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मंत्रिमंडल विस्तारः तीन नए चेहरों को मिलाकर यूपी से हुए कुल 14 मंत्री

अतुल चंद्रा | Updated on: 6 July 2016, 14:44 IST
(कैच न्यूज)

प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए मंगलवार को अपने मंत्रिमंडल के विस्तार में प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन अन्य सांसदों को शामिल किया और राज्य के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़कर 14 हो गई है.

मोदी के मंत्रिमंडल में स्थान बनाने वालों में अपना दल की अनुप्रिया पटेल कुर्मी मतदाताओं को लुभाने के लिये, एक पासी, कृष्णा राज को दलित मतदाताओं के लिये और अबतक खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे ब्राह्मणों को लुभाने के लिये महेंद्र नाथ पांडेय को शामिल किया है.

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अगर उन्होंने मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय से कनिष्ठ मंत्री रमाशंकर कठेरिया को नहीं हटाया होता तो यह संख्या 15 होती. उन्हें संगठन में एक बड़ी जिम्मेदारी मिलने की उम्मीद है.

2014 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश से 72 सीट जीतने में सफल रही थी लेकिन उस समय नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह, सहित कुल नौ सांसद ही केंद्रीय मंत्रिपरिषद में स्थान बना पाने में सफल रहे थे. इसके अलावा मंत्रालय में कलराज मिश्र, उमा भारती, मेनका गांधी, संतोश कुमार गंगवार, संजीव कुमार बालियान, जनरल वीके सिंह और मनोज सिन्हा शामिल थे.

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महेश शर्मा, साध्वी निरंजन ज्योति और कठेरिया को 2014 में हुए मंत्रीमंडल विस्तार में स्थान मिला था.

ऐसा माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में इन लोगों को शामिल करने का फैसला पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की सलाह के आधार पर किया गया है जो उत्तर प्रदेश को लेकर उनकी योजना को स्पष्ट करता है जहां वे लोकसभा चुनावों के अपने बेहतरीन प्रदर्शन को दोहराने को लेकर सशंकित थे. जीत की तलाश में पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों और दलितों पर अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रही है.

यूपी चुनावों में जीत की तलाश में पार्टी का सारा ध्यान पश्चिमी यूपी के अलावा ओबीसी और दलितों पर केंद्रित है.

केशव प्रसाद मौर्या को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त करने के बाद अनुप्रिया पटेल को मंत्रिमंडल में शामिल करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मोदी और शाह की जोड़ी यादवों के अवाला बाकी ओबीसी वोट बैंक को काफी काफी हद तक खींचने में लगी हुई है.

इसके अलावा इस बात की भी चर्चा है कि लोध मतदाताओं को लुभाने के लिये राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के बेटे राजवीर सिंह को भी कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. एक साथ मिलकर ये लोग ओबीसी मदतादाओं के एक बड़े हिस्से को पार्टी की ओर आकर्षित कर सकते हैं.

जब भी दलितों की बात आती है तो पता नहीं क्यों बीजेपी जाटवों को मायावती से दूर करने के प्रति अनिश्चित दिखाई देती है. हालांकि वे ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन में हैं और अब कृष्णा राज को भी मंत्री के रूप में शपथ दिलवाई गई है.

इसके साथ दलितों को लुभाने के अन्य तरीके अपनाने और इस बार मायावती के किले के कमजोर होने की आशंकाओं के बावजूद बीजेपी राज्य में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के मुकाबले बहुजन समाज पार्टी से अधिक सावधान दिख रही है. चूंकि मायावती जाटव-मुस्लिम-ब्राह्मण के गठबंधन को लेकर आगे बढ़ रही हैं, ऐसे में वे बीजेपी के यूपी में सरकार बनाने के सपने की दिशा में सपा से अधिक बड़ा रोड़ा हैं. और पार्टी वास्तव में इसे लेकर चिंतित है.

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जाति संयोजन के अलावा पार्टी अपना सारा ध्यान पूर्वी उत्तर प्रदेश पर केंद्रित कर रही है. अनुप्रिया पटेल कुर्मियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसका वाराणसी के आसपास के क्षेत्रों के साथ मिर्जापुर, बाराबंकी और गोंडा के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश में खासा प्रभाव है.

हालांकि उनकी मां कृष्णा पटेल ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था लेकिन पेशे से अधिवक्ता पटेल को उनकी पार्टी के दूसरे सांसद हरिबंश सिंह का समर्थन प्राप्त है. उनसे उम्मीद का जा रही है कि वे प्रदेश के कुर्मी वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास करने वाले, खुद जाति से कुर्मी, बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार का मुकाबला करने में सफल रहेंगी.

अनुप्रिया पटेल की ही तरह महेंद्र नाथ पांडेय भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के ही एक निर्वाचन क्षेत्र चंदौली का प्रतिनिधित्व करते हैं. शाहजहांपुर से चुनी गई कृष्णा राज मूलतः फैजाबाद से आती हैं.

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मोदी और शाह, दोनों ही निरंतर पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्राएं कर रही हैं. प्रधानमंत्री के जल्द ही गोरखपुर जाने का भी कार्यक्रम है जहां उनके द्वारा बंद पड़े उर्वरक कारखाने को दोबारा चालू करने की घोषणा करने के अलावा आॅल इंडिया इंस्टीट्यूट आॅफ मेडिकल साईंसेस की स्थापना सहित कई अन्य लोकलुभावन कार्यक्रमों की घोषणा करने की उम्मीद है.

इस सबके बावजूद इस बात की पूरी संभावना है कि एक बार कैराना, समान नागरिक संहिता और तीन तलाक जैसे सांप्रदायिक मुद्दों के सुर्खियों में आने के चलते मोदी और शाह का सोशल इंजीनियरिंग का यह फार्मूला इच्छित परिणाम देने में विफल रहेगा.

First published: 6 July 2016, 14:44 IST
 
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