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क्या गांवों के रास्ते तलाश रहे हैं मोदी 2019 की मंजिल?

स्कंद विवेक धर | Updated on: 30 August 2016, 7:41 IST
QUICK PILL
  • प्रधानमंत्री मोदी ने कभी मनरेगा को कांग्रेस की असफलता का स्मारक बताया था, मौजूदा बजट में इस योजना को रिकॉर्ड बजट का आवंटन किया है.
  • 2016-17 के बजट में कृषि आवंटन 44% बढ़ाकर 24,909 करोड़ से 35,984 करोड़ कर दिया गया है. प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और उज्ज्वला जैसी योजनाएं पूरी तरह से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए हैं.
  • प्रधानमंत्री ग्राम सड़क और प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना की डेडलाइन 2022 से घटाकर 2019 कर दी गई है.

भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की शनिवार को हुई बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मुख्यमंत्रियों को गरीबों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं को मिशन मोड में लागू करने का निर्देश दिया है. इसी साल अप्रैल महीने में मोदी सरकार ने पूरे देश में ग्रामोदय से भारत उदय अभियान चलाया था. इस साल के बजट में कृषि क्षेत्र का आवंटन लगभग दोगुना कर दिया गया.

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ऐसे में राजनीतिक पंडितों ने कयास लगाने शुरू कर दिए हैं कि क्या देश के मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं के भरोसे प्रधानमंत्री की कुर्सी हासिल करने वाले नरेंद्र मोदी का फोकस बदल गया है? क्या वे मिशन-2019 के लिए गांवों से रास्ता ढूंढ़ रहे हैं? क्या मोदी 2019 में वही करिश्मा दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, जो 2009 में यूपीए ने मनरेगा के जरिए किया था?

राजनीतिक रिपोर्टिंग का लंबा तजुर्बा रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, "आप मोदी सरकार के शुरुआती दौर को देखिए. इस सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून को संशोधित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था. यहां तक कि एक साल तक अध्यादेशों के जरिए इसे लागू भी किया गया. तब सरकार ने किसानों के गुस्से की परवाह नहीं की थी."

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वे आगे कहते हैं, "सरकार के रवैये में बदलाव वर्ष 2015 की दूसरी छमाही में नजर आना शुरू हुआ है, जब पहली बार सरकार भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून पर पीछे हट गई. 2016 आते-आते मेक इन इंडिया और स्मार्ट सिटी जैसी योजनाएं पीछे छूट गईं, गांवों आैर किसानों से जुड़ी योजनाएं इन पर हावी हो गईं."

गांव को समर्पित योजनाएं

पिछले एक-डेढ़ साल में मोदी सरकार की नीतियों, निर्णयों और अभियानों को सूचीबद्घ करें तो उपरोक्त विश्लेषण काफी हद तक सही लगता है. भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून से पीछे हटने के बाद मोदी सरकार ने जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, जनवरी 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, अप्रैल 2016 में इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नैम) और मई 2016 में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पेश की. यह आम दारणा है कि ये सभी योजनाएं पीएमओ में प्रधानमंत्री की निगरानी में बनी हैं.

इतना ही नहीं, वित्त वर्ष 2016-17 के आम बजट में कृषि आवंटन 44 फीसदी बढ़ाकर 24,909 करोड़ से 35,984 करोड़ रुपए कर दिया गया. मनरेगा के लिए भी रिकॉर्ड 38,500 करोड़ का बजट आवंटित हुआ.

बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के लिए नाबार्ड के माध्यम से 20 हजार करोड़ रुपए का कोष बनाने की घोषणा की गई. उल्लेखनीय है कि कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनरेगा को कांग्रेस की विफलताओं का स्मारक बताया था.

मोदी सरकार ने अप्रैल 2016 में ही पूरे देश में ग्रामोदय से भारत उदय का अभियान चलाया. ऐसी भी खबरें हैं कि ग्रामीण विकास मंत्रालय को 65 हजार गांवों को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क से जोड़ने और प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत एक करोड़ मकान बनाने के लिए दी गई 2022 तक की समयसीमा को घटाकर 2019 तक कर दिया गया है.

राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, "भाजपा के बारे में यह आम धारणा रही है कि वह अमीरों की पार्टी है. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी की उद्योगपतियों से नजदीकियों पर चर्चा होती रहती थी. लेकिन अब मोदी हर बार गरीबों और किसानों की बात करते हैं, ये बड़ा बदलाव है."

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, "सरकार की कोशिश है कि 2018 के अंत तक हर किसान या मजदूर के परिवार को कम से कम किसी एक केंद्रीय योजना का लाभ पहुंच जाए. सरकार का मानना है कि अगर वह इसमें सफल हो गई तो उसके पास अगले चुनाव में बड़ा वोट आधार तैयार हो जाएगा."

शहरी मध्यवर्ग की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा होती है और उसे पूरी तरह संतुष्ट कर पाना बहुत मुश्किल है

इन्हीं अधिकारी के मुताबिक, "शहरी मध्यमवर्ग की उम्मीदें सरकारों से बहुत ज्यादा होती हैं और वह तेजी से बदलाव चाहता है. ऐसे में संभव नहीं है कि सरकार उन सभी आकांक्षाओं को पूरा कर सके. वहीं ग्रामीण की महत्वाकांक्षा कम होती है. सरकार की वजह से अगर उनके जीवन में मामूली सुधार भी आ जाए तो वे उससे अभिभूत रहता है. यही कारण है कि सरकार किसानों और मजदूरों पर अधिक ध्यान दे रही है."

भारतीय जनसंचार संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर आनंद प्रधान कहते हैं, "पिछले दो साल से सूखे के चलते किसानों और भूमिहीन मजदूरों की हालत और भी खराब हो गई थी. गुस्सा बढ़ रहा था. ये गुस्सा किसी भी सरकार को महंगा पड़ सकता है."

प्रोफेसर प्रधान आगे कहते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है कि ग्रामीण भारत अभी भी भारतीय राजनीति की कुंजी है. ऐसे में दिल्ली के सिंहासन के लिए गांवों का दिल जीतना अपरिहार्य है. मोदी सरकार यही कोशिश कर रही है." प्रोफेसर प्रधान याद दिलाते हैं कि ऐसे ही ग्रामीण असंतोष के चलते 2004 में एनडीए सरकार को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी.

नीरजा चौधरी भी प्रोफेसर प्रधान से इत्तेफाक रखते हुए कहती हैं, "यह एक कड़वा सच है कि आर्थिक सुधारों का फायदा गरीबों और किसानों तक तक नहीं पहुंचा. एक सच ये भी है कि निर्णायक वोट इन्हीं गरीबों-किसानों के पास है. आर्थिक सुधारों का जो लाभ अमीरों, कारोबारियों और उद्योगपतियों को मिला उसी काे संतुलित करने के लिए यूपीए ने किसानों की कर्ज माफी, मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, एनअारएचएम, खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाएं बनाई थीं. इसका उन्हें फायदा भी मिला. नरेंद्र मोदी द्वारा लाई गई योजनाएं भी उसी संतुलन को बनाए रखने का का प्रयास है."

यूपीए और एनडीए की जनहितकारी योजनाओं में क्या अंतर है?

यूपीए और एनडीए दोनों ने ग्रामीण भारत के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाईं, लेकिन क्या दोनों में कुछ फर्क है? ग्रामीण विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी दोनों सरकारों के अप्रोच में फर्क बताते हैं. उनके मुताबिक, यूपीए सरकार की अधिकतर योजनाएं चाहे वह मनरेगा हो, शिक्षा का अधिकार या कर्ज माफी ये सीधे लोगों को लाभ पहुंचाने की वाली योजनाएं थीं. इनमें एसेट निर्माण जैसा कॉन्सेप्ट नहीं था.

वहीं, मोदी सरकार अधिकतर योजनाएं जैसे कि फसल बीमा योजना और कृषि सिंचाई योजना आदि अधोसंरचना पर आधारित हैं. वे आगे कहते हैं, 'सीधा लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं ज्यादा लोकलुभावन होती हैं लेकिन इनमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी ज्यादा रहती है. मनरेगा के मामले में ऐसा कई बार देखने को मिला.'

कुछ लोग दोनों सरकारों के नजरिए में फर्क को एक अलग तरीके से भी देख रहे हैं. मसलन यूपीए-एक सरकार के समय में जो जनहित योजनाएं लागू हुई उनसे सीधे आम आदमी को लाभ मिला. इसकी एक बड़ी वजह यूपीए-एक की सरकार में वामपंथी पार्टियों का शामिल होना भी था. जबकि मौजूदा सरकार की योजनाएं अप्रत्यक्ष लाभ पर आधारित हैं. मौजूदा सरकार की सोच संस्थागत तरीके से ग्रामीणों को लाभ पहुंचाने की है जिसे बाजार और अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिले.

नीरजा चौधरी के मुताबिक, यूपीए को महंगाई और भ्रष्टाचार मार गई. एनडीए को महंगाई और जनता की अतिशय अपेक्षा ऐसा ही नुकसान पहुंचा सकती है.

बहरहाल, एक बात साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों और गांवों तक अपनी विकास की इबारत पहुंचाना चाहते हैं. देखना होगा कि वे इसमें कितना सफल होंगे. राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेश पंत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो टूक शब्दों में चेताते हैं कि उनका विकास का मुद्दा कहीं उनके ही मंत्रियों और सहयोगियों के विवादों के बीच गुम होकर न रह जाए.

First published: 30 August 2016, 7:41 IST
 
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