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चुनावी समर में पीएम मोदी ने न्यायिक सेवा परीक्षा का पत्ता फेंका

सुहास मुंशी | Updated on: 4 November 2016, 7:45 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए एक समान व्यवस्था का विचार एआईजेएस दरअसल केन्द्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तर्ज पर आया है.
  • इसके तहत देश में कहीं भी रहने वाले लोग यह परीक्षा पास करने के बाद किसी भी जगह काम करने के पात्र हो जाते हैं. 
  • एआईजेएस के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में युवा जजों को काम करने का समान अवसर मिलेगा. 

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने पहली बार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा परीक्षा (एआईजेएस) कराने का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था. यह पुराना लेकिन सुधारवादी प्रस्ताव था जिसका उद्देश्य देश भर के सभी अधीनस्थ न्यायाधीशों के लिए समान प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था करना था. 

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि एआईजेएस में दलितों, दबे-कुचले, शोषित, गरीब और उपेक्षितों को समुचित आरक्षण भी मिले. इसमें उनकी सरकार की गहन रुचि जगजाहिर है. विधि मंत्रालय ने न्यायिक सुधारों के तौर पर एआईजेएस के मुद्दे को खुलकर आगे बढ़ाया.

यह जगजाहिर है कि आगामी कुछ महीनों में पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं जहां दलितों की अच्छी-खासी तादात है. मोदी यह भी जानते हैं कि आरक्षण के साथ एआईजेएस प्रणाली को लागू करने में लंबा समय लगेगा लेकिन इस संदर्भ में दलित और शोषित की बात करना कारगर साबित होगा. एआईजेएस का मामला हालांकि बहुत महत्वपूर्ण लेकिन जटिल बहस वाला पिछले चार दशक से चर्चा में है.

कई न्यायविदों से इस बारे में बातचीत के बाद कैच टीम ने यह पाया कि एआईजेएस लागू होने से अदालतों में बड़ी तादात में खाली पदों को आसानी से भरा जा सकेगा लेकिन कुछ अभी इस व्यवस्था में आरक्षण का लाभ मिलने को लेकर कुछ नहीं कहना चाहते. वास्तव में यह शीर्ष न्यायिक पदों पर नियुक्ति के लिए मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली को सीधी चुनौती होगी. जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली के हावी रहने के पीछे खास वजह यह मानी जा रही है कि देश के शीर्ष जजों में करीब आधे पूर्व जजों या न्यायविदों के रिश्तेदार हैं.

क्या है एआईजेएस?

निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति के लिए एक समान व्यवस्था का विचार दरअसल केन्द्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तर्ज पर आया है जिसके तहत देश में कहीं भी रहने वाले लोग यह परीक्षा पास करने के बाद किसी भी जगह काम करने के पात्र हो जाते हैं. एआईजेएस के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में युवा जजों को काम करने का समान अवसर मिलेगा. 

आज स्थिति यह है कि एक मजिस्ट्रेट को जिला जज बनने में कम से कम 10 साल लग जाते हैं और उच्च न्यायालयों में जाने की बारी आने में उन्हें दो दशक तक इंतजार करना पड़ता है. अक्सर कई जज यह सब मौके हासिल नहीं कर पाते हैं. एआईजेएस के विचार को व्यापक स्वीकार्यता मिलने के अलावा विधिक मान्यता और विधायिका का समर्थन भी हासिल है. इसके लिए 1977 में संविधान में संशोधन कर धारा 312 के तहत एआईजेएस व्यवस्था लागू करने को कहा गया है. 

संप्रग सरकार ने 2012 में इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया लेकिन उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के कड़े विरोध से बिल का मसौदा हटा दिया गया. वर्ष 1961, 1963 और 1965 में मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में एआईजेएस के गठन का समर्थन किया गया था. पहले, आठवें और ग्यारहवें विधि आयोगों ने भी यही रुख अपनाया. सुप्रीम कोर्ट ने 1991 और 1993 में अपने फैसलों में एआईजेएस शुरू करने की सिफारिश की थी.

मोदी सरकार गंभीर

रिपोर्टस के अनुसार इस बारे में कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद जजों के साथ कई दौर की बैठकें कर चुके हैं. पिछली बैठक कुछ सप्ताह पहले हुई है और अब भारत के मुख्य न्यायाधीश टी.एस.ठाकुर सभी राज्यों के मुख्य न्यायाधीशों के साथ एआईजेएस के तौर-तरीकों पर विार विमर्श कर सकते हैं. यदि आम सहमति बन जाती है तो भी एआईजेएस लागू क्यों नहीं हो सकती? यह इसलिए क्योंकि एआईजेएस से कॉलेजियम प्रणाली को खुली चुनौती मिल रही है.

एक ओर निचली अदालतों में मजिस्ट्रेट स्तर के न्यायिक अधिकारी अधिकांश प्रदेशों में उनके राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा के जरिए नियुक्त होते हैं. अधीनस्थ अदालतों में भी सेशन जज प्रवेश परीक्षा के माध्यम से नियुक्त होते हैं लेकिन उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में कॉलेजियम पद्धति से जजों की नियुक्ति प्रक्रिया जारी है.

एआईजेएस के फायदे

देश की अदालतों में जजों की भारी किल्लत है. ताजा आंकड़ों के अनुसार जिला अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के कम से कम 5111 पद खाली हैं. इन अदालतों में स्वीकृत 21303 पदों के विपरीत सिर्फ 16192 जज नियुक्त हैं. देश भर में करीब तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जज पर्याप्त हैं या आवेदक अधिक हैं. अगर एआईजेएस प्रणाली लागू हो जाती है तो रिक्त पदों को भरने के लिए अखिल भारतीय परीक्षा से काफी जज आ पाएंगे. 

राज्यों में जहां ज्यादा जजों की जरूरत है उनकी नियुक्ति संभव होगी. दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश एस़.एन.धींगड़ा का कहना है कि देश के लिए एआईजेएस जरूरी है. कई मामलों में पूर्व जज अपने जज पुत्र या पुत्रियों से काम करा लेते हैं. एआईजेएस इस गठजोड़ को तोड़ेगा. 

अपना नाम जाहिर नहीं करने के इच्छुक एक कार्यरत जज इस पद्धति के सख्त खिलाफ हैं. उनका मानना है कि अगर उत्तर भारत के किसी जज का दक्षिण में तबादला होता है तो वह वहां की भाषा नहीं समझ पाएगा जिसका असर मुकदमों की कार्रवाई में जरूर पड़ेगा. फिलहाल एआईजेएस को लेकर ताजा बहस छिड़ चुकी है जिसमें एक ओर न्यायपालिका और विधायिका के अलावा कॉलेजियम बनाम राष्ट्रीय नियुक्ति आयोग ( एनजेएसी ) हैं. दूसरी ओर मोदी सरकार और न्यायपालिका के पत्ते साफ़ नजर आ रहे हैं.

First published: 4 November 2016, 7:45 IST
 
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