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देश के 10 मदरसे जहां पढ़ाई अब सेटेलाइट लिंक से होगी

फ़ैसल फ़रीद | Updated on: 26 September 2016, 15:52 IST
(फ़ाइल फोटो )
QUICK PILL
  • एक तरफ़ सोमवार को इसरो के श्रीहरिकोटा केंद्र से पीएसएलवी-35 का सफ़ल प्रक्षेपण हुआ. पीएसएलवी ने सफ़लतापूर्वक सात उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित कर दिया है. 
  • दूसरी तरफ़ देश में संचालित मदरसों को आधुनिक बनाने के लिए एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया गया है. इसके तहत 10 मदरसे के छात्रों को सेटेलाइट लिंक के ज़रिए शिक्षा दी जाएगी.

हमेशा इल्ज़ाम लगता है कि देश में संचालित मदरसे ख़ुद को मुख्यधारा से जोड़ने में हिचकिचाते हैं लेकिन आधुनिक शिक्षा पाने के लिए उनमें बदलाव की ललक दिखने लगी है. मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के कुलपति ज़फ़र सरेशवाला की पहल पर 10 मदरसों ने ख़ुद को सेटेलाइट से जोड़ने पर मंज़ूरी दे दी है. अब सेटेलाइट के ज़रिए  पेशेवर शिक्षक मदरसों के बच्चों को तालीम देंगे.

कैच न्यूज़ से ख़ास बातचीत में ज़फ़र सरेशवाला ने कहा, ' मदरसों में तालीम और ट्रेनिंग पूरी तरह धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है. यहां पढ़ने वाले बच्चे नि:संदेह अक्लमंद होते हैं लेकिन उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा के बारे में उन्हें पता नहीं होता जो उनकी नौकरी या करियर में मददगार बन सकती है. हम अभी सिर्फ़ प्रयोग कर रहे हैं और देश के अलग-अलग हिस्सों से 10 मदरसों को इससे जोड़ा है मगर इस प्रोजेक्ट से देश का कोई भी मदरसा जुड़ सकता है.' 

इस प्रोजेक्ट में तीन समूहों के बीच समझौता किया गया है. इनमें मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्याल, सेटेलाइट लिंक मुहैया करवाने वाली कंपनी और संबंधित मदरसे. 10 चुने गए मदरसों में तीन उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, सम्भल और देवबंद के हैं. इनके अलावा दिल्ली, मुुंबई, बिहार और गुजरात के मदरसों को भी सेटेलाइट लिंक से जोड़ा जाएगा. 

पड़े रह गए 100 करोड़

पेशेवर टीचर मुंबई से सेटेलाइट के ज़रिए इन मदरसों के बच्चों की कक्षाएं लेंगे. मदरसों में सेटेलाइट का ढांचा विकसित करने का ख़र्च ज़फर सरेशवाला उठाएंगे. उन्होंने कहा, 'हम सर्वश्रेष्ठ टीचरों को हायर करेंगे और मदरसा छात्रों को मुख्यधारा के बच्चों की क़तार में ला खड़ा करेंगे. हम उन्हें मेडिकल और इंजिनियरिंग की प्रवेश परीक्षा पास करने के लिए विशेष कोचिंग देंगे.' उन्होंने यह भी कहा कि 'मदरसा आधुनिकीकरण' अब लोकप्रिय मुहावरा बनकर रहा गया है. ज़मीनी स्तर पर कुछ काम नहीं हुआ और इस मद में आवंटित किए गए 100 करोड़ रुपए बिना ख़र्च के पड़े हैं. 

बहरहाल, देशभर में संचालित मदरसों में दी जाने वाली मज़हबी तालीम का कोई एकसमान पैटर्न नहीं है. इनमें ज़्यादातर अपना-अपना पैटर्न चलाते हैं. कुछ राज्यों में मदरसा डिग्री को मान्यता देने के लिए बोर्ड भी हैं लेकिन मदरसा प्रबंधन आंतरिक मामलों में सरकार दख़लअंदाज़ी नहीं चाहता. मदरसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम के दायरे में भी नहीं आते. ज़फर कहते हैं, 'हम इन मदरसों से सिर्फ़ मस्जिदों के लिए इमाम पैदा कर पा रहे हैं. इनकी डिग्रियों को कोई भी बोर्ड मान्यता नहीं देता और ये हमेशा बेरोज़गार रहते हैं. इन्हें अपने दरवाज़े आधुनिक शिक्षा के लिए खोलने ही होंगे'

First published: 26 September 2016, 15:52 IST
 
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