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लाल किले से संदेश: क्या यह लोकसभा चुनावों की पूर्व भूमिका है?

आकाश बिष्ट | Updated on: 16 August 2016, 13:37 IST
(कैच न्यूज)

भारत के 70वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित किया, पर वह उतना दमदार नहीं था. दरअसल वे अपने 110 मिनट लंबे भाषण में, अपनी सरकार की उपलब्धियां ही गिनाते रहे, और कश्मीर में हिंसात्मक अशांति, उत्तर पूर्व और नक्सल प्रभावित क्षेेत्रों में हाल में बढ़ी हिंसा और अन्य अत्यावश्यक मुद्दों को टाल गए, जिन पर उनका ध्यान जाना आवश्यक था.

बजाय इसके उन्होंने फिर से पाकिस्तान को घेरने के लिए बलूचिस्तान का पत्ता खेला और जैसी कि उम्मीद थी, मीडिया ने भाषण के दूसरे अंशों को अनदेखा करते हुए इसे उत्साह से लिया. 'मैं बलूचिस्तान, गिलगित, बलतिस्तान, और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के बारे में कुछ बोलना चाहता हूं. दुनिया देख रही है. पिछले कुछ दिनों में बलूचिस्तान, गिलगित, और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों ने मुझे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया है और इसके लिए मैं उनका आभारी हूं,' मोदी ने कहा. लेकिन उन्होंने भारत के हिस्से वाले कश्मीर के बारे में कुछ भी नहीं कहा.

आतंकियों को लेकर पाकिस्तान का रुख और राष्ट्रीय सुरक्षा पर मोदी ने बड़े ही अलंकारिक ढंग से कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद की मदद कर रहा है, जबकि पेशावर में स्कूली बच्चों की आतंकियों द्वारा हत्या को लेकर भारतीयों की प्रतिक्रिया उसके विपरीत थी. 'यह भारत की प्रकृति है. पर दूसरी ओर, उनकी तरफ देखें, जो आतंकियों को महामंडित करते हैं. किस तरह के लोग आतंकियों को महामंडित करते हैं? किस तरह के लोग हैं जो उत्सव मनाते हैं, जब लोग मारे जाते हैं?'

विडंबना यह थी कि वे यह उल्लेख करना भूल गए कि किस तरह केंद्र में उनकी सरकार और जम्मू-कश्मीर ने सुरक्षा बलों को आदेश दिए थे कि वे प्रदर्शनकारियों को बिना किसी हिंसक कार्रवाई के हैंडल करें. सुरक्षा बलों ने बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को अंधा और गोलियों से घायल कर दिया था. 50 से ज्यादा लोग कश्मीर में मारे गए, पर उनको पाकिस्तान में जो हो रहा है, उसकी चिंता थी. वे कश्मीरियों तक पहुंचने के इस अवसर का इस्तेमाल कर सकते थे, जबकि उन्होंने बलूचिस्तान का मुद्दा उठाया, जो भारत और भारतीयों के लिए मुश्किल से किसी मतलब का है.

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने ट्वीट किया, 'क्या प्रधानमंत्री ने गिलगित, बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का मुद्दा लाहौर में उठाया? क्या इसे राजनाथ और सुषमा ने इस्लामाबाद में उठाया? लाल किले से अंधराष्ट्रवाद.'

प्रधानमंत्री के बलूचिस्तान को लेकर हाल में सामने आए जुनून से तमाम अन्य लोग भी असहमत दिखे. पूर्व यूनियन विदेश मंत्री अमितेश गुप्ता ने ट्वीट किया, 'हम पाकिस्तान नहीं हैं. गिलगित, बलोच और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर प्रधानमंत्री किसी और दिन बोल सकते थे. अब मीडिया का सारा ध्यान उसी पर है.'

पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी बलोचिस्तान का जिक्र करने के लिए प्रधानमंत्री की आलोचना की और कहा कि यह किसी भी तरह से कश्मीर के मुद्दे में मदद नहीं कर सकता.

नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बढ़ती हिंसा को लेकर मोदी ने युवाओं से अपील की है कि वे माओवाद की राह छोड़कर मुख्यधारा में शामिल हो जाएं, 'माओवाद के वेश में, और आक्रामकता और आतंक के नाम पर मासूमों की हत्या का खेल खेला जा रहा है. मैं उन युवाओं से कहना चाहता हूं कि यह देश हिंसा को कभी सहन नहीं करेगा. यह देश आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा. यह देश आतंकवाद के सामने अपना सिर नहीं झुकाएगा. माओवाद के सामने कभी नहीं.'

लाल किले से दिए अपने पहले दो भाषणों की तरह प्रधानमंत्री ने इस बार कोई अहम घोषणा नहीं की और महज अपनी सरकार की उपलब्धियों पर रोशनी डालते रहे. जिस तरह वे पहले राष्ट्रवाद पर जोर-शोर से अपने भाषणों में बोला करते थे, इस बार नहीं बोले. उन्होंने अपनी सरकार के कार्यों को सामने इस तरह से रखा मानों 2019 के चुनावों की तैयारी कर रहे हैं.

प्रतिक्रिया

कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के संबोधन की कड़ी आलोचना की और उसे चुनावी सुर बताया. कांग्रेस नेता गुलाब नबी आजाद ने कहा, "यह पीएम या सीएम के स्तर का भाषण नहीं था, बहुत कमजोर था. उनके संबोधन में कुछ भी खास बात उभर कर नहीं आई, जब वे अपनी सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे, उन्होंने कहा कि वे किस तरह आम आदमी के जीवन को बदलने के लिए प्रतिबद्ध हैं. जैसा कि अनुमान था, अन्य बातों के साथ गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स, सरकार की कार्य संस्कृति, बिजनेस करने में आसानी, गरीबों को सेवाएं मुहैया कराने, सामाजिक न्याय, अच्छा प्रशासन, सड़कें, ऊर्जा, आधार कार्ड, मुद्रा स्फीति, शौचालय आदि का जिक्र उन्होंने अपने संबोधन में किया.

जेएनयू विवाद, दलितों पर अत्याचार, संस्थाओं पर आक्रमण, बढ़ती असहिष्णुता और अपनी खुद की पार्टी के नेताओं के नफरत भरे भाषण जैसे मुद्दों को जिस असंवेदनशीलता के साथ उनकी सरकार ने हैंडल किया था, उनको अनदेखा करते हुए मोदी ने कहा, 'सरकार को संवेदनशील और उत्तरदायी होना चाहिए.

ऐसा लगा कि अपने 'चुनावी जुमलों' के लिए सोशल मीडिया पर खासे लोकप्रिय प्रधानमंत्री की नजरें अभी से 2017 के विभिन्न विधानसभा चुनावों और 2019 के आम चुनावों पर टिकी हैं. उनके कार्यकाल की लगभग आधी अवधि पूरी हो रही है, ऐसे में मोदी जानते हैं कि अपनी उपलब्धियों को गिनाने से उन्हें वोट मिलेंगे और प्रधानमंत्री कार्यालय में फिर बैठनेे का मौका. इस बार का लाल किले से प्रधानमंत्री का संबोधन लोकसभा चुनाव की पूर्व भूमिका सरीखा था."

First published: 16 August 2016, 13:37 IST
 
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