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मोदीजी! यह कटु सत्य है, पाकिस्तान आतंकवाद नहीं छोड़ सकता

विवेक काटजू | Updated on: 2 February 2016, 17:11 IST
QUICK PILL
  • पाकिस्तान की तरफ से पठानकोट हमले में शामिल आतंकियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई किए बगैर पाकिस्तान के साथ बातचीत को आगे बढ़ाना उन्हीं नीतियों की पुनरावृत्ति होगी जिसे यूपीए सरकार में आगे बढ़ाया जाता रहा है.
  • मोदी को यह बात समझनी चाहिए कि पाकिस्तानी सेना आतंकियों पर अपनी निर्भरता कम नहीं करेगी क्योंकि यह भारत के खिलाफ उनकी नीति का अहम हिस्सा है. वास्तव में पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र वैसा देश है जो परमाणु  शक्ति संपन्न होते हुए दूसरे परमाणु शक्ति संपन्न देश के खिलाफ आतंक को बढ़ावा देता है.

भारत के एक टीवी चैनल को दिए गए साक्षात्कार में पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने फरवरी के पहले हफ्ते में दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तरीय बातचीत शुरू होने के संकेत दिए. इससे पहले दोनों देशों के बीच जनवरी में विदेश सचिव स्तर की बातचीत होनी थी लेकिन दोनों देशों ने आपसी सहमति से इसकी बातचीत को आगे बढ़ाए जाने का फैसला किया. 

पाकिस्तानी उच्चायुक्त के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि अभी तक दोनों देशों के बीच बातचीत की तारीख तय नहीं हुई है. उन्होंने इस बारे में और भी कुछ कहने से मना कर दिया. तो फिर इसका क्या मतलब है?

पठानकोट पर कार्रवाई

भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाली बातचीत की दिशा में पठानकोट आतंकी हमले में शामिल आतंकियों और साजिशकर्ताओं के खिलाफ होने वाली पाकिस्तानी कार्रवाई की अहम भूमिका है. इसलिए मोदी सरकार को बातचीत के बदले आतंकियों के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. दोनों देशों के बीच होने वाली विदेश सचिव स्तरीय बातचीत में प्रस्तावित समग्र द्विपक्षीय बातचीत का खाका तैयार किया जाएगा.

भारत और पाकिस्तान ने सहमति से जनवरी में होन वाली प्रस्तावित बातचीत की तारीख को आगे बढ़ाने का फैसला लिया था

हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि अगर पाकिस्तान भारत सरकार की तरफ से पठानकोट हमले में शामिल आतंकियों के खिलाफ मुहैया कराए गए सबूतों के आधार पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं करता है तो क्या मोदी सरकार पाक के साथ होने वाली बातचीत की तारीख को आगे बढ़ाएगी या नहीं.

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मोदी लाहौर का अचानक दौरा कर पाकिस्तान के साथ रिश्तों को ठीक किए जाने की दिशा में बहुत अधिक कोशिश कर चुके हैं और उनकी कोशिश भारत और पाकिस्तान के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई तक ले जाने के मामले में इतिहास लिखने की है. ऐसे में मोदी यह नहीं चाहेंगे कि उनकी पूरी कोशिश पाकिस्तानी सेना के हत्थे चढ़ बेकार चली जाए.

वास्तव में मोदी और उनके सलाहकार पाकिस्तान से आने वाले संकेतों को गलत तरीके से पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें यह लगता है कि पाकिस्तानी सेना का रुख बदल चुका है.

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मोदी के सलाहकारों की राय पाकिस्तानी सेना में होने वाले प्रस्तावित बदलावों पर आधारित है क्योंकि लेफ्टिनेंट जनरल नासिर जंजुआ को पाकिस्तान का राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया गया है. यह साफ हो चुका है कि नासिर जंजुआ ने बैंकॉक में होने वाली बैठक में सही दिशा में बातचीत की थी. तो क्या यह सब काफी है?

ऐसा बताया गया है कि पाकिस्तान भारत की तरफ से मुहैया कराई सूचना पर आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है

पठानकोट हमला मामले में पाकिस्तान के खिलाफ जवाबदेही तय करने में भारत ने जल्दबाजी नहीं दिखाई. भारत के इस रुख की पाकिस्तान ने तारीफ की है. ऐसा बताया गया है कि पाकिस्तान सरकार भारत की तरफ से मुहैया कराई गई सूचनाओं पर काम कर रही है और अगर किसी आतंकी संगठन के खिलाफ पुख्ता सबूत है तो उसके खिलाफ कार्रवाई करने से परहेज नहीं किया जाएगा.

हालांकि सार्वजनिक तौर पर यह नहीं बताया गया है कि अभी तक इस मामले में क्या कार्रवाई की गई है. चूंकि दोनों राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एक-दूसरे के संपर्क में है इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को पाकिस्तान में हुई कार्रवाई के बारे में जानकारी होगी. मोदी सरकार पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद ही जनता को आतंकियों के खिलाफ हुई कार्रवाई के बारे में बताएगी.

पाकिस्तान की रणनीति

ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि दिल्ली में बैठे पाकिस्तान के प्रतिनिधि जो कुछ कह रहे हैं वह पाकिस्तान के रुख में हुए किसी वास्तविक बदलाव का संकेत तो नहीं देता है. वह इस बात पर जोर दे रहे हैं कि पाकिस्तान कानून और आतंकवाद के खिलाफ तय नेशनल एक्शन प्लान के मुताबिक कार्रवाई करेगा.

जाहिर है कि पाकिस्तान का नेशनल एक्शन प्लान लश्कर-ए-तैयबा के खिलाफ कार्रवाई से जुड़ा नहीं है क्योंकि उन्होंने अभी तक इस संगठन को प्राथमिकता नहीं दी है. ऐसा ही कुछ जैश के बारे में कहा जा सकता है.

पाकिस्तानी प्रतिनिधि बार-बार यह कह रहे हैं कि आतंकवाद और बातचीत को जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. ऐसे में पाकिस्तान की तरफ से आतंकियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं किए जाने के बावजूद अगर दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की बातचीत होती है तो इसका मतलब यह होगा कि मोदी सरकार बातचीत और आतंकवाद को साथ-साथ आगे बढ़ाने पर अपनी सहमति दे देगी. 

इसका यह मतलब होगा कि सीमा पार से होने वाला आतंकवाद महज राजनीतिक प्रबंधन का मामला बन कर रह जाएगा जैसा कि यूपीए सरकार के दौरान हुआ करता था.

मोदी को यह बात समझनी चाहिए कि पाकिस्तानी सेना आतंकियों पर अपनी निर्भरता कम नहीं करेगी क्योंकि यह भारत के खिलाफ उनकी नीति का अहम हिस्सा है. यह उस त्रिकोणीय समीकरण का हिस्सा है जिसमें पहला कारक पारंपरिक लड़ाई और दूसरा कारक परमाणु हथियार हैं.

पाकिस्तान वैसा देश है जो परमाणु  शक्ति संपन्न होेते हुए दूसरे परमाणु शक्ति संपन्न देश के खिलाफ आतंक को बढ़ावा देता है

तो सवाल है कि क्या प्रस्तावित समग्र बातचीत को पाकिस्तानी आतंकवाद से अलग रखा जा सकता है. यूपीए सरकार ने इस दिशा में कोशिश की थी लेकिन वह नीति काम नहीं कर पाई. बातचीत को निलंबित कर महज लोगों के गुस्से को कम करने की कोशिश की गई. 

मोदी को उम्मीद होगी कि पाकिस्तान अब आतंक के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई करेगा ताकि उन्हें बातचीत को आगे बढ़ाए जाने का बचाव करने का मौका मिले. वह नवाज शरीफ और शायद अमेरिका की तरफ से दिखाए जा रहे चमक पर भरोसा दिखा रहे हैं. लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि  पाकिस्तानी सेना भारत की कमजोरी भांपते हुए चरणबद्ध तरीके से दबाव बनाएगा.

पाकिस्तानी सेना सफलतापूर्वक यह जाल बिछा चुकी है. क्या मोदी इससे होकर गुजरेंगे? आगे आने वाला हफ्ता यह बता पाएगा कि मोदी किस रास्ते का चयन करते हैं.

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First published: 2 February 2016, 17:11 IST
 
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