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चंद्रशेखर आजाद को पीएम की श्रद्धांजलि आरएसएस की नेहरू को बदनाम करने की योजना का हिस्सा: चमन लाल

चारू कार्तिकेय | Updated on: 15 June 2016, 8:12 IST

13 जून को इलाहाबाद में एक अजीब घटनाक्रम सामने आया. समाजवादी पार्टी पर हमला करने और क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि देने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को इस बात का एहसास हुआ कि वह एक समाजवादी नेता पर हमला करते हुए दूसरे क्रांतिकारी नेता को श्रद्धांजलि दे रहे हैं. हालांकि यह विंडबना यही खत्म नहीं हुई. 

मोदी का चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि देना यह बताता है कि बीजेपी और संघ की जुगलबंदी ने एक नया नायक खोज लिया है, जिससे वह अभी तक बचते रहे थे. 

इलाहाबाद में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जाने के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने चंद्रशेखर आजाद पार्क जाने का फैसला लिया. इसके बाद उन्होंने के पी कॉलेज ग्राउंड में रैली को संबोधित किया.

आजाद पार्क जाने और श्रद्धांजलि देने की तस्वीर को प्रधानमंत्री ने ट्वीट भी किया. इसी पार्क में आजाद ने अंग्रेजी हुकूमत की पुलिस से घिर जाने के बाद खुद को गोली मार ली थी. भगत सिंह के बाद आजाद दूसरे बड़े स्वतंत्रता सेनानी है, जिसे बीजेपी ने अपनाया है.

आजाद, हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे. इस संगठन की स्थापना राम प्रसाद बिस्मिल ने की थी. बाद में इससे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जुड़े और इसका नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हो गया.  

संगठन का मकसद साम्यवादी सिद्धांतों के मुताबिक आजाद भारत का निर्माण करना था. तो फिर बीजेपी और आजाद के बीच क्या संबंध है? मोदी द्वारा आजाद को श्रद्धांजलि दिए जाने की क्या जटिलताएं हैं? इसे समझने के लिए कैच ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल से बात की.

पीएम मोदी ने इलाहाबाद में आजाद पार्क जाकर चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि दी

प्रधानमंत्री द्वारा चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि दिए जाने को आप कैसे देखते हैं?

जहां तक मैं समझता हूं कि देश के प्रधानमंत्री स्वाभाविक तौर पर देश के एक बड़े क्रांतिकारी नायक को श्रद्धांजलि देना चाहेंगे. लेकिन बीजेपी के नेता की तरफ से ऐसा किया जाना महज दिखावा है.

आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?

क्योंकि बीजेपी आरएसएस का चेहरा है और इसके नेताओं का आजादी के आंदोलन में कोई भूमिका नहीं रही है. वास्तव में आरएसएस के नेता वीडी सावरकर और एमएस गोलवलकर ने आजादी के आंदोलन के नायकों विशेषकर क्रांतिकारियों की आलोचना की थी.

अगर मोदी वास्तव में आजाद को नमन करना चाहते हैं तो उन्हें उनकी समाधि स्थल पर जाना चाहिए. यही परंपरा है. अगर उनके मन में आजादी के नायकों के प्रति वाकई में सम्मान है तो उन्हें कमला नेहरू, विजय लक्ष्मी पंडित और रोशन सिंह समेत अन्य क्रांतिकारियों की समाधि पर भी जाना चाहिए.

तो फिर इन नायकों में से केवल आजाद को श्रद्धांजलि देने का क्या मतलब है?

अगर किसी को श्रद्धांजलि दी जानी थी तो वह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू होते. नेहरू भी इलाहाबाद से आते हैं और बेहतर होता अगर मोदी उनके घरवालों से मिलते. हालांकि उन्होंने ऐसा नहीं किया और इसके बदले उन्होंने आजाद को चुना. इसका कारण यह है कि आरएसएस, नेहरू के खिलाफ घृणा से भरा हुआ है. वह राष्ट्रीय राजनीति में नेहरू के कद को घटाना चाहते हैं.

वास्तव में आरएसएस के समर्थक सोशल मीडिया पर अक्सर नेहरू के खिलाफ घृणास्पद कैंपेन चलाते हैं. वह कहते हैं कि नेहरू ने ही आजाद के बारे में पुलिस को जानकारी दी थी. यह ऐसा झूठ है जिसे नेहरू के बारे में फैलाया गया है.

क्या आप आजाद की जिंदगी और संघ परिवार के विचार के बीच कोई संबंध देखते हैं, जिसकी वजह से संघ आजाद को अपना नायक बनाने की कोशिश कर रहा है?

बिल्कुल भी नहीं. आजाद धर्मनिरपेक्ष थे और भगत सिंह भी. दोनों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी को हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में बदला. उनका एक साम्यवादी एजेंडा था और यह निश्चित तौर पर सांप्रदायिकता के खिलाफ था.

वास्तव में दोनों से जुड़ा कोई भी दस्तावेज धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है. आजाद उदार थे और अगर वह धार्मिक भी थे तो उनकी जिंदगी का निजी मामला था. उनके साथ अशफाक उल्लाह जैसे मुस्लिम कामरेड भी थे.

यहां तक की उनकी बातचीत में जाति का भी जिक्र नहीं मिलता है. इसलिए इन्हें संघ से नहीं जोड़ा जा सकता जो पारंपरिक तौर पर सवर्ण जाति की राजनीति करता है.

क्या आपको इसमें कोई पैटर्न नजर आता है कि बीजेपी उन्हीं आजादी के नायकों से खुद को जोड़ रही है जो महात्मा गांधी, नेहरू या पटेल आदि जैसे मुख्यधारा की नेताओं से अलग हो गए? इसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और अब आजाद जैसे नेता शामिल हैं.

यह बीजेपी और आरएसएस के लिए शर्मनाक स्थिति है. आरएसएस की आजादी के लड़ाई में कोई भूमिका नहीं रही है. सावरकर और गोलवलकर ने खुलेआम क्रांतिकारियों की आलोचना की. क्या उन्होंने अपने मुखपत्र में कभी भगत सिंह और आजाद के बारे में लिखा है? वह शहादत का बस अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. नेहरू के उत्तर आधुनिकता के मुकाबले वह भारत को पूर्व आधुनिकता के अंधेरे में धकेलना चाहते हैं.

First published: 15 June 2016, 8:12 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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