्य को भी उन्होंने शोध के दायरे में रखा. पाण्डुलिपियों पर शोध के लिए वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैंब्रिज विश्वविद्यालय और लंदन भी गए.

प्रोफेसर कल्बुर्गी साहित्यक कृतियों संबंधी अपने तार्किक दृष्टिकोण को दबा कर नहीं रख सकते थे, इसलिए 2014 में जब प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति को विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और श्रीराम सेना आदि हिंदुत्ववादिओं ने निशाना बनाया तो वे उनके समर्थन में खुल कर सामने आए. जैसे महाराष्ट्र में डॉ. दाभोलकर ने अंधविश्वास विरोधी बिल के लिए आंदोलन किया, कल्बुर्गी ने कर्नाटक के लिए वैसे ही बिल का समर्थन किया.

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इन घटनाओं के बाद धमकियों के कारण जो सुरक्षा उन्हें प्रदान की गयी थी, वह 2015 के शुरू में हटा ली गयी थी, डॉ. कल्बुर्गी की हत्या के बाद अन्य कन्नड़ लेखकों केएस भगवान और कन्नड़ विश्वविद्यालय की मौजूदा कुलपति डॉ मल्लिका घेंट को भी धमकियां दी गईं, जिन्हें अपनी सुरक्षा के लिए प्राथमिकी दर्ज करवानी पड़ी.

कर्नाटक के विख्यात इतिहासकार व भारतीय इतिहास परिषद के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एस सेत्तार, जिन्होंने डॉ. कल्बुर्गी के साथ एक साझा शोध पत्र भी लिखा था, ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए ईपीडब्ल्यू जर्नल में लिखा:

‘पिछले 150 साल में कन्नड़ में किसी भी लेखक ने इतने विविध विषयों पर इतनी मात्रा में शोधपरक लेखन नही किया जितना डॉ. कल्बुर्गी ने. उनका ज्ञान विश्वकोषीय था और उन्हें सूक्ष्म शोध में कुशलता हासिल थी.‘

प्रोफेसर कल्बुर्गी की हत्या ने देश के लेखकों/कलाकारों/विद्वानों को स्तंभित कर दिया और उनमें दाभोलकर, पनसारे के बाद कल्बुर्गी की लगातार हत्या से दबा हुआ आक्रोश स्वाभाविक रूप से पुरस्कारों की वापसी के रूप में फट पड़ा.

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शुरुआत हिन्दी लेखक उदय प्रकाश ने इस घिनौने कत्ल के तुरत बाद चार सितंबर को साहित्य अकादमी के अध्यक्ष को लिखे पत्र से की, जिसमें उन्होंने डॉ. कल्बुर्गी की सम्मान में साहित्य अकादमी में स्मृति सभा करने की मांग की. साहित्य अकादमी द्वारा पत्र को लेकर चुप्पी धर लेने से उदय प्रकाश ने 2010 में उन्हें मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटने की घोषणा कर दी.

हिंदी साहित्यकार उदय प्रकाश ने सबसे पहले अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटने की घोषणा कर दी

साहित्य अकादमी और संबंधित सरकारों ने फिर भी चुप्पी बनाए रखी तो अक्टूबर के शुरू में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की भांजी 88 वर्षीय नयनतारा सहगल द्वारा 1986 के अंग्रेजी भाषा में मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटा दिया.

इसके बाद तो पुरस्कार लौटने वालों की कतार लग गयी. करीब 40 लेखकों ने यदि साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया तो 100 के करीब लेखकों, वैज्ञानिकों, फिल्मकारों, अन्य कलाकारों, विद्वानों द्वारा अनेक अन्य पुरस्कार लौटा दिये गए.

साहित्य अकादमी पुरस्कार करीब दस हिन्दी लेखकों ने लौटाए तो इतनी ही संख्या में पंजाबी लेखकों ने ये पुरस्कार लौटाए. कन्नड़ भाषा के कम से कम चार लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए तो अनेक अन्यों ने राज्य पुरस्कार लौटाए. प्रसिद्ध वैज्ञानिक 88 वर्षीय पुष्प भार्गव ने सबसे बड़ा पद्मभूषण सम्मान लौटाया तो पंजाबी लेखिका दलीप कौर टिवाना और इतिहासकार शेखर पाठक ने अपने पद्मश्री लौटा दिये.

फिल्मकारों में अरुंधति रॉय, आनंद पटवर्धन, सईद मिर्ज़ा, कुन्दन शाह आदि ने पुरस्कार लौटाए. हिन्दी में 90 वर्षीय वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती ने न सिर्फ साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया बल्कि उन्होंने अकादमी का सर्वोच्च सम्मान महत्तर फेलोशिप भी छोड़ दी.

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अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, चमन लाल, काशीनाथ सिंह साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटने वाले हिन्दी लेखकों में शामिल हैं तो पंजाबी लेखकों में गुरबचन भुल्लर, सुरजीत पात्र, वरयाम संधू आदि शामिल रहे. गणेश देवी, रहमान अब्बास, प्रज्ञा दया पवार व अन्य अनेक लेखकों ने अकादमी और अन्य पुरस्कार लौटाए.

प्रतिकार में दुखद ये था कि सरकार और उसके संघ आदि हिन्दुत्व समर्थकों ने लेखकों के इस शांतिपूर्ण व गरिमामय विरोध के प्रति सरोकार तो क्या दिखाना था, उनका मज़ाक उड़ाया गया, धमकियां और गालियां दी गईं.

एक साल में हालात सुधरने तो दूर की बात, और ज्यादा बिगड़े हैं. असहिष्णुता इतनी बढ़ी है कि दलितों और अल्प संख्यकों पर अत्याचार पहले से ज्यादा हो रहे हैं. हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रतिभावान दलित छात्र रोहित वेमुला को आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ा.

जेएनयू के निर्वाचित छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार व अन्य छात्रों को को जेल भेजा गया, ऐसी स्थिति में लेखकों व समाज के अन्य प्रबुद्ध वर्गों को क्या करना चाहिए? इसी पर चिंतन मनन के लिए तथा उन्हें श्रद्धांजली देने के लिए 30 अगस्त 2016 को धारवाड़ में प्रोफेसर कल्बुर्गी को उनकी शहादत के एक साल पूरा होने के अवसर पर देश भर से लेखक एकत्र होंगे. शांतिपूर्ण मौन जुलूस भी निकाला जाएगा.

First published: 30 August 2016, 7:55 IST
 
प्रो. चमन लाल @catchnews

चमन लाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवा-मुक्त प्रोफेसर हैं. प्रोफेसर कल्बुर्गी की हत्या के विरोध में उन्होंने साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार लौटाया और जेएनयू पर हमले के विरोध में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पुरस्कार

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