Home » इंडिया » Modi at 2: How the opposition scored as well as it missed
 

दो साल भगवाराज: विपक्ष एक कदम आगे, दो कदम पीछे

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
QUICK PILL
  • अभी तक एनडीए की सरकार मुद्दों को लेकर ध्रुवीकरण करने में आगे रही है. इसकी शुरुआत 2014 में घर वापसी और लव जेहाद से हुई.
  • संघ को ध्रुवीकरण की राजनीति से अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिली. वहीं विपक्ष को भी इन मुद्दों के कारण सरकार को घेरने का मौका मिला.
  • हालांकि विपक्ष की मिली बढ़त पांच राज्यों के विधानसभा चुनावी नतीजों के बाद धाराशायी होती दिख रही है. कांग्रेस की कोशिश इस बीच अपने को राष्ट्रीय दल के तौर पर बनाए रखने की है.
  • दो साल पहले बीजेपी संख्या के आधार पर विपक्ष की ताकत और उसके आत्मबल को मटियामेट कर सत्ता में आई थी. पार्टी को 282 सीटें मिली थी जो 25 विपक्षी दलों के खाते में आई सीटों के मुकाबले दोगुनी अधिक थी.  

    दो साल बाद विपक्ष की ताकत वैसी ही है लेकिन वह कई मोर्चे पर बीजेपी को परेशान करने में सफल रही है. संसद से लेकर विधानसभा और गलियों से लेकर सोशल मीडिया तक बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताकत बढ़ी है जिससे विपक्ष चिंतित नजर आ रहा है. 

    कांग्रेस के नेतृत्व में हालांकि विपक्षी दलों ने रणनीति के तहत बीजेपी के उभार को रोकने की कोशिश की है. पार्टी के रणनीतिकार कुछ ही मौकों पर ऐसा करने में सफल हो पाए. समग्र तौर पर उनकी नीति काम नहीं कर पाई.

    दो सालों में मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के काम काज पर एक नजर डालना जरूरी हो जाता है.

    दो साल के कार्यकाल में कांग्रेस बीजेपी को रोकने में पूरी तरह विफल रही है

    संसद के दोनों सदनों का बर्ताव पूरी तरह से अलग रहा. इसकी वजह दोनों सदनों में विपक्ष की अलग-अलग संख्या रही. राज्यसभा में सरकार को हमेशा ही परेशानी उठानी पड़ी क्योंकि यहां सरकार अल्पमत में है. वहीं लोकसभा का कामकाज शानदार रहा क्योंकि एनडीए को यहां प्रचंड बहुमत हासिल है.

    राज्यसभा में विपक्षी दलों के बहुमत की वजह से जीएसटी बिल पर बात नहीं बन पाई. जीएसटी बिल को सरकार अहम सुधार के तौर पर पेश करती रही है. 

    यहां तक कि राज्यसभा में होने वाली बहस के दौरान विपक्ष सुर्खियों में रहता है. इसका ताजा उदाहरण अगस्ता वेस्टलैंड पर हुई बहस थी.

    राज्यों की विधानसभाओं में

    पांच राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेशों में हुए चुनाव में बीजेपी महज एक राज्य में सत्ता में आ पाई. हालांकि यह आंकड़ा बीजेपी की ताकत को बयां नहीं करता है. सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व में बीजेपी पूर्वोत्तर के राज्य में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाने में सफल रही है.

    इसके अलावा केरल में भी पहली बार बीजेपी अपना खाता खोलने में सफल रही. पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अपने प्रदर्शन को सुधारा है. बंगाल में बीजेपी अभी तक सत्ता में नहीं रही है और वहां उसकी पकड़ बेहद मामूली है.

    इन कामयाबियों से बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के भरोसे में बढ़ोतरी हुई है. पिछली बार दिल्ली और बिहार के चुनाव में हारने के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया था. चुनावी गणित में कांग्रेस को एक राज्य हाथ से गंवाना पड़ा और दूसरा राज्य उसके हाथ से निकलते-निकले बच गया.

    अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाया गया. इसकी वजह से कांग्रेस को ईटानगर की सरकार गंवानी पड़ी. देहरादून में वह बहुत मुश्किल से अपनी सरकार बचाने में सफल रही.

    मुद्दों पर

    अभी तक एनडीए की सरकार मुद्दों को लेकर ध्रुवीकरण करने में आगे रही है. इसकी शुरुआत 2014 में घर वापसी और लव जेहाद से हुई. संघ को इस राजनीतिक पैंतरेबाजी से अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिली. वहीं विपक्ष को भी इन मुद्दों के कारण सरकार को घेरने का मौका मिला.

    लोगों के बीच घर वापसी और लव जेहाद का फॉर्मूला काम करता दिखा. इससे संघ को अपना आधार मजबूत करने में मदद मिली तो विपक्ष को भी अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिला.

    दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद से बीफ का मुद्दा सामनेे आया. इसके बाद देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर चर्चा हुई और बीजेपी को इसकी कीमत बिहार चुनाव में चुकानी पड़ी. 

    हालांकि विपक्षी दलों को इन मुद्दों पर बेहद सख्त रुख नहीं अपनाने की वजह से सिविल सोसाएटी के विरोध का सामना करना पड़ा. लेकिन इस आंदोलन ने विपक्ष को सरकार के खिलाफ मजबूती दी.

    इससे पहले विपक्ष को उस वक्त बड़ी सफलता मिली, जब सरकार ने उसके दबाव में आकर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वापस लिया. सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ विपक्ष एकजुट हुआ. इस दौरान कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी ने संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकाला. सरकार को मजबूरी में अध्यादेश वापस लेना पड़ा.

    संघ परिवार को लाल सलाम और जय भीम की एकजुटता से कड़ी चुनौती मिली

    इसके बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद राष्ट्रवाद को लेकर बहस शुरू हुई. विश्वविद्यालय से फिलहाल कई छात्रों को बाहर निकाला जा चुका है.

    हालांकि इस मुद्दे ने एक बार फिर से विपक्ष को सरकार के खिलाफ लामबंद होने का मौका दे दिया. जैसा कि असहिष्णुता वाले मामले में हुआ था. कांग्रेस और वामपंथ ने इस मामले में जेएनयू छात्रों को समर्थन दिया. फिर यह बहस कैंपस से बाहर निकल संसद तक पहुंच गई.

    प्रदर्शनकारियों ने विपक्ष को संघ परिवार के जातिगत राजनीति पर हमला करने का भी मौका दिया. हैदराबाद में दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की मौत के बाद छात्रों ने संघ के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया. परिवार को लाल सलाम और जय भीम की बढ़ती नजदीकियों से बड़ी चुनौती मिली. इस पूरे आंदोलन ने विपक्ष को संजीवनी देने का काम कियाा.

    लेकिन हालिया विधानसभा के चुनावी नतीजों के विपक्ष की मजबूती को धाराशायी कर दिया है. असम में सरकार बनाने और केरल में खाता खोलने के बाद बीजेपी मजबूत स्थिति में आ गई हैै.

    कांग्रेस इस बीच यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि वह एक राष्ट्रीय पार्टी है. वहीं सीपीएम को आत्मावलोकन की जरूरत महसूस हो रही है. 

    ममता बनर्जी की दूसरी जीत के बाद नीतीश कुमार की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को ब्रेक लगता दिख रहा है. क्षेत्रीय दल मसलन एआईडीएमके और तृणमूल कांग्रेस को बीजेपी अपनी तरफ खींचने में लगी है ताकि संसद में वह लंबित एजेंडे को आगे बढ़ा सके. आने वाले समय में विपक्ष की चुनौतियां कम होती नजर नहीं आ रही है.

    First published: 25 May 2016, 11:37 IST
     
    चारू कार्तिकेय @charukeya

    असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

    पिछली कहानी
    अगली कहानी