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संसद में जवाब देना पड़ेगा इसलिए 'मितरों' के सामने करते हैं बयानबाज़ी

रंजन क्रास्टा | Updated on: 14 December 2016, 7:47 IST
(एएनआई)
QUICK PILL
  • हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने कहा था कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा, इसलिए जन सभा में बोल रहे हैं. 
  • मगर नोटबंदी की नीति लागू होने के बाद आए दिन नियमों में हो रहे बदलाव से ऐसा लगता है कि उनके पास कोई ख़ास जवाब ही नहीं हैं.

10 नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में एक रैली को संबोधित किया. वहां मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा वे जनसभा को संबोधित कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लोकसभा में बोलने नहीं दिया जा रहा. हालांकि जब से नोटबंदी हुई है, प्रधानमंत्री के भाषणों पर गौर करें तो पाएंगे कि नोटबंदी के दुष्परिणामों को देखते हुए वे लगातार संसद में बोलने से बचते आ रहे हैं.

मोदी के बदलते शब्द

8 नवम्बर की रात 8 बजे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की तो उन्होंने इसे काले धन को खत्म करने के लिए उठाया गया कदम बताया. ‘आतंकवाद’ और ‘काले धन’ जैसे भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल कर मोदी ने इसमें राष्ट्रवाद की चाशनी घोलकर जो चाय बनाई उसे देश हित में बताया.

डेटा आधारित संस्था इंडियास्पेन्ड ने 8 नवम्बर के बाद से लेकर अब तक मोदी के भाषणों में आए उतार चढ़ाव और शब्दों में बदलाव को ग्राफिक के जरिये दिखाया है. बिना किसी योजना के अचानक लागू किए गए इस फैसले देश भर में हुई मौतों और पेटीएम के साथ साझेदारी के बाद प्रधानमंत्री के सुर बदल गए.

अब उन्होंने देश भर के अपने ‘मित्रों’ को संबोधित करते हुए यह गाना शुरू कर दिया है कि अब कहीं और अधिक ‘काला धन’ नहीं है. अब देश की अर्थव्यवसथा को कैशलेस बनाकर ऑनलाइन लेन-देन पर फोकस करना है. 

इंडियास्पेंड ग्राफिक

मोदी के बदले सुरों को समझना मुश्किल नहीं है. नोटबंदी की वजह से हो रही मौतों की संख्या में दिन-ब-दिन बढ़ोत्तरी और जिन लोगों को पकड़ने के उद्देश्य से सरकार ने यह कदम उठाया उसमें उसका विफल रहना; ये दो कारण मोदी की बदलती बातों को समझने के लिए काफी हैं.

अब तो मोदी रैलियों, रेडियो पर अपने संदेश और शायद नींद में भी ‘कैशलेस की ही बातें करते सुनाई देते हैं, जैसे डूबते को तिनके का सहारा होता है वैसे मोदी ‘कैशलेस’ का सहारा लेते दिखाई दे रहे हैं. नोटबंदी की यह पूरी कथा कालेधन के इर्दगिर्द बुनी गई और अब लगता है जैसे काले धन की बात पूरी तरह से रफा-दफा कर दी गई है.

विपक्ष पर हमला करना हो तब जरूर कालाधन याद आ जाता है और बात जब परेशान हाल पब्लिक की हो तो कैश लैस का सिक्का चला दो. इस दोहरी सोच का विश्लेषण करंगे तो पाएंगे अब प्रधानमंत्री को जनमानस में अपनी विश्वसनीयता खोने का डर सताने लगा है. 

बात फिर ब्लैकमनी की!

विपक्ष ने जब सरकार के इस कदम का विरोध किया तो मोदी ने फिर काले धन का पासा फेंक दिया. नोटबंदी को लेकर आ रही एक के बाद एक नकारात्मक रिपोर्ट का सामना कर उनका समुचित जवाब देने की बजाय मोदी अपने विरोधियों पर काला धन रखने वालों का साथ देने का आरोप लगाते नजर आए. 

संसद में काफी दिनों बाद आए मोदी ने लोकसभा में एक शब्द नहीं बोला और केवल विपक्ष को ही सुनते रहे. इसके बाद जब राज्यसभा में आए तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मोदी के नोटबंदी के फैसले की जमकर आलोचना की. 

मंझे हुए अर्थशास्त्री सिंह ने मोदी के नोटबंदी के फैसले की बखिया उधेड़ कर रख दी और वे कुछ भी नहीं बोल पाए. अगले दिन जरूर मोदी ने कहा, विपक्ष इसलिए बौखला रहा है कि उसे काला धन छिपाने के लिए पूर्व सूचना नहीं दी गई.

इसी प्रकार जब विपक्ष नोटबंदी का एक महीना पूरा होने पर काला दिवस मना रहा था तो केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने इसे बकवास बताते हुए कहा, यह ‘काला धन समर्थन’ दिवस है. खैर, काला धन उजागर करने की इस उठापटक में मोदी की कैशलेस अर्थव्यवस्था का सच सामने आ गया.

शुरूआत में विपक्ष पर हमला बोलने की नीयत से उठाया गया मोदी का यह कदम अब मोदी के लिए केवल विपक्ष को निशाना बनाने का हथियार मात्र रह गया है, जो कम से कम एक प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप तो नहीं है. 

नोटबंदी के इस कदम से सुधार हुए या नहीं, यह तो बाद की बात है लेकिन प्रधानमंत्री का निगरानी कक्ष ‘व्यस्त’ हो गया है. मोदी के सामने जब आंकड़े और तथ्य रखे जाते हैं तो उने पास कोई जवाब नहीं होता है. इसी से जाहिर होता है कि हालात उनके पक्ष में नहीं हैं. हर बार नोटबंदी को लेकर आ रही रिपोर्ट जहां विपक्ष को बोलने का मौका दे रही है, वहीं मोदी निरुत्तर होते जा रहे हैं.

जनता को संबोधन

मोदी जब जनता को संबोधित करते हैं तो अचानक ही उनके पास सारे सवालों के जवाब होते हैं. बल्कि इतने सारे जवाब होते हैं कि काले धन की बात करना तो वे भूल ही जाते हैं. मन में कहीं न कहीं आश्वस्त होते हैं कि यहां सवाल पूछने वाला तो कोई है नहीं, इसलिए चाहे जितने लंबे चौड़े दावे करो.

वे कैशलेस सोसायटी का सपना देखते हैं, जो कि उस वक्त नहीं था, जब उन्होंने नोटबंदी की घोषणा की थी. वे पूरे देश को इंटरनेट के इस्तेमाल की सलाह देते हैं जबकि भलि भांति जानते हैं कि इंटरनेट तक देश की केवल 15 प्रतिशत आबादी की ही पहुंच है.

वे नेट बैंकिंग की बातें करते है, जबकि भारत की एन्क्रिप्शन तकनीक पुरानी हो चुकी है. दो साल पुराने पैरोडी वीडियो से प्रेरित हो कर वे भिखारियों के स्वाइप मशीन के इस्तेमाल करने की कहानी कह रहे हैं.

वे उन देशों की बात करते हैं जो पूरी तरह से कैशलेस हैं और चाहते हैं कि उनके समर्थक भारत को कैश लैस बनाने की दिशा में आगे बढ़ें. मगर यह बात करते हुए मोदी यह भूल जाते हैं कि ये देश इसलिए विकसित नहीं हैं क्योंकि वे कैशलेस हैं, बल्कि विकसित हैं इसलिए कैशलेस हैं.

इन सबके बावजूद मोदी के इस अपने ही शो और भाजपा द्वारा जमा किए गए अपने ही दर्शकों के बीच उनकी ‘बड़ी-बड़ी बातों’को चीयर किया जाता है. संसद में उनका यह शो इसलिए नहीं चल पाता क्योंकि वहां बैठे जानकारों के सामने उनके अर्द्ध सत्य और डींगों की धज्जियां उड़ते देर नहीं लगेगी. 

इसीलिए मोदी जनता को संबोधित करते हैं, संसद को नहीं. उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि उनकी कोई सुनेगा या नहीं बल्कि चिंता इस बात की है कि कहीं कोई उनसे सवाल न पूछ बैठे.

First published: 14 December 2016, 7:47 IST
 
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