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मोदी-आबे की गंगा आरती और फिर ठगा गया बनारस

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की बनारस में गंगा आरती के चलते लोगों-व्यापारियों को उठानी पड़ी परेशानी.
  • जापान की बौद्ध विरासत को देखते हुए, क्यों मोदी आबे को सारनाथ नहीं ले गए? बनारस के रंग-रोगन के अलावा शहर को नहीं मिला कोई लाभ.

शनिवार शाम को बनारस के दशाश्वमेध घाट पर नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे को गंगा आरती करनी थी. इसके लिए घाट को ऐसे सजाया गया कि मानो किसी फिल्म का शूटिंग सेट बनाया गया हो. 

इससे पहले बनारस ने शायद इस तरह का आयोजन पहले कभी नहीं देखा था. इसमें दो देशों के प्रधानमंत्रियों के साथ राज्यपाल राम नाइक और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत तमाम प्रशासनिक अमला मौजूद था. इन सभी हस्तियों के चलते खूबसूरत स्वच्छ घाट पर सामान्यत: सात की जगह नौ पुजारियों और 35 पारंपरिक साजसज्जा वाली महिलाओं ने धार्मिक रस्में निभाईं. पूरा घाट फूलों से ही लदा नजर आ रहा था.

माथे पर त्रिपुंड तिलक लगाए शिंजों ने अपने मोबाइल से आरती की फोटो लीं और उन्हें मोदी के साथ शेयर किया. फूलों और पीतल की घंटी से सजाए गए मंडप में बैेठे मोदी-आबे ने पवित्र गंगा और शहर के बारे में चर्चा की. 

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हालांकि इस तरह के अभूतपूर्व आयोजन को संभव बनाने के लिए बनारस की आम जनता को तमाम कठिनाईयों का सामना करना पड़ा. मोदी और आबे की यात्रा की तैयारियों के चलते शहर का आम जनजीवन पिछले तीन दिनों से अस्त व्यस्त हो गया था.  

थम सा गया शहर

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एएफपी/प्रकाश सिंह

जिन रास्तों से दोनों प्रधानमंत्रियों को आना-जाना था उनकी मरम्मत कर उन्हें चमकाया गया. जबकि पुलिस और सुरक्षा बल मुस्तैदी दिखाते हुए नियमित गश्त के साथ संदिग्ध लोगों की तलाशी लेते दिखे. 

दुकानदारों का धंधा चौपट हुआ जबकि सड़क किनारे ठेले लगाने वालों को पूरी तरह हटा दिया गया. हजारों नहीं तो सैकड़ों लोग जो वर्षों से फल-फूल-मिठाई-सब्जी बेचकर अपना जीवन यापन कर रहे थे, उन्हें प्रधानमंत्री के रास्ते में पड़ने के करण वहां से हटने को मजबूर कर दिया गया.

कर्फ्यू की तरह का माहौल था. यहां तक ​​कि बंदरों को भी इधर-उधर घूमने की अनुमति नहीं थी

विश्वनाथ मंदिर के पास रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि, "कर्फ्यू की तरह का माहौल था. हमारा धंधे बुरी तरह प्रभावित हुआ. लगने लगा कि यह छावनी का इलाका है." इसके बाद मज़ाक में कहा, "यहां तक ​​कि बंदरों को भी इधर-उधर घूमने की अनुमति नहीं थी."

लेकिन आरती का आयोजन करने के लिए सरकार क्यों इतनी दूरी तक जाती है? इसके पीछे कई व्यक्तिगत, राजनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं.

वास्तव में मोदी खुद को एक ऐसे पारंपरिक भारतीय के रूप में प्रदर्शित करते आए हैं. जो भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा में विश्वास करता है और वह उसका उत्तराधिकारी भी दिखना चाहते हैं. भारी तादाद में अपने समर्थकों के साथ उन्होंने यही सब प्रदर्शित किया. 

जब पिछले साल मोदी जापान यात्रा पर गए थे तो आबे उन्हें टोजी और किंकाकु-जी जैसे प्राचीन बौद्ध मंदिरों की यात्रा पर ले गए थे. आठवीं सदी के इन मंदिरों का जापान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कल्पना में एक विशेष स्थान है. आबे को दुनिया के सबसे पुराने जीवित शहर बनारस ले जाना, मोदी के राजनयिक शिष्टाचार प्रदर्शन का एक तरीका था.

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एएफपी/प्रकाश सिंह

यह यात्रा घरेलू दर्शकों के लिए भी एक संदेश के रूप में थी. जब 2014 में मोदी वाराणसी में चुनाव प्रचार कर रहे थे, तो उन्होंने बनारस को जापान के क्योटो (दुनिया के सबसे विकसित शहरों में से एक) के मानकों पर विकसित करने का वादा किया था.

हालांकि मोदी की जीत के बाद शहर ने वो "विकास" नहीं देखा. इसलिए जापानी प्रधानमंत्री को लाकर वह अपने लोकसभा क्षेत्र के लोगों को यह आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे थे कि वह अपना वादा नहीं भूले हैं. शायद वो कहना चाह रहे थे कि देखो मैं वो व्यक्ति लेकर आया हूं जो हमें बुलेट ट्रेन देगा. धैर्य रखिए, इस देश के और इस शहर के अच्छे दिन जल्द आएंगे. 

सही पकड़े हैं "संदेश"

दूसरा संदेश हिंदुत्व ब्रिगेड के लिए था. और वो संदेश जहां मोदी आबे को ले गए उससे ज्यादा महत्वपूर्ण इस बात में था कि जहां वो नहीं गए. 

जापान में मोदी की बौद्ध मंदिरों यात्रा को देखते हुए जब बनारस यात्रा की योजना पर चर्चा हुई, तो अधिकांश लोगों को उम्मीद थी कि मोदी और आबे बनारस स्थित सारनाथ भी देखने जाएंगे जहां दुनिया का सबसे पुराना बौद्ध स्तूप है.  

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एएफपी/प्रकाश सिंह

ज्ञान प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में ही दिया था. मौर्य काल के दौरान और उसके बाद भी यह कला, संस्कृति और शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र बना रहा.

संयोग से सारनाथ में एक प्रसिद्ध जापानी मंदिर के साथ ही एक तिब्बती विश्वविद्यालय भी है जो दुनिया में बौद्ध अध्ययन के महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक है. 

लेकिन मोदी, आबे को सारनाथ नहीं ले गए. इसके बजाय उन्होंने दशाश्वमेध घाट आरती को चुना. हालांकि यह एक बहुत पुरानी परंपरा नहीं है. यह 1991 में शुरू हुई थी. लेकिन आखिरी में गंगा आरती का यह आयोजन बेहतरीन और सफल साबित हुआ. 2014 में साबरमती नदी पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के दौरे को पीछे छोड़ते हुए इस आयोजन ने काफी प्रसिद्धि बंटोरी. 

हालांकि साफ सुथरी सड़कों और सजे-संवरे घाटों से शहर के रूप-रंग में थोड़े बदलाव के अलावा इस आयोजन से बनारस को कुछ खास नहीं मिला. एक बार फिर से बनारस खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है.

First published: 15 December 2015, 8:18 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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