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जहरीली खेसारी दाल को वापस लाने के मायने

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने खेसारी दाल पर जारी प्रतिबंध को हटाने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के पास प्रस्ताव भेजा है.  
  • कहा जाता है कि अभी भी छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा, असम, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में में इसकी खेती की जा रही है.

क्या दाल संकट से निपटने के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार करीब पांच दशक पहले स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिबंधित की जा चुकी दाल को वापस लाने की तैयारी कर रही है? ऐसा लगता है कि खेसारी दाल को लाने की तैयारी हो रही है जिसे 1961 में जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था.

उम्मीद है कि यह जानलेवा दाल जल्द ही आपकी थाली में वापसी कर सकती है क्योंकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कथित तौर पर प्रतिबंध हटाने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को प्रस्ताव भेजा है.  

1961 में मस्तिष्क संबंधी विकार के कई मामलों के सामने आने के बाद लगभग पूरे देश में इस दाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. उस दौरान कहा जाता था कि इसे खाने के बाद मस्तिष्क विकार के चलते पैरों में लकवा मार जाता था.

खेसारी दाल जिसे घास मटर और लड़की मटर के रूप में भी जाना जाता है, एक ऐसी प्रजाति की दाल है जिसकी पैदावार अच्छी होती है और यह सूखे जैसी स्थिति में भी खूब पैदावार दे सकती है. 

इसे वापस लाने के इन प्रयासों के पीछे मुख्य कारण अन्य दालों की तुलना में इसका काफी सस्ता होना भी संभव हो सकता है. देश में दालों की कीमतों में आग लगी हुई है और यहां तक की राष्ट्रीय राजधानी में अरहर की दाल 200 रुपये प्रति किलो पर बिक रही है.

चुपके से दी गई छूट

रिपोर्टें के मुताबिक आईसीएमआर के नेतृत्व में एक शोध दल ने इसकी खपत को मंजूरी दे दी है. आईसीएमआर, जैव चिकित्सा अनुसंधान के लिए भारत में शीर्ष संस्था है और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग द्वारा वित्त पोषित है. इसकी गवर्निंग बॉडी की अध्यक्षता केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री करते हैं.

सूचना के अधिकार के तहत इसका खुलासा हुआ जिसने मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दलों को एक मुद्दा दे दिया है

फिलहाल अच्छी खबर यह है कि इस दाल को बाजार में आने के लिए हरी झंडी मिलने में अभी कुछ वक्त बाकी है. एफएसएसएआई के सीईओ पवन कुमार अग्रवाल ने कथित रूप से कहा है कि खेसारी दाल पर से प्रतिबंध हटाने से पहले इसे कठोर परीक्षणों से गुजरना होगा, क्योंकि इस पर दशकों पहले प्रतिबंध लगाया जा चुका है.

हालांकि बुरी खबर यह है कि सरकार ने इसके बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा है और वह चुपचाप खेसारी दाल वापस लाने की प्रक्रिया के बारे में काम कर रही है. कृषि मंत्रालय और मैगी के प्रतिबंध में प्रसिद्धि पाने वाली एफएसएसएआई ने इस बारे में अभी कोई घोषणा नहीं की है. इसके अलावा वे कथित तौर पर खेसारी दाल को मंजूरी दी गई है या नहीं के बारे में कोई जवाब भी नहीं दे रहे. 

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा एक सूचना के अधिकार के तहत इसका खुलासा हुआ जिसने मोदी सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दलों को एक मुद्दा दे दिया है.

लोगों के स्वास्थ्य के साथ खेल रही सरकार: कांग्रेस

कांग्रेस सांसद और पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने 18 जनवरी को इसके बारे में ट्वीट किया था.

कांग्रेस प्रवक्ता आरपीएन सिंह ने इस पर एक कदम और आगे बढ़ाते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि यह, "करोड़ों भारतीयों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है." 

सिंह ने सरकार से पूछा कि क्या सरकार ने इस संबंध में "जरूरी पर्याप्त अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रमाण" का इस्तेमाल किया और "यह निर्णय लेने से पहले सार्वजनिक विचार-विमर्श" आयोजित किया था. उन्होंने विशेष रूप से यह मुद्दा भी उठाया कि अगर सरकार ने खेसारी दाल से प्रतिबंध हटा लिया है तो इकी सूचना जनता के बीच सार्वजनिक क्यों नहीं की गई. सिंह ने पूछा कि "क्यों हमें इसकी सूचना आरटीआई और मीडिया से मिल रही है?"

अभी भी हो रही है खेसारी दाल की खेती

क्योंकि केवल खेसारी दाल की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया था न कि खेती पर, इसलिए आज भी कई जगहों पर किसानों द्वारा इसकी खेती की जा रही है. कहा जाता है कि अभी भी छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा, असम, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में में इसकी खेती की जा रही है. 

अब अगर इसकी पैदावार होती है तो क्यों इसे बेचा नहीं जाता? माना जाता है कि प्रतिबंध की ज्यादा परवाह किए बिना व्यापारियों द्वारा इसे किसानों से सीधे खरीदा जाता है. जिसके बाद इसे व्यापक रूप से चने का आटा (बेसन) और अरहर (अरहर) जैसे उत्पादों के साथ मिलाकर बाजार में बेचा जाता है. 

नवंबर 2015 में मीडिया में आई कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि इस तरह की मिलावट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भी होती है.

खेसारी में विषाक्त पदार्थों पर बहस

खेसारी दाल की सुरक्षा पर वैज्ञानिक समुदाय में एक बहस जारी है. जुलाई 2013 में प्रकाशित भारतीय चिकित्सा जर्नल की एक रिपोर्ट का दावा था कि यह दाल "सामान्य आहार के एक हिस्से के रूप में हानिरहित है" और यहां तक ​​कि हृदय की देखभाल के लिए यह एक "बेशकीमती वस्तु" साबित हो सकती है.

हालांकि, खेसारी दाल के उपयोग पर भारतीय विषाक्तता अनुसंधान संस्थान की राय है कि यह "सुरक्षित नहीं है". एफएसएसएआई की वैज्ञानिक समिति द्वारा भी इसका उल्लेख किए जाने की सूचना है कि जिन क्षेत्रों में खेसारी दाल का सेवन किया जाता था वहां पर लोगों के पैरों में लकवा मारने की घटनाएं सामने आईं थीं.

जिन क्षेत्रों में खेसारी दाल का सेवन किया जाता था वहां पर लोगों के पैरों में लकवा मारने की घटनाएं सामने आईं थीं

हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा भी कथित तौर पर एक अध्ययन किया गया जिसमें खेसारी दाल को खाने से उत्पन्न होने वाले जहरीले प्रभाव का बकरियों पर "असामान्य प्रभाव" पाया गया.

देश में दल की कमी और इसके परिणामस्वरूप भारी आयात पर निर्भरता वास्तव में एक गंभीर संकट है. दालों के घरेलू उत्पादन में वृद्धि करने के तरीकों का पता लगाने की कोशिश में नीति निर्माताओं के साथ ही कृषि वैज्ञानिक पिछले कई वर्षों से जूझ रहे हैं. 

हालांकि, इस जहरीली दाल पर दशकों पहले लगाए गए प्रतिबंध को हटाने के लिए सरकार को दाल संकट का बहाना नहीं बनाना चाहिए. साथ ही इस पर प्रतिबंध हटाने से पहले पर्याप्त वैज्ञानिक मंजूरी और जनता को विश्वास में लेना चाहिए.

First published: 22 January 2016, 11:54 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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