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‘‘मोदी भगवान की देन हैं’’: वैंकेया नायडू को दरबारी क्यों बनना पड़ा?

आशुतोष | Updated on: 22 March 2016, 14:48 IST
QUICK PILL
  • नायडू\r\nका हालिया बयान साफ करता है\r\nकि बीजेपी बीते दो वर्षों में\r\nकाफी लंबा रास्ता तय कर चुकी\r\nहै. वरिष्ठ\r\nनेताओं ने मोदी के सामने हथियार\r\nडाल दिये हैं
  • यह सिर्फ इत्तेफाक नहीं था\r\nकि जिस दिन बीजेपी ने मोदी को\r\nअपना प्रधानमंत्री पद का\r\nउम्मीदवार घोषित किया था ठीक\r\nउसी दिन आडवाणी ने पार्टी\r\nअध्यक्ष राजनाथ सिंह को एक\r\nपत्र लिखकर कहा था कि पार्टी अब अटल\r\nबिहारी वाजपेयी, श्यामा\r\nप्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल\r\nउपाध्याय के रास्ते\r\nसे भटक चुकी है.
  • बहुत\r\nसाल पहले असम के नेता देवकांत\r\nबरुआ ने इंदिरा गांधी के लिये\r\nकुछ ऐसे ही शब्द प्रयोग किये\r\nथे. उन्होंने\r\nकहा था कि, ‘‘इंडिया,\r\nइंदिरा है\r\nऔर इंदिरा ही इंडिया है.’’

चाटुकारिता किसी भी आम व्यक्ति की नजर में एक शर्मनाक कृत्य हो सकता है लेकिन राजनीति के क्षेत्र में इसके बड़े फायदे मिलने की उम्मीद रहती है. शायद यही वजह है कि भारतीय राजनीति में लंबे समय से दरबारी खुशामद करने वालों की काफी मांग रही है.

रविवार को किसी ने मुझे बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वैंकेया नायडू द्वारा नरेंद्र मोदी की शान में जो कुछ कहा उसके बारे में बतायाः ‘‘ मोदी भारत के लिये भगवान की देन हैं.’’

पहले तो मुझे भरोसा ही नहीं हुआ. मैं लंबे अरसे से नायडू को जानता रहा हूं और उनके साथ कई मुलाकातों और साक्षात्कारों का गवाह भी रहा हूं. उनकी वार्ताओं और साक्षात्कारों के दौरान वे मशहूर कहावतों और मुहावरों का प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं. जब वे भाजपा के अध्यक्ष थे तब उनकी प्रेस कांफ्रेंस में भाग लेना बहुत शानदार अनुभव होता था.

नायडू, लालकृष्ण आडवाणी खेमे के माने जाते हैं. 2010 में आडवाणी उन्हें राजनाथ सिंह के बाद दोबारा पार्टी अध्यक्ष बनवाना चाहते थे लेकिन आखिर में संघ की चली और नितिन गडकरी का नाम फाइनल हुआ.

बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में वैंकेया नायडू ने नरेंद्र मोदी को भारत के लिये भगवान की देन कहा


नायडू हमेशा से ही एक सम्मानित शख्सियत रहे हैं और इसी वजह से मोदी के संबंध में उनका यह बयान अजीब लगता है.

अभी बीते सप्ताह ही गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने ऐसा ही कुछ फेसबुक पर भी लिखा था. उन्होंने लिखा कि नास्त्रेदमस ने भविष्यवाणी की थी कि 2014 में एक व्यक्ति भारत के राजनीतिक पटल पर उभरेगा जो 2026 तक देश की बागडोर संभालेगा.

हालांकि रिजिजू एक जूनियर मंत्री हैं और उनका राजनीतिक वजूद इतना बड़ा नहीं है. वे बीजेपी के केंद्रीय कोटरी में नहीं हैं. उन्हें मंत्रिपद सिर्फ मोदी की कृपा से मिला हुआ है और इसीलिये कोई भी मोदी के प्रति उनके प्रेम को आसानी से समझ सकता है. लेकिन नायडू जैसा व्यक्ति इस प्रकार का कोई बयान देता है तो उसे एक व्यापक संदर्भ में समझना आवश्यक हो जाता है.

आधुनिक बरुआ

बहुत साल पहले असम के नेता देवकांत बरुआ ने इंदिरा गांधी के लिये कुछ ऐसे ही शब्द प्रयोग किये थे. उन्होंने कहा था कि, ‘‘इंडिया, इंदिरा है और इंदिरा ही इंडिया है.’’

यह वह समय था जब श्रीमती गांधी ने अनुकरणीय साहस, दृढ़ता और नेतृत्व कौशल का प्रदर्शन करते हुए 1971 का युद्ध जीता था और भारत को विश्वपटल पर स्थापित करने का काम किया था.

हालांकि अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन ने कभी श्रीमती गांधी के लिये अच्छे शब्दों का प्रयोग नहीं किया फिर भी उन्होंने वही किया जो उन्हें ठीक लगा. उनके प्रशंसकों में विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी भी थे जिन्होंने कथित तौर पर उन्हें दुर्गा का अवतार बताया था. हालांकि बीजेपी ने बाद में इस बात का खंडन करते हुए कहा कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा.

इतिहास बरुआ के प्रति नर्म नहीं रहा. उनका नाम चाटुकारिता का पर्याय बन गया. क्या नायडू भी इस जमात का हिस्सा बन जाएंगे?

यह तर्क दिया जा सकता है कि नायडू का राज्यसभा का कार्यकाल बहुत जल्द खत्म हो रहा है और अगर उन्हें दूसरे कार्यकाल के लिये नामित नहीं किया जाता है तो उनके हाथ से मंत्रीपद जा सकता है. हो सकता है कि इसी हताशा में उन्होंने मोदी को खुश करने के लिये ऐसा कुछ कह दिया हो.

कहा जा रहा है कि नायडू का राज्यसभा का कार्यकाल बहुत जल्द खत्म हो रहा है और उनका मंत्रीपद जा सकता है


लेकिन क्या इस बात पर खुलकर बहस नहीं होनी चाहिये कि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी भी उसी दिशा में आगे बढ़ रही है जिसमें कांग्रेस इंदिरा के नेतृत्व में बढ़ी थी? मोदी भी उतने ही लोकप्रिय नेता हैं जितनी वे 1971 के युद्ध के बाद थीं और मोदी भी इंदिरा की ही तरह ताकतवर और निर्णायक नेता माने जाते हैं.

जवाहरलाल नेहरू प्रजातंत्रवादी थे. उन्होंने अपने मंत्रियों को मंत्रालय अपनी मर्जी से चलाने की स्वतंत्रता दे रखी थी लेकिन श्रीमती गांधी के मंत्रीमंडल को ऐसी आजादी नहीं थी. वे अपने मंत्रीमडल की अकेली ‘‘नेता’’ होती थीं और बाकी सब सिर्फ मोहरे होते थे.

मोदी का मंत्रीमंडल और उनका कामकाज मुझे इंदिरा गांधी की याद दिलाता है. कोई भी मंत्री अपनी मर्जी से कोई निर्णय नहीं ले सकता. पीएमओ की मर्जी के बिना मंत्रालयों में पत्ता भी नहीं हिल सकता है.

संजय के समानांतर

श्रीमती गांधी ने हमेशा स्वयं को काफी असुरक्षित समझा और कभी किसी पर भरोसा नहीं किया. ताकतवर मंत्री और जनाधार वाले नेताओं के पर कतर दिये गए और चापलूसों ने सत्ता के शीर्ष पदों की मलाई खाई.

उनकी इसी असुरक्षा की भावना ने संजय गांधी के दौर को जन्म दिया जो समय के साथ एक असुर की तरह बढ़ता गया और आखिरकार 1977 में उनके पतन का सबसे बड़ा कारण बना.

संजय कितने शक्तिशाली थे? मैं इसे इक कहानी के माध्यम से समझाता हूं.

1970 के दशक में आईके गुजराल सूचना एवं प्रसारण मंत्री होते थे. संजय उनके प्रदर्शन से खुश नहीं थे क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि दूरदर्शन और आॅल इंडिया रेडियो उन्हें पर्याप्त रूप से तवज्जों नहीं दे रहे थे.

संजय गांधी ने उन्हें कुछ निर्देश दिये जिन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री ने यह कहते हुए ठुकरा दिया, ‘‘मेरा काम आपको रिपोर्ट करना नहीं है’’.

हालांकि गुजराल श्रीमती गांधी के बेहद नजदीकी थे लेकिन उन्होंने अगले ही दिन उन्हें अपने मंत्रीमंडल से हटाते हुए संजय गांधी के एक चमचे विद्या चरण शुक्ला को कुर्सी पर बैठा दिया.

श्रीमती गांधी के विपरीत मोदी का कोई परिवार नहीं है. लेकिन अमित शाह को उनका इकलौता करीबी विश्वासपात्र माना जा सकता है. शाह फर्जी मुठभेड़ के एक मामले में जेल जा चुके हैं और कुछ वर्ष पहले तक उच्चतम न्यायालय ने उनके गुजरात में प्रवेश तक पर पाबंदी लगा रखी थी. लेकिन अब शाह केंद्र की राजनीति की मुख्य धुरी हैं.

इंदिरा गांधी के पथ पर

यह सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं था कि जिस दिन बीजेपी ने मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था ठीक उसी दिन आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को एक पत्र लिखकर इस बात पर नाराजगी प्रकट की थी कि पार्टी अब अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल उपाध्याय के दिखाये रास्ते से भटक चुकी है. उन्होंने साथ में यह भी लिखा कि पार्टी अब सिर्फ एक ही व्यक्ति की महत्वाकांक्षा पूरी करने का मंत्र बनती जा रही है.

नायडू का हालिया बयान साफ करता है कि बीजेपी बीते दो वर्षों में काफी लंबा रास्ता तय कर चुकी है. वरिष्ठ नेताओं ने मोदी के सामने हथियार डाल दिये हैं. पीएम मोदी अब एक लोकतंत्रिक महाराजा बन चुके हैं. अपने अस्तित्व को बचाने के लिये इन नेताओं के सामने उनके समक्ष झुकने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है.

पीएम मोदी एक लोकतंत्रिक बादशाह बन चुके हैं. अपना अस्तित्व बचाने के लिये बाकी नेताओं के सामने झुकने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है


श्रीमती गांधी के समय पर भी उनके प्रारंभिक दौर में वरिष्ठ नेताओं ने उनके उभार का विरोध किया था लेकिन बाद में या तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया या फिर अप्रभावी बना दिया गया. 1971 के बाद तो उनके सामने कोई चुनौती ही नहीं रही बल्कि सिर्फ चमचे ही रह गए. जगजीवन राम जैसे शक्तिशाली चुपचाप पड़े रहकर वक्त फिरने का इंतजार करते रहे और पार्टी छोड़ने के लिये एक माकूल समय का इंतजार करते रहे.

इतिहास बीजेपी के साथ भी कुछ ऐसा ही दोहराएगा. अगर आने वाले वर्षों में वर्तमान शीर्ष नेता मंत्रिमंडल में अपना स्थान बनाए रखने में कामयाब होते हैं तो मैं यह देखकर बेहद आश्चर्यचकित होऊंगा. विशेषकर अगर बीजेपी आने वाले विधानसभा चुनावों में नहीं हारती है.

श्रीमती गांधी भी तभी तक महत्वपूर्ण बनी रहीं जबतक वे कांग्रेस के लिये चुनाव जीतती रहीं. 1977 में उनके चुनाव हारते ही पार्टी में दोफाड़ हो गई और ब्रह्मानंद रेड्डी ने अपनी अलग कांग्रेस बना ली.

कांग्रेस के विपरीत मोदी के सामने संघ के रूप में एक और बड़ी बाधा है. उन्हें ताकतवर मोदी के स्थान पर एक कमजोर मोदी अधिक पसंद आएगा और चापलूसों के बजाय संगठन की विचारधारा में विश्वास करने वाले लोग उसकी प्राथमिकता रहेंगे.

नायडू के शब्द आने वाले समय में कई और बार भी, कई और रूप में सुनने को मिलेंगे लेकिन क्या संघ इन्हें बढ़ावा देगा? एक चीज तो निश्चित है कि अब पतन प्रारंभ हो गया है. अगर कांग्रेस आज हाशिये पर आ चुकी है तो श्रीमती गांधी इसके लिये धन्यवाद की पात्र हैं. क्या बीजेपी और संघ इतिहास के कुछ सीखेंगे?

First published: 22 March 2016, 14:48 IST
 
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