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एक और जुमला: आधार कार्ड को मनरेगा खातों से जोड़ने में असफल सरकार

सुहास मुंशी | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
(गेट्टी इमेजेज़)

एक तरफ मोदी सरकार कैशलेस अर्थव्यवस्था के समर्थन में दिन-प्रतिदिन नये तर्क और इसको अमली जामा पहनाने के लिए हर दिन नए नियम जारी कर रही है, दूसरी तरफ सरकार अपनी उन प्रतिबद्धताओं को कतई पूरा नहीं कर पा रही है जो कि डिजिटल इकोनॉमी हासिल कर पाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं. मनरेगा मजदूरों के खातों को आधार कार्ड से जोड़ने की पहल का जो हश्र हो रहा है उससे तो यही साबित होता है.

बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली पर बने आधार कॉर्ड को मोदी सरकार इन दिनों पूरी ताकत से लागू करने की कोशिश कर रही है. यहां तक कि मोदी सरकार ने यह घोषणा की थी कि 31 दिसंबर तक सारे देश के मनरेगा मजदूरों के एकाउंट्स आधार कार्ड से जोड़ दिए जाएंगे. कहा गया था कि इससे भ्रष्टाचार कम होगा तथा भुगतान में पारदर्शिता आएगी.

लेकिन सूचना के अधिकार के अंतर्गत ग्रामीण विकास मंत्रालय से प्राप्त आंकड़े एक अलग ही कहानी कहते हैं. इसके अनुसार मजदूरों के भुगतान को आधार से जोड़ने की दिशा में 15% भी काम नहीं हुआ है. इसलिए 31 दिसंबर तक सभी मनरेगा एकाउंट्स को आधार से जोड़ने की बात या तो जुबानी जमाखर्च लगती है या फिर किसी चमत्कार की उम्मीद.

मनरेगा के अंतर्गत 25.89 करोड़ मजदूर पंजीकृत हैं. इनमें से सिर्फ 3.68 करोड मजदूर ही आधार प्रणाली से जुड़े हैं

ग्रामीण विकास मंत्रालय को 2 दिसंबर तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मनरेगा के अंतर्गत देशभर में 25.89 करोड़ मजदूर पंजीकृत हैं. इनमें से सिर्फ 3.68 करोड मजदूरों को ही आधार आधारित भुगतान प्रणाली से जोड़ा जा सका है. इनमें भी सबसे खराब प्रदर्शन जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और राजस्थान का है. ये राज्य क्रमश: 0.05, 3.93 और 11.19 प्रतिशत मनरेगा एकाउंट्स को आधार भुगतान प्रणाली से जोड़ सके हैं.

कई उत्तर पूर्व के राज्यों जैसे मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय में तो यह प्रतिशत लगभग जीरो है. वहीं कुछ अन्य राज्य जैसे हरियाण और पंजाब में यह कार्य कुछ संतोषजनक ढंग से हुआ है. यहां क्रमश: 29.45 और 31.18 प्रतिशत मनरेगा खाते आधार से जोड़ दिए गए हैं.

वर्तमान में सभी मनरेगा के भुगतान इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मजदूरों के खाते में किए जाते हैं. लेकिन हाल में बने आधार अधिनियम के अनुसार यह भुगतान अनिवार्यता केंद्रीय सरकार के आॅनलाइन डाटाबेस के माध्यम से आधार से जुड़े मनरेगा खातों में ही किया जाना है. जिससे किसी तरह की धोखाधड़ी या पहचान चोरी के काम को अंजाम नहीं दिया जा सके.

यह आंकड़े आखिर क्या कहते हैं? इस बारे में कैच ने जितने लोगों से बात की उनका यही कहना है कि इन आंकड़ों से सरकार की नीतियों में गहरी खामियों की झलक मिलती है.

मनरेगा के संबंध में कई जमीनी अध्ययन और उनका विश्लेषण कर चुके सामाजिक कार्यकर्ता मनोज झा के तर्क और कैच द्वारा आरटीआई के अंतर्गत हासिल किए गए तथ्य तो यही इशारा करते हैं कि समाज का वंचित तबका आधार में अपना पंजीकरण ही नहीं करा सका है. झा के अनुसार भारत में आधार कॉर्ड नागरिकता का पहचान पत्र बन चुका है और इससे कई प्रकार की योजनाओं के लाभ को जोड़ दिया गया है.

आधार की किल्लत

लेकिन जैसा कि भारत में पहले भी होता रहा है, केवल समाज का अपेक्षाकृत संपन्न तबका ही इस कॉर्ड को बनवा सका है. कॉर्ड से जुड़े आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं. झा ने कहा कि हालांकि आधार कॉर्ड को एकांउट्स से जोड़ने का विचार कहीं से गलत नहीं था. लेकिन यह कार्य जिस तरीके से हुआ वह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता.

वहीं समाजशास्त्री और मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया का कहना है कि सिर्फ अकांउट्स को आधार खातों से जोड़ देना ही मनरेगा में भ्रष्टाचार की समस्या का हल नहीं है. सरकार ने आधार स्कीम और उसके अंतर्गत पंजीकरण को एक चरणबद्ध और नियोजित नीति की तरह अंजाम नहीं दिया. सिर्फ खातों और आधार को जोड़ने का ही लक्ष्य रखा गया.

असल में मनरेगा में भ्रष्टाचार सिर्फ खातों में भुगतान का नहीं है. भुगतान तो सबसे अंत में आता है. भ्रष्टाचार की समस्या तो लाभार्थियों की पहचान और भुगतान की गणना के स्तर पर ज्यादा है. यह समस्याएं आधार से जोड़ने से हल नहीं होंगी.

लेकिन इंडिया स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में मनरेगा कार्यक्रम से जुड़े एक शोधार्थी अभिरूप मुखोपाध्याय का कहना है कि आधार को खातों से जोड़ना एक जरूरी कदम था, लेकिन इस काम को अत्यंत धीमी गति से अंजाम दिया गया.

मुखोपाध्याय के अनुसार आज अधिक से अधिक सरकारी योजनाएं डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम के अंतर्गत आ रही हैं. इन सभी को इलेक्ट्रानिक तरीके से ही भुगतान किया जाता है. इसलिए अगर आॅनलाइन आधार डाटाबेस के माध्यम से इन सभी भुगतानों पर नजर रखी जा सके तो इसके सार्थक परिणाम निकलेंगे. लेकिन इस प्रक्रिया को तेजी से संपन्न किया जाना था. आपका कहना सही है कि इस कार्य को सचमुच बहुत ही धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जा रहा है.

First published: 24 December 2016, 8:11 IST
 
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