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गोरखपुर में एम्स को लेकर खुश होने से पहले देश के दूसरे एम्स की दशा जरूर जान लें

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 26 July 2016, 8:40 IST
QUICK PILL
  • पिछले शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) की आधारशिला रखी. एक अनुमान के मुताबिक इसे बनाने में 1,011 करोड़ रुपये की लागत आएगी.
  • हालांकि इससे पहले जिन अन्य 6 एम्स को मरीजों के लिए खोला जा चुका है, वह सुविधाओं की कमी और उपकरणों के अभाव से जूझ रहे हैं. 
  • आलोचकों की माने तो पहले से घोषित किए गए एम्स को पूरी तरह से चालू होने में करीब दशक भर से अधिक का समय लगेगा.

पिछले शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) की आधारशिला रखी. एक अनुमान के मुताबिक इसे बनाने में 1,011 करोड़ रुपये की लागत आएगी. गोरखपुर में एम्स बनने के बाद इस इलाके के लोगों को दिल्ली या फिर रायबरेली के एम्स में जाने की जरूरत नहीं होगी.

लेकिन नए एम्स को शुरू करने का विचार कितना सही है?

सरकार द्वारा एम्स की संख्या बढ़ाए जाने की घोषणा से यह लग रहा है कि देश के हर कोने में रह रहे मरीजों की पहुंच अस्पतालों तक है.

2006 में सरकार ने भोपाल, रायपुर, भुवनेश्वर, पटना, जोधपुर और ऋषिकेश में एम्स बनाए जाने की घोषणा की थी. 2014 में आंध्र प्रदेश के मंगलगिरी, पश्चिम बंगाल के रायगंज, महाराष्ट्र के विदर्भ और उत्तर प्रदेश के रायबरेली में भी एम्स शुरू किए जाने की घोषणा की गई. 

2016 में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडु, बिहार, हिमाचल प्रदेश और असम वैसे राज्य रहे जिन्हें एम्स देने का वादा किया गया. अभी तक कुल 16 नए एम्स की घोषणा की जा चुकी है.

बजट

प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक 2009 के बाद से हर साल एम्स और एम्स के जैसे स्वास्थ्य केंद्र को बनाने के लिए 800 करोड़ रुपये का बजट रखा गया.

लेकिन उसके बाद से 10 ऐसे और संस्थानों की घोषणा की जा चुकी है और पिछले साल इस मद का बजट 800 करोड़ रुपये से बढ़कर 2,156 करोड़ रुपये हो गया. यह प्रत्येक संस्था को दिए जाने वाले औसत पूंजी से इतर रकम थी. 2006 में छह नए एम्स की घोषणा की गई थी और प्रत्येक के लिए 150 करोड़ रुपये की औसत रकम आवंटित की गई थी.

अभी तक इन्होंने किस तरह का प्रदर्शन किया है, यह जानना जरूरी है.

एम्स भुवनेश्वर

एम्स भुवनेश्वर अपने आप में चौंकाने वाली कहानी है. पूर्ववर्ती यूपीए और मौजूदा एनडीए दोनों ही सरकारों के स्वास्थ्य मंत्री ने भुवनेश्वर के एम्स का दौरा किया. भुवनेश्वर एम्स अभी भी सुविधाओं के अभाव का सामना कर रहा है और यह पूरी तरह से चालू नहीं हो सका है.

2013 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन ने भुवनेश्वर एम्स को 2015 तक पूरी तरह क्रियाशील बनाने का आश्वासन दिया था. मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने फिर से इसका दौरा किया और उन्होंने कहा कि सभी कामों को 2016 तक पूरा कर लिया जाएगा.

महीने की शुरुआत में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने कहा कि यह 2017 के अंत तक पूरी तरह से काम करने लगेगा. उनका भी वादा हवा हवाई होता नजर आ रहा है. स्थानीय रिपोर्ट की माने तो अभी भुवनेश्वर एम्स को पूरी तरह से चलाने के लिए काफी कुछ किए जाने की जरूरत है.

कुलस्ते ने इस एम्स के पहले यूनिट का उद्घाटन किया था और कहा था कि केंद्र सरकार निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए हर संभव उपाय करेगी. सरकार के मुताबिक करीब 650 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं लेकिन भुगतान रोके जाने की वजह से काम रुका पड़ा है.

संस्थान के निदेशक डॉ. अशोक मोहपात्रा ने भी लंबित कार्यों और उपकरणों के अभाव को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि भर्ती प्रक्रिया पर करीब 50 लाख रुपये खर्च किए जाने के बावजूद कोई डॉक्टर यहां आने को तैयार नहीं है. हालांकि केंद्र सरकार का आंकड़ा बता रहा है कि यहां के 90 फीसदी निर्माण कार्य को पूरा कर लिया गया है.

अन्य एम्स की भी यही कहानी है

प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना की तरफ से मुहैया कराए गए आंकड़ों के मुताबिक रायबरेली के एम्स परिसर में चल रहे रिहाइशी निर्माण का काम अभी जारी है. जबकि ओपीडी भवन का निर्माण कार्य पूरा किया जा चुका है.

एम्स भोपाल को ड्रेनेज की समस्या का सामना करना पड़ रहा है और निर्माण में देरी की वजह से इस परियोजना की लागत बढ़ चुकी है. 2009 के बाद से यह लागत दोगुनी हो चुकी है.

पटना के एम्स की यही कहानी है. प्रबंधन निर्माण कार्य में देरी का जिक्र कर चुका है और साथ ही उपकरणों की कमी भी सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है. इसकी पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर बनती है.

पटना, ऋषिकेश और भुवनेश्वर के डॉक्टरों ने बताया कि हर रोज यहां सैंकड़ों की संख्या में छोटे मोटे मरीज आ जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां इलाज सस्ता मिलेगा.

फैकल्टी समस्या

सबसे बड़ी समस्या इन संस्थानों में फैकल्टी की है. भुवनेश्वर और रायपुर में भर्ती प्रक्रिया को अपेक्षित रिस्पॉन्स नहीं मिला. इन संस्थानों में तय संख्या के मुकाबले आधी संख्या में भी कर्मचारी नहीं हैं.

पटना, रायपुर, भुवनेश्वर, भोपाल, जोधपुर और ऋषिकेश में औसतन 250 कर्मचारियों की कमी है. 

विशेष चिकित्सा केंद्रों की कमी

फिलहाल किसी तरह चल रहे 6 एम्स की घोषणा 2006 में की गई थी. इन सभी में अभी तक किडनी, हार्ट और सेंट्र्रल नर्वस सिस्टम से जुड़े विशेष चिकित्सा केंद्र नहीं शुरू हो पाए हैं. एम्स पटना और एम्स रायपुर में तो लेबर रूम और इमरजेंसी सर्विस सेंटर्स तक नहीं हैं.

जानकारों की माने तो इन छह एम्स को पूरी तरह से काम करने में दशक भर का समय लग जाएगा.

First published: 26 July 2016, 8:40 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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