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'जनता के भरोसे और अपनी प्रतिष्ठा के लिये प्रधानमंत्री को डिग्री की सच्चाई बतानी चाहिए'

आशुतोष | Updated on: 9 May 2016, 8:15 IST
QUICK PILL
  • आप नेता आषुतोष के मुताबिक प्रधानमंत्री की बीए और एमए की डिग्रियां असली हैं या जाली इसको लेकर गहरा संदेह है.
  • आम आदमी पार्टी की मांग है कि नरेंद्र मोदी स्वयं ही आगे आकर दस्तावेजों को सार्वजनिक कर तमाम अफवाहों और अटकलों को विराम दे दें.

1990 के दशक के दौरान जब मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा ही था उन दिनों मैं अमरीकी राष्ट्रति बिल क्लिंटन के आसपास घट रहे घटनाक्रम को लेकर बहुत उत्साहित हुआ था. वे युवा, सुंदर, ऊर्जावान, करिश्माई और समझदार थे. अरकंसास जैसे छोटे राज्य से आने के बावजूद उन्होंने राष्ट्रपति के पद के लिये होने वाले चुनाव को पूरी ताकत से लड़ा और राष्ट्रपति जाॅर्ज बुश सीनियर को पटखनी दे दी.

अपने दूसरे कार्यकाल में यह युवा व्हाइट हाउस की ही एक युवा इंटर्न मोनिका लेविंस्की के साथ एक सेक्स स्कैंडल में फंसा जो दुनियाभर में सुर्खियां बना.

कांग्रेस में क्लिंटन के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई प्रारंभ की गई लेकिन वह शीर्ष कार्यालय में उनके ‘‘अनुचित व्यवहार’’ के लिये न होकर ‘‘झूठे साक्ष्यों’’ के लिये थी. यानि कि राष्ट्रपति पर आरोप था कि उन्होंने कुर्सी पर बैठने के दौरान खाई गई कसम को भुलाते हुए इस घटना को जांचकर्ताओं से सच छिपाया और झूठ बोला.

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साफ था कि अमरीकी सांसदों की नजर में राष्ट्रपति द्वारा अपने पक्ष में पेश किये गए झूठे साक्ष्य उनके नैतिक अपराध की तुलना में कहीं अधिक घातक थे.

आज भारत में भी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों का निर्माण हो रहा है और इसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को कसौटी पर परखेगा.

अरविंद ने साफ तौर पर कहा कि उन्हें खुद के बारे में जानकारियां सार्वजनिक करने से कोइ परेशानी नहीं है 

इस समय सवाल यह उठ रहा है कि हमारे प्रधानमंत्री की बीए और एमए की डिग्रियां असली हैं या जाली? यह सवाल विशेष रूप से वर्ष 2014 में जब उन्हें बीजेपी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तभी से उठने लगा था.

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इस पहेली का हल तलाशने के लिये दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय में कई आरटीआई भी दाखिल की जा चुकी हैं और दोनों ही संस्थानों ने इस मामले में किसी भी आरटीआई आवेदन को स्वीकारने से साफ इंकार कर दिया है. मोदी ने कथित रूप से इन दोनों ही संस्थानों से अपनी बीए और एमए की पढ़ाई पूरी की है.

स्थिति ने तब एक नाटकीय मोड़ लिया जब इस मामले से किसी भी प्रकार से संबंध न रखने वाले मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से पूछा कि क्यों न एक विधायक के रूप में उन्हें सार्वजनिक संपत्ति की तरह देखा जाए और उनसे संबंधित तमाम सूचनाओं को आरटीआई के अंतर्गत सार्वजनिक किया जाए.

अरविंद ने साफ तौर पर कहा कि उन्हें खुद के बारे में जानकारियां सार्वजनिक करने से कोइ परेशानी नहीं है लेकिन क्या सीआईसी के पास ‘‘मोदी के खिलाफ भी ऐसा ही करने का साहस है.’’ उत्तेजना में आए सीआईसी ने प्रतिक्रिया स्वरूप दिल्ली और गुजरात विश्वविद्यालयों को मोदी की डिग्रियों से संबंधित जानकारी प्रदान करने के आदेश दिये.

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इसी दौरान प्रधानमंत्री कार्यालय को भी आदेश दिया गया कि वह जानकारी देने की प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद करने की दिशा में मदद करते हुए उनके रोल नंबर और डिग्री प्राप्त करने के वर्ष को साझा करे.

सीआईसी का आदेश आए हुए एक सप्ताह से भी अधिक का समय बीत चुका है लेकिन किसी भी विश्वविद्यालय ने जानकारी सामने लाने की दिशा में कोई सकारात्मक पहल नहीं की है. इस बीच दो समाचार पत्रों ने दोनों ही विश्वविद्यालयों से प्राप्त दो डिग्रियों को कथित तौर पर मोदी की बीए और एमए की डिग्री कहते हुए प्रकाशित किया.

हालांकि इन दोनों ही डिग्रियों की प्रमाणिकता संदेह के दायरे में है. बीए का प्रमाणपत्र मूल प्रतिलिपि न होकर कुलपति और रजिस्ट्रार द्वारा हस्ताक्षरित छायाप्रतिलिपि है. सांयोगवश इन दोनों ही अधिकारियों का रिकार्ड संदिग्ध रहा है और कुलपति 2002 में और रजिस्ट्रार 2012 में जालसाजी के मामलों में फंस चुके हैं.

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फिर मूल प्रतिलिपि का क्या हुआ? और क्या वजह है कि इस प्रमाापत्र पर हस्ताक्षर करने वाले कुलपति कह रहे हैं कि इस डिग्री से संबंधित अन्य रिकाॅर्ड को तलाशा नहीं जा सकता? यह सामान्य ज्ञान की बात है कि एमए में दाखिले के लिये किसी भी उम्मीदवार के पास पहले स्नातक की डिग्री होनी आवश्यक है.

पीएमओ डिग्री प्रमाणपत्रों की सुरक्षा और हिफाजत को लेकर चिंतित प्रतीत होता है और उसने इनके दुर्घटनावश खोने का संदेह जताया है

हैरानी की बात यह है कि बीए की डिग्री को प्रकाशित करने वाला अखबार उसकी प्रमाणिकता की जिम्मेदारी न लेते हुए इसे प्रधानमंत्री कार्यालय के हवाले से प्राप्त हुआ बता रहा है. यह सीआईसी की क्षमता और उसके आदेश की कानूनी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान उठाते हैं.

इसके अलावा पीएमओ डिग्री प्रमाणपत्रों की सुरक्षा और हिफाजत को लेकर चिंतित प्रतीत होता है और उसने इनके ‘‘दुर्घटनावश खोने’’ का संदेह जताया है. यह एक बड़ी स्टोरी थी लेकिन बिना किसी बाईलाइन के. इसके अलावा इस स्टोरी को अंदर के पन्नों में प्रकाशित किया गया था जबकि इसके महत्व को देखते हुए यह मुखप्रष्ठ पर प्रकाशित होने वाली खबर थी. ऐसा न होना भी और अधिक संदेहास्पद सवालों को जन्म देता है.

आप का आरोप: पीएम की बीए की डिग्री किसी दूसरे नरेंद्र मोदी की

इसके बाद इसके कुछ तकनीकी पहलू भी हैं. प्रमाणपत्र के ऊपर बायें कोने पर रोल नंबर अंकित होना चाहिये और इस मामले में वह अपठनीय है. और बिना ठीक रोल नंबर के विश्वविद्यालय के रिकाॅर्डस से मूल डिग्री को हासिल करना काफी टेढ़ी खीर है. और ऐसे में इसकी प्रमाणिकता को लेकर और अधिक संदेह पैदा होते हैं.

प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता को लेकर चल रहा विवाद एक बेहद गंभीर मुद्दा है. तो फिर ऐसे में विश्वविद्यालयों द्वारा सीआईसी के आदेशों का पालन करने का इंतजार क्यों? क्यों नहीं मोदी स्वयं ही आगे आते और दस्तावेजों को सार्वजनिक कर तमाम अफवाहों और अटकलों को विराम दे देते? मोदी काफी सोशल मीडिया सेवी हैं और वे फेसबुक और ट्विटर पर काफी सक्रिय भी हैं.

उन्होंने जहां भी इन प्रमाणपत्रों को संभाल कर रखा है वहां से उन्हें निकालकर उनकी तस्वीर खींचकर सबके देखने के लिये आॅनलाइन पोस्ट कर देना चाहिये और उनके ऐसा करते ही चल रहा विवाद क्षणभर में ही हवा हो जाएगा. मैंने कुछ दिनों पहले ट्विटर पर प्रधानमंत्री से ऐसा करने के लिये अनुरोध भी किया था और मैं उनकी प्रतिक्रिया के इंतजार में हूं.

पढ़ेंः पीएम मोदी की डिग्री से संबंधित जानकारी सार्वजनिक होगी

मोदी की तरफ से एक ईमानदार और स्पष्ट प्रतिक्रिया के अभाव में इस संदेह को बल मिल रहा है कि मीडिया के माध्यम से सामने आई मोदी की डिग्रियां नकली हैं और हो सकता है कि उन्हें जाली तरीके से तैयार भी किया गया हो जो अपने आप में एक आपराधिक कृत्य है. इसके अलावा कहा तो यह भी जा रहा है कि मोदी ने कभी पढ़ने के लिये विश्वविद्यालय का रुख किया ही नहीं.

अगर हम उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मोदी की शैक्षणिक योग्यता को देखें तो पता चलता है कि उन्होंने वडनगर के श्री बीएन स्कूल से एसएससी करने के बाद विसनगर के एमएन काॅलेज से ‘‘प्री साइंस’’ किया है. उन्होंने चुनावों में नामांकन करते वक्त अपनी शैक्षणिक योग्यता ‘‘एमए’’ दर्शायी है लेकिन अबतक वे इसके कोई दस्तावेजी सबूत पेश करने में नाकामयाब ही रहे हैं.

यहां पर मुद्दा उनकी शैक्षणिक योग्यता का नहीं है. यह देश के सबसे शक्तिशाली पद पर आसीन व्यक्ति की व्यक्तिगत निष्ठा का प्रश्न होने के साथ लोगों के विश्वास से जुड़ा हुआ मुद्दा है

यह तर्क दिया जा सकता है कि प्रधानमंत्री बनने या फिर एक सामान्य विधायक बनने के लिये औपचारिक शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है. निश्चित ही डिग्री किसी भी व्यक्ति की प्रतिभा या फिर उसके शासन करने और प्रशासन संभालने की योग्यता और अयोग्यता का पैमाना नहीं है. आखिरकार भारत का इतिहास इस बात का गवाह है कि देश के दो सबसे बेहतरीन शासक, अकबर और रणजीत सिंह वास्तव में पढ़ना और लिखना तक नहीं जानते थे.

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तो फिर मोदी की डिग्री में ऐसा क्या है? यहां पर मुद्दा उनकी शैक्षणिक योग्यता का नहीं है. यह देश के सबसे शक्तिशाली पद पर आसीन व्यक्ति की व्यक्तिगत निष्ठा का प्रश्न होने के साथ लोगों के विश्वास से जुड़ा हुआ मुद्दा है. भारत जैसे लोकतंत्र में 100 करोड़ से अधिक लोग कैसे एक ऐसे व्यक्ति का भरोसा कर सकते हैं जिसने कसम खाकर भी अपनी शैक्षणिक योग्यता को लेकर झूठ बोला हो?

अमरीका एक स्थापित लोकतंत्र है और इस बात का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता कि वहां के सांसदों ने विश्वास तोड़ने के मामले में अपने एक बेहद लोकप्रिय राष्ट्रपति को भी नहीं बख्शा. अगर भारत को भी एक मजबूत और परिपक्व लोकतंत्र के रूप में विकसित होना है तो मोदी की डिग्री से जुड़े मुद्दे को हल्के में नहीं लिया जा सकता.

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प्रधानमंत्री को खुद आगे बढ़कर एक सार्वजनिक मंच के माध्यम से तमाम प्रासंगिक प्रमाणपत्रों को दुनिया के सामने रखना चाहिये और ऐसा न करने की दशा में जनता के क्रोध का सामना करने के लिये तैयार रहना चाहिये.

(यहां दिए गए लेखक के विचार निजी हैं. इनसे संस्थान का सहमत होना आवश्यक नहीं है)

First published: 9 May 2016, 8:15 IST
 
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