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सिक्कों की बजाय टॉफ़ी पकड़ाने वाला भारत अभी कैशलेस के लिए तैयार नहीं

पलाश कृष्ण मेहरोत्रा | Updated on: 7 February 2017, 8:13 IST
(गेटी इमेजेज़)

मुझे नहीं मालूम, नोटबंदी सही है या गलत लेकिन उसका काफी व्यापक असर हुआ है. फिलहाल नहीं कह सकते कि विभिन्न सेक्टरों पर इसका कितना स्थाई असर रहेगा. हाल में मैंने चार छोटे-बड़े शहरों का जायजा लिया. मुझे नोटबंदी के एक महीने बाद भी कैशलेस जैसी व्यवस्था कहीं नहीं दिखाई दी. सभी नकद लेन-देन चाहते हैं. 

मैं समझता हूं, एक कारोबारी के लिए उसका कारोबार अहमियत रखता है. एक दिन की भी ढील हुई कि पैसा नहीं मिलेगा. अगर आप सोचते हैं कि सभी अपने स्मार्टफोन से पेटीएम या मोबाइल के अन्य एप से भुगतान करना शुरू कर देंगे, तो आप गलत हैं. देहरादून में मेरा पड़ोसी पंसारी अब भी नकद खरीद-फरोख्त कर रहा है. मेरे पास एयरटेल वॉलेट और पेटीएम दोनों हैं, पर एक बार भी उनका इस्तेमाल नहीं किया.

कैश दें, वर्ना घर जाएं

लगता है, मध्यम श्रेणी का भारतीय मौसम की मार झेल लेगा, पर कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर जल्दी से रुख नहीं करेगा. गैर उबेर टैक्सी चालकों, ऑटो चालकों और घर के छोटे-मोटे कारोबारी उसे मजबूरी में नहीं अपना रहे. कैशलेस को भूल जाएं. 2000 के खुले नहीं होने से बिक्री कम हो रही है. पर इससे छोटे दुकानदार परेशान नहीं हैं. वे पहले से कम ब्रेड, कॉर्नफ्लैक्स, और हल्दी बेच रहे हैं. कहते हैं, चलने दो. जब तक पूरा पैसा नहीं देंगे, आपको अंडे नहीं मिलेंगे.

गोवा में टैक्सी संघ ने बड़ी चतुराई से उबेर जैसे एप्स को बाहर रख दिया. ओला किसी तरह बाजार में घुस गई है, पर ज्यादा नहीं है. आप ज्यादा पैसे देकर भी पंजिम से बागा बीच कैब में जाएंगे. टैक्सी चालक तो आपसे सिर्फ 100 रुपए नकद मांग रहा है. कैश नहीं दे पाएंगे, तो नहीं ले जाएगा. किसी और सवारी का इंतजार कर लेगा. मैंने पूछा -वॉलेट? उसने अपना सिर हिला दिया. मतलब, नहीं ले जाएगा.

मोदी ने कैशलेस के जुनून में शायद भारतीयों को कम आंका कि भारतीय परिवर्तन के विरोधी हैं. ऐसा नहीं है कि भारतीय नहीं बदलना चाहते, पर ज्यादा परिवर्तन नहीं चाहते. रतन टाटा ने नैनो के साथ यही बड़ी गलती की. उन्होंने सोचा, चार सदस्य वाले भारतीय परिवार को सस्ती कार देंगे, तो वे स्कूटर और मोटरसाइकिल पर जाना छोड़ देंगे. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. वे अपने पूरे परिवार को दो पहिए वाली गाड़ी पर ले जा रहे हैं, चाहे ओला, बारिश, सर्दी, लू, कुछ भी हो.

यह तर्क दिया कि दो से ज्यादा चार पहिए स्थाई हैं...कि खुले खराब पर्यावरण में घूमने से ज्यादा वातानकुलित कार बेहतर है. इसी तरह कई भारतीय अपने स्मार्टफोन पर अश्लील चीजें तो देखेंगे, पर एप डाउनलोड करना या इ-वॉलेट इस्तेमाल करना नहीं चाहेंगे. 

मोदी की कार्य प्रणाली विफल

गोवा के सरायों में स्वाइप मशीनें नहीं हैं. बांद्रा में क्वेंच मयखाने के बाहर, मैं सिगरेट खरीदना चाहता हूं. खुले के अभाव में मुझे 6 पैकेट खरीदने पड़ेंगे, जिसका बिल 700 रुपए होगा. यही नहीं, 2000 के खुल्ले करवाना भी मुसीबत थी. बेचने वाले से झड़प हो गई. अंतत: मैं 2000 के खुल्ले करवाने में सफल रहा. यह पहली बार हुआ. मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. 

दिल्ली में, एक फार्महाउस पार्टी में किसी ने मुझे बताया कि नोटबंदी के बाद एक कोकेन विक्रेता घर पर स्वाइप मशीन लेकर आ गया. बिल पर लिखा था-अग्रवाल स्वीट्स. लगता है, जैसे कैशलेस अर्थव्यवस्था को नशीली दवाओं के उत्पादक संघ ने मंजूरी दे दी है. दिल्ली के डोमिनेट्रिक्स और उनके दलाल ने कुछ समय पहले ऐसा ही किया था.

मुंबई में मैं एक मित्र के पास रुका था. उसने एक पंसारी को फोन किया. उसका आदमी दाल-चावल और 387 का बिल लेकर आया. मेरे मित्र ने 2000 का नोट देना चाहा. उसने कहा, आप ही रखो. मेरे मित्र ने कहा: उधार? 2000 रुपए के करीब का सामान हो जाएगा, तब पैसे दे दूंगा. लडक़ा सामान लेकर वापस चला गया, उसके मालिक के यही निर्देश थे.

मोदी ने ऐसा नहीं सोचा था. दुकानदार कह रहे हैं: ठीक है, हम कम बेच लेंगे. हम घाटा खा लेंगे. देखते हैं, आप कितने दिन रोजमर्रा की चीजों के बिना रह सकते हैं. पर हम कैशलेस नहीं होंगे.

इस बीच बदकिस्मत थके-मांदे भारतीयों ने बैंक और एटीम के बाहर लाइन में खड़ा होना जीवन का हिस्सा बना लिया है. बिजली की कटौती, वायु प्रदूषण, मौसमी बुखार और कोहरे के साथ यह एक और समस्या जुड़ गई, जिससे निजात पाना है. 

चिल्लर नहीं है, टॉफी ले जाइए

मुझे मालूम है, नोटबंदी से सबसे ज्यादा तकलीफें गरीबों को हुई हैं. पर मैं शहरी हूं, मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार से हूं. हमेशा कैशलेस लेन-देन के पक्ष में रहा हूं. आप कोई मकान बेचते हैं, तो कैश से भरे ब्रीफकेस का क्या करें, मालूम नहीं. आप अपनी जमीन व्हाइट में बेचते हैं और पाते हैं कि खरीदार ने उसे किसी को दस गुना मूल्य में ब्लैक में बेची थी. आप अपने खरे व्हाइट मनी के साथ क्या कर सकते हैं. आप पर बाजार से बाहर कीमत लगाई गई.

भारत अजीब दुकानदारों का देश है. ये बेशरम है, जिन्होंने टॉफी की अर्थव्यवस्था बना ली. आपने कुछ खरीदा, और दुकानदार के पास चिल्लर नहीं हुई, तो वह उसके बदले में टॉफी थमा देगा. पर आप उन्हें करेंसी की जगह टॉफी नहीं दे सकते. मैंने सोचा कि फोन से मनी ट्रांसफर करने से यह सिलसिला खत्म होगा. यही चिंता मेहनतकश मध्यम वर्ग की है. अंत में ऑटो सवार 40 रुपए खुले रख लेगा. अन्नानास की पेस्ट्रीज बेचने वाला मोटा शख्स दस रुपए की जगह जल्दी से नारेंगी वाली टॉफी देगा.

अब यह हो गया है कि मिठाई वाला करेंसी के रूप में टाफियां ज्यादा बांटेगा. वह भुगतान का कोई और जरिया नहीं अपनाएगा. गिफ्ट के दुकानदारों ने अपने सामान पर लगे पीले स्टिकर बदल दिए और मनमाने दाम बढ़ा दिए. डॉक्टर ने अपना परामर्श शुल्क बढ़ा दिया, ट्यूटर ने मासिक ट्यूशन फीस. वह कैशलेस होने के लिए अगरबत्ती जलाकर लक्ष्मी से प्रार्थना नहीं करता. उनके नजरिए से सोचें. वह भुगतान नहीं करेगा. वह आपको भुगतान के लिए बाध्य करेगा. 

First published: 19 December 2016, 7:47 IST
 
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