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दो साल भगवाराज: दक्षेस देशों में कितनी दक्ष रही नरेंद्र मोदी की विदेश नीति

सत्यब्रत पॉल | Updated on: 23 May 2016, 23:50 IST
(एएफपी)

पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार मई 2013 में चुनाव के द्वारा सत्ता परिवर्तन हुआ. चुनाव जीतने के बाद नवाज शरीफ ने कहा कि वो शपथ ग्रहण में भारतीय पीएम को बुलाएंगे. हालांकि ऐसा हो नहीं सका.

उसके एक साल बाद भारत में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. उन्होंने अपने शपथ ग्रहण में पाकिस्तानी पीएम सहित सभी दक्षेस देशों के प्रमुखों को बुलाया. बांग्लादेश की शेख हसीना को छोड़ सभी पड़ोसी नेता आए भी.

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के सीएम थे तब उनकी विदेश नीति संबंधी बयानों को बहुत समझदारी भरा नहीं माना जाता था. ऐसे में जब उन्होंने अपने शपथ ग्रहण में दक्षेस देशों के प्रमुखों को बुलाया तो इसे मास्टर-स्ट्रोक माना गया.

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हालांकि उस नियंत्रण पर कुछ सवाल भी खड़े किए गए. कुछ आलोचकों के अनुसार मोदी के रवैये में खुद को दक्षेस देशों के क्षत्रप के रूप में पेश करने की मंशा छिपी हुई थी.

नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेश देशों के सभी प्रमुखों को बुलाया था

साथ ही मारिशस के नेता नवीन रामगुलाम को शपथ ग्रहण में बुलाने पर भी सवाल उठा. जबकि मारिशस न तो दक्षेस में है, न ही इसका पड़ोसी है.

भारत और नेपाल के बाद सबसे बड़ी हिंदू आबादी मारिशस में है. ऐसे में माना गया कि मोदी ने रामगुलाम को बुलाकर संकेत देने की कोशिश की थी.

ये एक अनोखी शुरुआत थी लेकिन उतनी भी नहीं जितनी मोदी के प्रशंसक इसे बताते हैं. मोदी वही कर रहे थे जो उनसे पहले के पीएम कर चुके थे.

भले ही कोई भारतीय पीएम मोदी जैसा नाटकीय न हो लेकिन राजीव गांधी, आईके गुजरात, अटल बिहारी वाजपेयी या मनमोहन सिंह ने भी पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बहाल करने की दिशा में गंभीर कोशिशें की थी.

विदेश नीति में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है. लेकिन नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण के दो साल बाद आज भारत का एक ही देश बांग्लादेश से अच्छा संबंध है. जबकि वहां की पीएम उनके शपथ ग्रहण में नहीं आई थीं.

नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर पड़ोसी देशो के साथ भारत के संबंधों की समीक्षा करना समीचीन होगा.

बांग्लादेश

हालिया विधानसभा चुनाव में बीजेपी को असम चुनाव में जीत मिली है. वहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने वापसी की है. असम में बीजेपी के सीएम सर्बानंद सोनोवाल हिंदुत्व का नया चेहरा हैं. इससे पहले वो तब चर्चा में आए थे जब 2005 में वो बांग्लादेशी शरणार्थियों का मामला लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे.

उन्होंने कोर्ट से मांग की थी कि शरणार्थियों को "विदेशी अतिक्रमणकारी" घोषित किया जाए ताकि केंद्र का ये दायित्व बन जाए कि वो राज्यों को इससे बचाए. (भला ये हुआ कि कोर्ट ने केंद्र को पूर्वोत्तर से शरणार्थियों को बाहर करने का आदेश नहीं दिया.)

अब सोनोवाल खुद सीएम बन गए हैं तो उन्हें इन 'विदेशी अतिक्रमणकारियों' को बांग्लादेश वापस भेजना होगा. उन्होंने कहा कि दो साल लगेंगे. उसके बाद राज्य की सीमा को सील कर दिया जाएगा. अब देखना है कि नरेंद्र मोदी इसमें उनकी कितनी मदद करते हैं.

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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने जलपाईगुड़ी को छोड़कर तीस्ता नदी के मैदानी इलाके में लगभग सभी सीटें जीत लीं. इसलिए ममता बनर्जी तीस्ता नदी से बांग्लादेश को पानी देकर अपने वोटरों को नाराज नहीं करना चाहेंगी.

नरेंद्र मोदी को बांग्लादेश के शरणार्थियों और तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे के मुद्दे से निपटना होगा

बांग्लादेश को तीस्ता से पानी देने का समझौता कांग्रेसनीत यूपीए ने किया था.

इस चुनाव में कांग्रेस पश्चिम बंगाल में तृणमूल के खिलाफ लेफ्ट के साथ मिलकर लड़ी थी. इसलिए कांग्रेस सरकार के फैसले को ममता की मंजूरी मिलना और भी कठिन हो जाएगा. अगले कुछ समय में मोदी के लिए बांग्लादेश से जुड़े इन दोनों मुद्दों से निपटना होगा. जो उनके लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकते हैं.

शेख हसीना बांग्लादेश के 1971 के मुक्ति संग्राम के लिए जिस तरह इस्लामी नेताओं पर मुकदमा चलवाकर सजा दिलवा रही हैं उसके पीछे न्याय दिलाने से ज्यादा चुनावी राजनीति का संबंध है. वो भी बीजेपी के कुछ नेताओं की तरह देश में ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही हैं. ये अलग बात है कि जिन लोगों को दी गई वो सभी पूरी तरह इसके हकदार थे.

इन सजाओं के खिलाफ बांग्लादेशी चरमपंथियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. बांग्लादेश पर एक बार फिर 1971 जैसी आंतरिक हिंसक गुटबाजी के हालात पैदा होने का खतरा है. बांग्लादेश में नास्तिकों, एलजीबीटी एक्टिविस्ट, चरमपंथियों के आलोचकों की हत्याएं 1971 जैसे माहौल की झलक दे रही हैं.

अगर बांग्लादेश के आतंरिक हालात काबू से बाहर हुए तो शेख हसीना के लिए ये एक अग्निपरीक्षा साबित होगी. अगर भारत ने असम से बांग्लादेशी शरणार्थियों को वापस भेजा तो हसीना की मुश्किल और बढ़ जाएगी.

श्रीलंका और मालदीव

इन दोनों पड़ोसी देशों को लेकर मोदी के सामने समस्या यह है कि इन्हें भारत के मुकाबले चीन हमेशा सहयोग देने को तैयार रहता है. श्रीलंका में युद्ध अपराध के मामले की निष्पक्ष जांच हो या फिर मालदीव में राजनीतिक विरोधियों के साथ किए जाने वाले बर्ताव का.

चीन अक्सर दोनों देशों को समर्थन देता रहा है. चीन इन देशों को पर्यटन और निवेश के मामले में उतनी मदद देता है जितना कि भारत नहीं दे सकता. पर्यटन की मालदीव की अर्थव्यवस्था में करीब 50 फीसदी हिस्सेदारी है.

मालदीव की कुल नौकरियों में पर्यटन की सीधे 50 फीसदी हिस्स्सेदारी है. पर्यटन की परोक्ष हिस्सेदारी को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 90 फीसदी तक हो जाता है.

2016 में मालदीव में 50 फीसदी पर्यटकों के चीनी होने का अनुमान है जबकि 3 फीसदी पयर्टकों के भारतीय होने का अनुमान है. श्रीलंका की हालांकि चीन पर उस कदर निर्भरता नहीं है लेकिन भारत श्रीलंका के सामने कोई विकल्प नहीं पेश कर सकता.

नेपाल

पीटीआई

नेपाल हमेशा से हिंदुत्व का प्यारा रहा है. हिंदू राष्ट्र होने की वजह से दूसरे को परेशानी हो सकती है लेकिन नागपुर में बैठे लोगों को यह पता है कि क्षेत्री नेपाल में वहीं कर रहे हैं जो भगवत गीता में कहा गया है. सभी जातियों को उनकी वास्तविक हैसियत का आभास हो. गीता में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि भ्रम की स्थिति आपको नर्क की तरफ ले जाती है.

अगर मोदी और भारत मधेसियों का साथ दे रहे हैं तो यह बात एकदम साफ है कि भारत पूरी तरह से गफलत में  है. जबकि नेपाल की पहाड़ी आबादी के मन में कोई संशय नहीं है. यहीं से चीन के नेपाल में घुसने की संभावना बढ़ती है. वैसे भी नेपाल जितने अच्छे तरीके से हिंदुत्व को समझता है वह बीजेपी की समझ सेे कहीं दूर है.

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ऐसा ही कुछ पाकिस्तान के साथ है. मोदी का जो तूफान चल रहा है वह किसी एक झटके से खत्म हो सकता है. जब उन्होंने शरीफ जूनियर के साथ चाय पी तब सीनियर शरीफ ने पठानकोट में कुछ जिहादियों को भेज दिया. मोदी को वापस अपनी राह आना पड़ा.

फिलहाल पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद हो चुकी है. मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई गलतियां की है. मालदीव, नेपाल और श्रीलंका.

अगर पाकिस्तान की सीमा के साथ लगे इलाकों में कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो बचाव में लगे कार्यकर्ताओं और अधिकारियों को प्राकृतिक भूभाग में हुए बदलाव की तस्वीर अपलोड करने से पहले लाइसेंस लेना होगा क्योंकि मोदी ने जियोपैलेस्टियल इंफॉर्मेशन रेग्युलेशन बिल में ऐसे प्रावधान कर दिए हैं. यह उन कई गलतियों में से एक है.

पाकिस्तान

पीटीआई

इस्लामाबाद ने संयुक्त राष्ट्र्र को वहीं आपत्ति दर्ज कराई है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, हम इसे खारिज कर सकते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि भारत की सीमा जिन पड़ोसी देशों से लगती है उसे पूरी तरह से चिह्नित नहीं किया गया है. विशेष रूप से मणिपुर और म्यांमार की सीमा और कालापानी और सुस्ता सीमा पर नेपाल से जुड़ाव.

जहां से बांग्लादेश के साथ हमारी सीमा शुरू होती है, उसमें समुद्री सीमा और स्थलीय सीमा आपस में इस कदर उलझी हुई हैं कि इसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं है. बिल बनाने वाले लोगों के दिमाग में पाकिस्तान और चीन की सीमाएं तो थी लेकिन उन्हें बांग्लादेश और म्यांमार जैसे छोटे देशों की याद नहीं थी जिन्हें चीन इस्तेमाल कर सकता है.

पड़ोसियों के प्रति भारत की असंतुलित नीति से आस-पड़ोस में गलत संदेश जा सकता है. ऐसे में मोदी क्या कर सकते हैं. वह एक और देश की यात्रा कर सकते हैं, शायद सोमालिया की जिनके बारे में शायद उनका ज्ञान काफी अच्छा है, इसकी ताकीद हमारे मलयाली दोस्त करेंगे.

First published: 23 May 2016, 23:50 IST
 
सत्यब्रत पॉल @Catchhindi

लेखक पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त रह चुके हैं.

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